मौत के लिए इंसाफ

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बनभूलपुरा हिंसा

हल्द्वानी/ 8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी (उत्तराखण्ड) में बनभूलपुरा हिंसा में 7 लोगों की मौत हुई। इनमें से एक फईम (30 वर्ष) की हत्या पर शुरू से ही प्रश्न खड़े हो गए थे। परिवार ने फईम की मौत की जांच और न्याय के लिए अदालत का रुख किया। अब हाईकोर्ट के आदेश पर बनभूलपुरा थानाध्यक्ष और जांच अधिकारी नीरज भाकुनी को जिले से बाहर ट्रांसफर कर दिया है। तीन सदस्यीय एसआईटी टीम गठित की गयी है, जिसे हर माह हाईकोर्ट में जांच की प्रगति रिपोर्ट देनी होगी।
    
ज्ञात हो कि 8 फरवरी 2024 को पुलिस दल-बल के साथ मलिक का बगीचा से अतिक्रमण हटाने के नाम पर मदरसे और मस्जिद को खाली करवाने पहुंची थी। इसका स्थानीय लोगों ने विरोध किया। जिसके बाद पथराव, आगजनी और हत्या की घटनाएं हुईं। कुछ पत्रकारों और पुलिसकर्मियों को भी चोटें आईं और कुछ मोटरसाइकिलों को नुकसान हुआ जिसका बाद में कुछ मुआवजा मिला। जबकि हिंसा का मुख्य नुकसान स्थानीय आबादी को ही हुआ। बाद में भी कई लोगों के घरों में भी पुलिस द्वारा तोड़फोड़ की गई। इसका कोई मुआवजा नहीं मिला। यहां अधिकांशतः मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी रहती है। फईम की हत्या गोली लगने से हुई। उनके घर पर भी आगजनी की गई। घटना के वीडियो भी आये। हत्या जैसे गंभीर मामले में पुलिस मामले का स्वतः संज्ञान ले सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पुलिस शिकायत मिलने पर एफआईआर दर्ज कर आगे कार्यवाही कर सकती थी, लेकिन उसने नहीं की। 
    
पुलिस की कार्यवाही से उम्मीद खोकर परिजनों ने न्यायिक मजिस्ट्रेट, हल्द्वानी का दरवाजा खटखटाया। 6 मई 2024 को न्यायिक मजिस्ट्रेट ने एफआईआर दर्ज कर जांच के आदेश दिए। सालभर हो गया पर जांच कहीं नहीं पहुंची। ऊपर से परिजनों को जान का जोखिम बना रहा।
    
आखिरकार परिवार ने जांच की खामियों को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट, नैनीताल का रुख किया। 4 जून 2025 को मामले की सीबीआई जांच और परिवार को सुरक्षा की मांग को लेकर हाईकोर्ट में अपील की गई। इधर बनभूलपुरा थाने में थानाध्यक्ष, जो इस मामले में जांच अधिकारी भी थे, को मई 2025 में विभागीय पदोन्नति मिल गयी। वे दरोगा से इंस्पेक्टर हो गए। पता नहीं ये विभागीय पदोन्नति किन आधारों पर होती हैं।
    
इस तरह साल भर तक हुई जांच के बाद हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी को जिले से बाहर नियुक्ति देने का आदेश दिया। सीबीआई जांच की मांग पर एसआईटी गठित कर दी गयी। एसआईटी को यह निर्देश हैं कि वह हर महीने कोर्ट को प्रगति रिपोर्ट दे।
    
हाईकोर्ट के इस आदेश का आगे क्या होगा, नहीं कह सकते। लेकिन इससे यह तो साफ है कि आज नागरिक सुरक्षा और न्याय से पुलिस का दूर का ही नाता है। अगर नागरिक अल्पसंख्यक मुसलमान हों तो यह दूरी अनंत तक भी हो सकती है। 8 फरवरी की घटना जितनी बड़ी थी जाहिर है कि यह थानाध्यक्ष की गलत मंशा या लापरवाही का मामला नहीं था। अगर परत दर परत न्याय किया जाएगा तो इसकी जड़ में सत्ताशीर्ष और उच्च पदों पर बैठे लोग पाये जाएंगे। पर यहां तो एक व्यक्ति फईम को न्याय दिलाने की लड़ाई है। तब भी संभव है ‘न्याय में देरी भी अन्याय के बराबर है’ की तर्ज पर न्याय हो। 
        -हल्द्वानी संवाददाता

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