नयी शिक्षा नीति के भूत-प्रेत

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आजकल अक्सर ऐसी खबरें आती रहती है कि फलां विश्वविद्यालय में ज्योतिष की पढ़ाई शुरू की गई है, कि फलां जगह स्मृतियों को पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है। और तो और भूत-प्रेत विद्या को भी पढ़ाने की खबरें आने लगी हैं।
    
इस तरह की खबरें एकाकी नहीं हैं। बल्कि वे एक योजना की द्योतक हैं। यह बात संघी सरकार की नयी शिक्षा नीति की मूल योजना से प्रकट होती है। नयी शिक्षा नीति देश की शिक्षा को ‘प्राचीन भारतीय संस्कृति’ के अनुरूप ढालना चाहती है जिससे शिक्षा का ‘भारतीयकरण’ किया जा सके। उसे औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त किया जा सके। जैसा कि संघी कहते हैं 1947 को बस राजनीतिक आजादी मिली। असली आजादी तो वे अब दिला रहे हैं।
    
संघ या हिन्दू फासीवादियों की मूल भावना से लोगों की ये बातें अजीब लगती हैं। वे इन्हें सनकी दिमाग की खुराफात मानते हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों का ध्यान मध्यकालीन भारत के इतिहास से उसकी छेड़छाड़ पर जाता है। जहां से वे मुसलमान शासकों को गायब करना चाहते हैं या उन्हें बुरे से बुरे रूप में पेश करना चाहते हैं। पर मसला उससे ज्यादा बड़ा है और मध्यकालीन भारत के इतिहास से उनकी छेड़छाड़ तो उसका हिस्सा भर है।
    
मसला असल में संघियों या हिन्दू फासीवादियों के विश्व दृष्टिकोण का है। वे भारतीय इतिहास ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास को एक खास दृष्टिकोण से देखते हैं। और उसी के तहत अपने हिन्दू राष्ट्र को अवस्थित करते हैं। या ज्यादा सही कहें तो अपने हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक परियोजना के लिए उन्होंने क्रमशः अपना एक विश्व दृष्टिकोण विकसित किया है।
    
जब देश का संघी प्रधानमंत्री खुले मंच से यह कहता है कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी तो लोगों को यह एकदम हास्यास्पद लगता है। विज्ञान में आस्था रखने वालों को लगता है कि देश का प्रधानमंत्री ऐसी बातें करके सारी दुनिया के सामने सिर नीचा कर रहा है। कुछ इसे संघी प्रधानमंत्री की जाहिलियत का सबूत मानते हैं। कुछ अन्य इसे ‘फेंकू’ की बेसिर-पैर की बातों में से एक अन्य मानते हैं।
    
पर ऐसा नहीं है। संघियों से थोड़ा नजदीक से परिचित हर कोई यह जानता है कि उनके बीच इस तरह की बातें आम हैं। संघ की शाखाओं में बच्चों से लेकर बड़ों को यही बताया जाता है कि एक समय भारत विश्व गुरू था। इसकी सभ्यता-संस्कृति सबसे उन्नत थी। तब भारत में विज्ञान और तकनीकी इतनी उन्नत थी कि इसके मुकाबले आज का विज्ञान और तकनीकी कुछ भी नहीं हैं। वेदों में सब कुछ है और पश्चिमी वैज्ञानिक उन्हीं का अध्ययन कर नयी खोजें कर रहे हैं। प्राचीन भारत में हवाई जहाज से लेकर परमाणु बम तक सब कुछ थे। इसी तरह स्टेम सेल या प्लास्टिक सर्जरी की तकनीकी भी थी। बायो तकनालाजी भी बहुत उन्नत थी। आज के सापेक्षिकता के सिद्धांत तथा क्वांटम मेकेनिक्स के सिद्धांत भी तब थे। अणु-परमाणु की तो बात ही क्या की जाये।
    
