फासीवाद / साम्प्रदायिकता,

आतंकवाद के नाम पर मजदूरों को आतंकित करने की कोशिश

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दिल्ली लाल किले के पास विस्फोट और कश्मीर में हुई हालिया विस्फोट की घटना के बाद पूरे देश में आतंकवाद के नाम पर सरकार द्वारा आतंक कायम किया जा रहा है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ

अजीत डोभाल की पलटी पड़ गई उलटी

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बीती 10 नवम्बर को एक वीडियो सोशल मीडिया पर जारी हुआ जिसमें देश के मुख्य सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कह रहे हैं कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई एस आई ने मुसलमानों से ज्यादा

हिटलर के वारिस

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ऐसा लगता है कि भाजपा के नेताओं को हिरासत शिविरों से ‘अति प्रेम’ है। कभी असम का मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हिरासत शिविरों की  बात करता है तो कभी मुख्यमंत्री आदित्यनाथ।

अजब-गजब धर्मनिरपेक्षता

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25 नवम्बर को दो घटनाएं घटीं। दोनों घटनाओं का धर्म से सम्बन्ध है। दोनों घटनाओं से संबंधित व्यक्ति अपने-अपने धर्म पर विश्वास करते हैं और अपने धार्मिक विश्वास के साथ आचरण कर

मुखौटे के पीछे असली चेहरा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 2025 में सौ साल पूरे हो गए हैं। इस अवसर पर आरएसएस ‘100 इयर्स आफ संघ जर्नी : न्यू होराइजन्स’ नामक व्याख्यान श्रृंखला चला रहा है। इस एक साल में प

उत्तराखण्ड के 25 साल : पूंजीपति मालामाल - मेहनतकश जनता कंगाल

उत्तराखण्ड को बने 25 साल हो गये। मोदी और धामी ने इस मौके को ऐसे रूप में पेश करने की कोशिश की मानो गंगा फिर से धरती पर अवतरित हो गयी हो। उत्तराखण्ड को बने 25 साल हो गये तो

दिल्ली विस्फोट : मोदी सरकार की विफलता

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दिल्ली विस्फोट में 13 निर्दोष लोगों की जान जा चुकी है। सरकार ने इस विस्फोट पर अपनी खुफिया विफलता स्वीकारने के बजाय हमेशा की तरह ‘दोषी बख्शे नहीं जायेंगे’ का राग छेड़ने का

आलेख

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।