झूठे राष्ट्रवादियों का नंगा समर्पण

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भारत और ब्रिटेन के बीच हुए ‘मुक्त व्यापार समझौते’ को ऐतिहासिक समझौते की संज्ञा दी जा रही है। निःसंदेह यह समझौता इस मामले में ऐतिहासिक है कि अपने आपको सबसे बड़ा राष्ट्रवादी घोषित करने वालों ने भारत को एक समय गुलाम बनाने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के सामने नंगा समर्पण कर दिया। वैसे इस मामले में ये इतने ही ऐतिहासिक हैं कि आजादी की लड़ाई के दिनां में भी इन्होंने हमें गुलाम बनाने वालों के सामने समर्पण किया था और आज फिर से इसे दुहरा रहे हैं। 
    
समझौते की तारीफ में पूंजीवादी अखबारों ने सुर्खियां लगायीं कि इससे भारत में ‘स्कॉच विहस्की, लग्जरी कारें, कपड़े, इंग्लिश चाकलेट’ आदि चीजें सस्ती हो जायेंगी। ये सब चीजें गर सस्ती हो जायेंगी तो किसे फायदा होगा। इस तरह की चीजों का ग्राहक भारत का पूंजीपति और उच्च मध्यम वर्ग ही है। भारत के मजदूरों, मेहनतकश किसानों को इस समझौते से भला क्या लाभ होगा। 
    
ब्रिटेन में स्कॉच व्हिस्की के एसोसिएशन के सी ई ओ ने इस समझौते को ऐतिहासिक कदम बताया क्यों कि भारत दुनिया में सबसे बड़ा व्हिस्की बाजार है। ब्रिटेन के शराब व्यापारियों से लेकर भारत में उच्च-मध्यम वर्ग ही इस आधार पर समझौते का स्वागत कर सकता है कि किसी का स्काच का व्यापार बढ़ेगा तो किसी को जानी वाकर, चिवास रीगल, ग्लेनफिडिक सस्ती मिलेंगी। और यही बात किसी दूसरे रूप में जगुआर, लैंड रोवर, रोल्स-रॉयल, बैटले जैसी लग्जरी कारों के मालिक और उनको खरीदने वाले भारत के अमीरों के बारे में कही जा सकती है। एक के मुनाफे और दूसरे की ऐय्याशी की कीमत इस या उस रूप में भारत के मजदूरों और मेहनतकशों को चुकानी होगी। किसी का रोजगार खतरे में पड़ेगा तो दूसरे का उत्पाद खतरे में पड़ जायेगा। विदेशी सस्ती दारू किसानों के गन्ने की कीमत को नीचे और नीचे गिरा देगी। 
    
इस समझौते की प्रशंसा में और कहा जा रहा है कि भारत से ब्रिटेन को जाने वाले 99 फीसदी उत्पादों पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। इससे वहां भारतीय कपड़े, चमड़े के उत्पाद, ज्वैलरी आदि-आदि सस्ते हो जायेंगे। यह मामला संदिग्ध है। क्योंकि भारत को यहां चीन जैसे बड़े खिलाड़ियों से सस्ते सामान की दौड़ में मुकाबला करना होगा। और ऊपर से ब्रिटेन की सुस्त अर्थव्यवस्था में पहले से ही खरीददारों का टोटा है। 
    
यह समझौता भारत के लिए फायदे का नहीं घाटे का सौदा है। ब्रिटेन को इस ‘मुक्त व्यापार समझौते’ से एक बड़ा बाजार हासिल होगा। इसके उलट भारत को ब्रिटेन के बाजार में कई-कई साम्राज्यवादी देशों के साथ अन्य देशों के साथ होड़ करनी होगी। भारत के कुछेक एकाधिकारी घरानों टाटा, अम्बानी, अडाणी, मित्तल को हो सकता है कुछ लाभ मिले शेष भारत की गरदन पर साम्राज्यवादी शिकंजा और ज्यादा कसेगा। 

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लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?