इतना ही नहीं भारतीय विज्ञान इस मायने में आज के ‘पश्चिमी विज्ञान’ से श्रेष्ठ था कि उसमें विज्ञान और आध्यात्म में कोई विरोध नहीं था। ऋषि-मुनि वैज्ञानिक भी थे और आध्यात्मिक भी। वे अपनी आध्यात्मिक शक्तियों और योग के द्वारा उन वैज्ञानिक सत्यों तक पहुंच जाते थे जिन्हें आज विज्ञान के भारी-भरकम प्रयोग से खोजा जाता है। आज के विज्ञान की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि वह बस भौतिक चीजों तक सीमित है। यह भौतिकता समाज की सारी समस्याओं के मूल में है। इससे मुक्ति भौतिकता को आध्यात्म से जोड़ने में हैं जो प्राचीन भारतीय संस्कृति या हिन्दू संस्कृति का सारतत्त्व है। वेद इसके आदि स्रोत हैं। सारी मानवता उधर लौटकर ही आज की समस्याओं से मुक्ति पा सकती है। भारत को एक बार फिर दुनिया को राह दिखानी होगी। उसे एक बार फिर विश्व गुरू बनना होगा। पर इसके लिए पहले भारत को हिन्दू राष्ट्र बनना होगा। बाद के काल में भारत में पैदा हो गये भांति-भांति के प्रदूषण (बौद्ध, जैन, इस्लाम, ईसाई धर्म तथा पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान व संस्कृति) से मुक्त होकर ही भारत फिर विश्व गुरू बन सकता है। सौभाग्य से 2014 से ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ मोदी के सत्तारूढ़ के होने के समय से इसकी शुरूआत हो गई है। सब कुछ ठीक रहा तो योगी इसे आगे बढ़ायेंगे।
    
थोड़ा सा ध्यान देने से ही पता चल जायेगा कि यह एक सुसंगत विश्व दृष्टिकोण है जिसकी असंगतियों, को पिछले 100 सालों में काट-छांट कर दुरुस्त कर दिया गया है। वैसे इसकी जड़ें और भी पीछे दयानंद सरस्वती और उनके आर्य समाज तक चली जाती हैं। जैसा कि पहले कहा गया है, संघ का हर व्यक्ति इसी दृष्टिकोण में पलता-बढ़ता है और अंत में यही उसका आम दृष्टिकोण बन जाता है।
    
संघ-विरोधियों या गैर-संघियों को यह दृष्टिकोण इतिहास विरोधी और विज्ञान विरोधी लगेगा। और यही सच भी है। लेकिन स्वयं संघी इसे नहीं मानते। वे अपने इसी इतिहास और विज्ञान को सच मानते हैं।
    
संघ ऊपरी तौर पर इतिहास विरोधी या विज्ञान विरोधी नहीं हैं। बस उनका अपना अलग इतिहास और विज्ञान है। अपने इस इतिहास और विज्ञान को सही ठहराने के लिए वे तर्क-कुतर्क किसी का भी सहारा लेने से गुरेज नहीं करते। वे स्थापित इतिहास और विज्ञान से अपने मन माफिक चीजें ले सकते हैं और बाकी को नकार सकते हैं। वे इनकी अपनी अलग व्याख्या भी पेश कर सकते हैं। वे भाषाई खेल भी कर सकते हैं और अंत में तथ्यों को गढ़ भी सकते हैं। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उनके लिए हर साधन जायज है। पूर्णतया तर्क-वितर्क पर निर्भर रहते हुए वे उसी सांस में तर्क की उपयोगिता को नकार भी सकते हैं।
    
आधुनिक विज्ञान के पिछले चार सौ सालों के विकास के दौरान एक वैज्ञानिक पद्धति का भी विकास हुआ है। इसकी मूल बात यह है कि प्रकृति और समान वस्तुगत यथार्थ के तौर पर मौजूद हैं- गति व परिवर्तन के साथ। विज्ञान का काम उन नियमों की खोज है जिनके तहत ये विद्यमान हैं। प्रेक्षण, प्रयोग और सिद्धान्त इस पद्धति के तत्व है। इनके जरिये विज्ञान विकसित होता है। प्रकृति और समाज के बारे में मानव का ज्ञान क्रमशः बेहतर होता जाता है। ज्यादा गलत से कम गलत होता जाता है।
    
