राजनीति

निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी...

पहले तो खबर आयी कि अयोध्या में भाजपा के प्रत्याशी को हार का मुंह देखना पड़ा और अब खबर यह है कि ‘पहली बारिश में ही टपकने लगा श्री राम मंदिर में पानी’। जिस रामपथ के निर्माण

जम्मू-कश्मीर : ताजा आतंकी हमले

जम्मू कश्मीर में 9 जून के बाद से एक के बाद एक आतंकी हमले हुए। सबसे गंभीर हमले में 9 श्रद्धालु जो वैष्णों देवी जा रहे थे, मारे गये। कुछ जवानों व आतंकियों के भी मारे जाने क

लंगड़ी तुलना

कहावत है तुलनाएं हमेशा लंगड़ी होती हैं। और जब तुलना मोदी और नेहरू की हो तो तुलना की दोनों टांगें टूट जाती हैं। इस बार बहुत हल्ला है कि मोदी ने तीसरी बार लगातार प्रधानमंत्र

कुवैत में मजदूरों की मौत : ये अग्निकांड नहीं, हत्याकांड है !

12 जून को कुवैत की एक इमारत में आग लगने से 50 से अधिक मजदूर मारे गये। मारे जाने वाले मजदूरों में से 41 भारतीय बताये जा रहे हैं। इस छोटी सी इमारत में 196 मजदूर ठूंस-ठूंस क

‘‘परिपक्वता’’ का अभाव

करीब पांच महीने पहले ही बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी का राष्ट्रीय समन्वयक और अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। अब मायावती ने आनंद

नीचे और नीचे

पूंजीवादी राजनीति कितनी सिद्धांतविहीन है और पूंजीवादी नेता कितने सिद्धान्त विहीन होते हैं, इसका आये दिन प्रमाण मिलता रहता है। पर कई बार यह इतनी सीमा लांघ जाता है कि लगता

हमारा मन तो मुर्गा लड़ान देखने का है

जब हमारे देश में मनोरंजन के साधन कम थे तो एक मनोरंजन का बढ़िया साधन मुर्गों की लड़ाई होती थी। जगह-जगह मुर्गों की लड़ाई देखने के लिए मजमा लग जाता था। कई बार मुर्गों के पंजों

संघियों को मुंह चिढ़ाता जेएनयू

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) भारतीय विश्वविद्यालयों में सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय है। इसकी तस्दीक अभी वैश्विक क्यू एस विश्व विद्यालय रैंकिंग में हुयी जिसके अनुस

‘‘बिना शर्त माफी’’ मतलब बंदर कभी गुलाटी मारना नहीं भूलता

10 अप्रैल को उच्चतम न्यायालय में जो हुआ वह मजेदार था। बाबा और उसका चेला न्यायालय में बिना शर्त माफी मांग रहा था पर दोनों न्यायधीश बाबा पर कतई मेहरबान नहीं थे। वे बाबा को

मोदी है तो मुमकिन है!

इस समय देश में एक ऐसा प्रधानमंत्री है जिसे विदेश विभाग के गंभीर मामलों से संबंधित जानकारी भी अखबारों की रिपोर्ट से मिलती है। और जब प्रधानमंत्री ऐसा हो तो विदेश मंत्री का

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?