शासकों की लगाई आग में झुलसता असम
पिछले दिनों असम के कार्बी आदिवासी बहुल दो पहाड़ी जिलों में हिंसा भड़क उठी। इस हिंसा में 2 व्यक्ति मारे गये व दर्जनों घायल हो गये। ढेरों पुलिसकर्मी भी घायल हुए। पश्चिमी कार्
पिछले दिनों असम के कार्बी आदिवासी बहुल दो पहाड़ी जिलों में हिंसा भड़क उठी। इस हिंसा में 2 व्यक्ति मारे गये व दर्जनों घायल हो गये। ढेरों पुलिसकर्मी भी घायल हुए। पश्चिमी कार्
इन दिनों भारतीय प्रचार माध्यमों और संघी मानसिकता वाले लोग दीपू चन्द्र दास की हत्या पर बहुत दुःखी लग रहे हैं। हालांकि इन दोनों को दीपू चन्द्र दास से कोई लेना-देना नहीं है।
2047 तक देश को विकसित बनाने की मोदी सरकार की नौटंकी जारी है। देश विकसित बने न बने पर देश के कानून जरूर विकसित भारत नाम के हो जायेंगे। इसी कड़ी में उच्च शिक्षा से जुड़ा एक न
आजकल बांग्लादेश में हिन्दू युवक की मॉब लिंचिंग पर संघी संगठन-पूंजीवादी मीडिया सबने हंगामा कर रखा है। जब यह हंगामा चल ही रहा था उसी दौरान भारत में 3 युवकों की मॉब लिंचिंग
मैकालेपुत्र शब्द हिन्दू फासीवादियों का प्रिय शब्द है। वे अक्सर ही इसका इस्तेमाल करते रहते हैं, खासकर अपने विरोधी उदारवादियों के लिए। अभी हाल ही में संघी प्रधानमंत्री ने ए
जिस सरकार को जनता ने चुना आज वही सरकार जनता को चुन रही है। सरकार दिल्ली में मस्ती में बैठी है और जनता खुद को जनता साबित करने की कवायद में जुटी है। चुनाव आयोग ने लगभग आधे
पिछले दिनों मोदी सरकार ने गुपचुप तरीके से सभी मोबाइल फोन निर्माताओं को निर्देश दिया कि वे सभी फोनों में ‘संचार साथी एप’ अनिवार्य रूप से इंस्टाल करें। यहां तक कि यह एप लोग
‘वर्कफ्रोम होम’ (घर से काम) को कुछ वर्ष पहले बड़े मजे की चीज समझा जाता था। अब हालात ऐसे हो गये हैं कि लोग इससे निजात चाहते हैं। पहले सोचा था कि क्या मजे की बात है कि अपने
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?
अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।