इस वैज्ञानिक पद्धति के तहत विज्ञान के अलग-अलग क्षेत्रों  में अलग-अलग औजार विकसित हुए हैं जिससे प्रेक्षण और प्रयोग बेहतर हो सकें। इसी तरह प्रेक्षण और प्रयोग से प्राप्त तथ्यों की सही व्याख्या के भी तरीके विकसित हुए हैं। विज्ञान के किसी क्षेत्र के शोधार्थी को न केवल इन सबसे परिचित होना पड़ता है बल्कि किसी हद तक कुशलता भी हासिल करनी पड़ती है इसके बिना वह ढंग का शोध नहीं कर सकता।
    
संघी ठीक इसी वैज्ञानिक पद्धति को नकारते हैं या उसका मन माफिक इस्तेमाल करते हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि आज की वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा वेदों में आधुनिक विज्ञान को नहीं ढूंढा जा सकता। इसी तरह आज की वैज्ञानिक पद्धति से प्राचीन भारत में परमाणु बम, मिसाइल या हवाई जहाज के अस्तित्व को नहीं प्रमाणित किया जा सकता। इसीलिए वे अपनी सुविधानुसार इस वैज्ञानिक पद्धति को नकारते हैं या तोड़ते-मरोड़ते हैं। और कोई चारा न होने पर ये सापेक्षिकतावादी या संदेहवादी रुख अख्तियार कर लेते हैं। आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति को संदेह के दायरे में लाकर ये अपनी बेसिर-पैर की बातों को जायज ठहराने का प्रयास करते हैं।
    
यह एक कड़वी सच्चाई है कि संघियों के इस प्रयास में उन लोगों ने इनकी काफी मदद की है जो स्वयं को उत्तर-उपनिवेशवादी या उत्तर- आधुनिकतावादी मानते थे। 1980-90 के दशक में जब देश में हिन्दू फासीवादियों का राजनीतिक उत्थान हो रहा था, ठीक उसी समय देश के बुद्धिजीवी हलकों में उत्तर-उपनिवेशवाद और उत्तर- आधुनिकतावाद भी फैशन में थे। इनका भी निशाना ‘पश्चिमी’ ज्ञान-विज्ञान था। मजे की बात यह है कि यह धारा पश्चिम के ही अकादमिक दायरों में पैदा हुई थी और बाद में भारत जैसे पिछड़े देशों में फैशन बनी।
    
इस धारा ने यह साबित करने का प्रयास किया था कि आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति परंपरागत समाजों (आदिवासी या गैर पूंजीवादी) में प्रचलित ज्ञान और ज्ञान की पद्धति से किसी भी मायने में श्रेष्ठ नहीं है। ज्ञान के भांति-भांति के तरीकों में से वह महज एक है तथा उसके द्वारा प्राप्त ज्ञान बहुत सारे ज्ञानों में से बस एक है। आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति की श्रेष्ठता का दावा पश्चिमी उपनिवेशवाद की उपज है। आज भी इसकी श्रेष्ठता शासक वर्ग तथा पश्चिम द्वारा हासिल सत्ता द्वारा ही संभव है जिसे हिंसा के जरिये बनाये रखा जा रहा है। यदि समाजों में बराबरी और मुक्ति चाहिए तो इस विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति की श्रेष्ठता को चुनौती देनी होगी। आदिवासी स्त्रियां अश्वेत, दलित, अल्पसंख्यक इत्यादि इसे करेंगे। इसी के जरिये प्रकृति का विनाश भी रुक सकता है। यह सोच तथाकचित नये सामाजिक आंदोलनों का आधारभूत सिद्धांत बन गई।
    
