2026 के पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम ने देश के अंदर फिर से लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग, सामाजिक सौहार्द, क्षेत्रीय दलों के स्थायित्व, विपक्षी दलों के चुनावी गठजोड़ की राजनीति आदि पर कई प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं।
पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों में भाजपा ने 294 में से 207 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों तक सिमट गई।
यह परिणाम इसलिए भी ऐतिहासिक माना गया क्योंकि पहली बार बंगाल में भाजपा ने अपने दम पर सरकार बनाई। यह वही राज्य था जहां कभी संशोधनवादी वामपंथ का दशकों तक प्रभुत्व रहा और बाद में ममता बनर्जी ने ‘‘मां, माटी, मानुष’’ के नारे के साथ सत्ता हासिल की थी।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत: लगभग 93 प्रतिशत रहा।
भाजपा का वोट शेयर: लगभग 45.8 प्रतिशत तो टीएमसी का वोट शेयर: लगभग 40.8 प्रतिशत।
यह चुनाव बंगाल के राजनीतिक इतिहास में सबसे अधिक मतदान वाले चुनावों में भी शामिल रहा। हालांकि चुनाव से पहले एस आई आर कराये जाने के साथ लाखों लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। जाहिर सी बात है कि अधिकतर उन इलाकों या लोगों के एस आई आर में नाम कटे, जो अल्पसंख्यक या भाजपा विरोधी क्षेत्र माने जाते रहे।
भाजपा ने बंगाल में हिंदुत्व की राजनीति को सांप्रदायिक जहरीले प्रचार से आगे बढ़ाया। बांग्लादेशी घुसपैठिये के मुद्दे को भी भाजपा ने खूब हवा दी।
2016 में केवल 3 सीटों से शुरू हुई भाजपा की यात्रा 2021 में 77 सीटों तक पहुंची और 2026 में 200 पार कर गई। यह उभार अचानक नहीं था, बल्कि लंबे समय से चल रहे संगठन विस्तार, आरएसएस नेटवर्क और सबसे ज्यादा संवैधानिक संस्थाओं के खुलकर इस्तेमाल का परिणाम था जिसमें आज मोदी-शाह गठजोड़ माहिर हो चुका है। विपक्षी दलों को ईडी, सीबीआई से डराना हो या विपक्षी नेताओं को खरीदना हो; यह उनके लिए आम है। इसके अलावा चुनाव आयोग जिस तरह से आज केंद्र सरकार एवं मोदी-शाह के आगे नतमस्तक है वो आज चुनाव को औपचारिकता पूरी करने मात्र तक ले जा रहा है। इसके अलावा मीडिया 24 घंटे सेवा में हाजिर है, साथ ही अपने तमाम केंद्रीय नेताओं को पश्चिम बंगाल में उतार देना यह सब भाजपा व मोदी-शाह के चुनावी राजनीति में सब दांव खेलने को दिखाता है।
2026 चुनाव का सबसे बड़ा विवाद ‘‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’’ (SIR) रहा। रिपोर्टों के अनुसार लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि इससे खास समुदायों और क्षेत्रों के मतदाता प्रभावित हुए।
कई मीडिया मंचों पर भी ऐसी चर्चाएं सामने आईं जिनमें दावा किया गया कि मतदाता सूची से हटाए गए नामों ने कई सीटों के परिणाम प्रभावित किए।
हालांकि भाजपा की जीत के पीछे का एक कारण लगातार 15 वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद टीएमसी सरकार के खिलाफ बढता असंतोष भी था। भ्रष्टाचार, स्थानीय स्तर पर ‘‘सिंडिकेट राज’’, शिक्षक भर्ती घोटाले और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दे जनता में नाराजगी पैदा कर रहे थे। भाजपा ने इन्हें आक्रामक तरीके से चुनावी मुद्दा बनाया।
चुनाव के दौरान बेरोजगारी बड़ा मुद्दा बनकर उभरी। बड़ी संख्या में युवा रोजगार, उद्योग और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया की मांग कर रहे थे। भाजपा ने ‘‘परिवर्तन’’ और ‘‘डबल इंजन सरकार’’ के नाम पर विकास का वादा किया।
इस चुनाव का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक क्षण तब आया जब ममता बनर्जी अपनी सीट भवानीपुर से हार गईं। यह केवल एक सीट की हार नहीं थी, बल्कि बंगाल की राजनीति के एक लंबे दौर के अंत का संकेत माना गया। 2011 में सत्ता में आई ममता बनर्जी ने खुद को बंगाल की सबसे प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित किया था।
भाजपा की जीत के बाद बंगाल में कई संभावित बदलावों पर भी चर्चा हो रही है। कि अब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और बढ़ सकता है। फासीवाद और मजबूत होगा तथा विरोध आंदोलनों पर कठोर कार्रवाई हो सकती है जिसको महसूस किया जा सकता है। जिस तरह चुनाव में भाजपा की जीत के बाद नफरती लंपटों ने आतंक मचाया, तोड़-फोड़, आगजनी, हिंसा की वह आने वाले वक्त की एक डरावनी तस्वीर भी दिखा देता है।
चुनाव में भ्रष्टाचार के मुद्दे को भाजपा भुनाती रही। लेकिन चुनाव के बाद जिस तरह से पूर्व टीएमसी नेता जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, को पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बना दिया गया, यह भाजपा के अपराधी प्रेम को दिखाता है। साथ ही चुनाव तंत्र की पोल भी खोल देता है।
संशोधनवादी वामपंथ और कांग्रेस की स्थिति ने इस चुनाव में एक बार फिर दिखाया कि बंगाल में इनका जनाधार बेहद कमजोर हो चुका है। कभी बंगाल की राजनीति नियंत्रित करने वाली ताकतें अब चुनावी परिदृश्य में लगभग हाशिए पर पहुंच चुकी हैं।
साथ ही ये चुनाव परिणाम यह भी दिखाते हैं कि भारतीय जनता का आज भी इस चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा बना हुआ है। साथ ही अब एक आवाज यह भी सुनाई दे रही है कि भाजपा को चुनावी राजनीति में नहीं हराया जा सकता।