‘सिर्फ हम ही क्यों?’..

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नई दिल्लीः उत्तरी दिल्ली में अपने मामूली किराये के कमरे में बैठे हुए, दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.काम. के छात्र 22 वर्षीय आमिर मोहिदीन ने एक व्हाट्सएप संदेश पढ़ा, जिसने उसे चिंतित और असुरक्षित महसूस कराया।
    
यह संदेश जम्मू-कश्मीर के छात्रों के एक समूह चैट में आया था, जो पहलगाम हमले के कुछ ही दिनों बाद आया था जिसमें 26 पर्यटक मारे गए थे। भेजने वाला दिल्ली विश्वविद्यालय का प्राक्टर कार्यालय था, जिसने राजधानी में रहने वाले कश्मीरी छात्रों के आधार नंबर और पूरे आवासीय पते- फ्लोर नंबर सहित- मांगे थे।
    
आमिर को सबसे ज्यादा परेशानी सिर्फ अनुरोध की प्रकृति से नहीं हुई, बल्कि जिस मंच से यह अनुरोध किया गया था, उससे हुई- एक अनौपचारिक समूह जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के दर्जनों छात्र शामिल थे।
    
उन्होंने कहा, ‘‘हमें ये विवरण उस समूह में साझा करने के लिए कहा गया था। यह चौंकाने वाला था। अगर यह केवल प्रशासन और हमारे बीच होता, तो यह कोई मुद्दा नहीं होता।’’ ‘‘लेकिन इसे एक अनौपचारिक समूह में साझा करना सही नहीं लगा।’’
    
मध्य कश्मीर के रहने वाले मोहिद्दीन ने अपने पते की सही मंजिल बताने में संकोच किया, लेकिन अंततः डर के कारण उन्होंने ऐसा कर दिया।

‘‘क्या होगा अगर कोई बुरे इरादे वाला व्यक्ति इसे देख ले? उन्हें पता होगा कि मुझे कहां ढूंढना है। इससे मैं असुरक्षित और कमजोर महसूस करता हूं,’’ उन्होंने कहा, दिल्ली में पढ़ाई करने का उनका सपना अब डर और कमजोरी के साये में डूब गया है।
    
‘‘हम यहां पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए आए थे, लेकिन अब ऐसा लगता है कि हमें निशाना बनाया जा रहा है। इस तरह की खास जानकारी साझा करना, खास तौर पर ऐसे असुरक्षित माहौल में, बहुत गलत लगता है। मेरे दिमाग में बार-बार यह बात घूम रही थी कि यह कितना खतरनाक था। क्या होगा अगर कल कोई हमारे पीछे पड़ गया? क्या होगा अगर ये जानकारी गलत हाथों में चली गई?’’
    
डीयू की छात्रा कुरात-उल-ऐन के लिए यह मुद्दा अप्रत्याशित नहीं था, लेकिन यह परेशान करने वाला था। उन्होंने पूछा, ‘‘पहलगाम हमले के बाद मुझे पहले से ही किसी तरह के सर्कुलर की उम्मीद थी। लेकिन केवल जम्मू-कश्मीर के छात्रों से ही इस तरह की जानकारी क्यों मांगी जा रही है?’’

‘‘एक छात्रा के रूप में, सार्वजनिक समूह में अपना पता साझा करना और भी असहज लगता है।’’
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दिल्ली विश्वविद्यालय ने प्राक्टर कार्यालय से प्राप्त एक पत्र का हवाला देते हुए पुष्टि की है कि विभागों और संबद्ध कालेजों को जम्मू-कश्मीर के छात्रों के आधार और वर्तमान आवासीय विवरण एकत्र करने का निर्देश दिया गया है।
    
..डीयू प्राक्टर रजनी अब्बी के अनुसार, यह निर्देश गृह मंत्रालय से आया है, जो कथित तौर पर खुफिया जानकारी पर आधारित है।
    
जम्मू-कश्मीर छात्र संघ के राष्ट्रीय संयोजक नासिर खुहामी ने सोशल मीडिया पर निर्देश की निंदा करते हुए इसे ‘‘भेदभावपूर्ण प्रोफाइलिंग, निजता का घोर उल्लंघन और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन’’ कहा।
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उन्होंने लिखा, ‘‘कश्मीरी छात्रों की प्रोफाइलिंग राष्ट्रीय एकीकरण और मेलमिलाप की प्रक्रिया में गंभीर बाधा उत्पन्न करती है।‘‘ ‘‘क्या इसका मतलब यह है कि हमारे छात्र अलग, संदिग्ध या कमतर नागरिक हैं?’’
    
खुएहामी ने गृह मंत्रालय से तत्काल परिपत्र वापस लेने की मांग की तथा दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी स्थिति स्पष्ट करने का आग्रह किया।
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अन्य प्रमुख संस्थानों - जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया हमदर्द- के छात्रों ने पुष्टि की कि ऐसा कोई अनुरोध नहीं किया गया था।
    
2022 में एएमयू में भी इसी तरह का कदम उठाया गया था, लेकिन छात्रों के विरोध के बाद इसे वापस ले लिया गया था। बेंगलुरू के क्राइस्ट कालेज को भी एक बार पुलिस ने कश्मीरी छात्रों का विवरण जमा करने के लिए कहा था, लेकिन इस निर्देश की व्यापक आलोचना हुई थी।
    
फिलहाल, इस घटना पर डीयू की चुप्पी संदेह और भय को बढ़ावा दे रही है। हालांकि विश्वविद्यालय के कुछ कर्मचारियों ने छात्रों को आश्वस्त करने और उन्हें प्रोत्साहित करने की कोशिश की, लेकिन विश्वास को पहुंची क्षति की भरपाई करना मुश्किल हो सकता है।
    
आमिर ने कहा, ‘‘हम यहां ऐसा महसूस करने के लिए नहीं आए थे। हम यहां पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए आए थे। लेकिन अब ऐसा लगता है कि हमें फिर से निशाना बनाया जा रहा है।’’
(सभी छात्रों के नाम उनकी गोपनीयता की रक्षा के लिए अनुरोध पर बदल दिए गए हैं।)
 

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