उत्तर-उपनिवेशवादियों और उत्तर- आधुनिकतावादियों की जमीन अलग थी और उनका लक्ष्य भी अलग था। लेकिन वे जिस तरह आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति को निशाना बना रहे थे वह वैचारिक तौर पर हिन्दू फासीवादियों के बहुत काम का था। इससे जो वैचारिक माहौल बन रहा था उसमें संघी अपनी बातों को ज्यादा आसानी से प्रसारित कर सकते थे। उनकी बेसिर-पैर की बातों की ग्राह्यता बढ़ जाती थी। यदि आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति अन्य पद्धतियों से किसी भी मायने में श्रेष्ठ नहीं है तो वेदों की आर्य समाजियों द्वारा की गई व्याख्या और वैदिक काल के बारे में उनके दावों को कैसे नकारा जा सकता है? कैसे विज्ञान और आध्यात्म के घालमेल को रोका जा सकता है। कभी आशीष नंदी ने नरेन्द्र मोदी को ठेठ फासीवादी (कापीबुक फासिस्ट) कहा था। लेकिन वे स्वीकार नहीं करेंगे कि उनके उत्तर-उपनिवेशवादी सिद्धान्तों ने इस ठेठ फासीवादी के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनने की जमीन तैयार करने में मदद की थी।
    
हिन्दू फासीवादी सरकार आज नयी शिक्षा नीति के तहत जिन बकवास चीजों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना रही है वे उनके व्यापक परिप्रेक्ष्य के तहत हैं। इसके जरिये वे देश की शिक्षा को अपने विश्व दृष्टिकोण के हिसाब से ढालना चाहते हैं जिससे नयी पीढ़ी उनके विश्व दृष्टिकोण में विकसित हो। वैसे हिन्दू फासीवादियों के पक्ष में यह कहना होगा कि कोई भी शासक अपने विश्व दृष्टिकोण को ही पूरे समाज का विश्व दृष्टिकोण बनाना चाहते हैं और इसलिए नयी पीढ़ी को उसी के अनुसार शिक्षित करते हैं। 
    
कांग्रेसियों के जमाने में शिक्षा उदार या वाम-उदारवादी दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करती थी तो संघी इसे ‘हिन्दू राष्ट्र’ के हिसाब से ढालना चाहेंगे।
    
संघियों या हिन्दू फासीवादियों की इस करतूत पर छाती पीटने के बदले इस बात का भंडाफोड़ करने पर जोर देना होगा कि कैसे यह करतूत समाज विरोधी है। कैसे आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति का नकार समाज की प्रगति के लिए खतरनाक है। कि कैसे इनकी समूची दृष्टि विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति का नकार है चाहे इसे किसी भी तर्क या कुतर्क से छिपाया जाये।
    
इसी के साथ इसका भी भंडाफोड़ करने की जरूरत है कि कैसे इनके सारे राष्ट्रवाद और ‘उपनिवेशवाद विरोध’ के बावजूद असल में इनकी सोच उपनिवेशवादियों की अवैध संतान है। कि वे असल में उन्हीं की ही बातों को मुलम्मा चढ़ाकर दोहरा रहे होते हैं। इसे भी बताने की जरूरत है कि इनकी भारतीयता में असल में कोई भारतीयता नहीं है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में बहुत कुछ संजोने लायक है पर हिन्दू फासीवादी यह नहीं कर सकते। इसके बदले वे इसका कूड़ा-कचरा ही इकट्ठा कर सकते हैं जिसे फिर वे रंग-पोत कर बाजार में ले आते हैं।
    
मजदूर-मेहनतकश जनता ही असल में इतिहास की प्रगतिशील परम्पराओं की वारिस है जिसे समाज को आगे ले जाना है। समय को पीछे ले जाने वाले लोग तो बस इसके सड़े-गले को ही इकट्ठा कर सकते हैं और उसे अपनी विरासत बता कर उस पर गर्व कर सकते हैं।
 

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