तानाशाह

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साहेब को रंग बदलते देख कर
अब तो गिरगिट भी शरमाने लगा है
अच्छे दिन कब आयेंगे पता नहीं
विकसित भारत के नाम पर भरमाने लगा है।

रंग बदलना, जुमले गढ़ना
ये उसकी बेहतरीन कला है
धन्नासेठों को लूट की पूरी छूट है यहां
सबका साथ सबका विकास के नाम पर
बस जनता को छला है।

झूठ तो वह इतनी साफगोई से बोलता है
कि जिसका कोई जबाव नहीं
जनता से किये वादों का भी कोई हिसाब नहीं
अपराधियों को वह कपड़ों से पहचान लेता है
कौन सा तमगा दूं उसके लायक कोई खिताब नहीं।

वाकपटुता और लच्छेदार भाषण
मित्रों को दौलत बेशुमार, जनता को राशन
खुद की आलोचना उसे पसंद नहीं
उसे चाहिए भक्तों की फौज और एकछत्र सिंहासन।

हर उठती आवाज को
देशद्रोह के नाम कर देता है
जो भी उसके खिलाफ है
उसका इंतजाम कर देता है

शायद वह भूल गया है कि
जन सैलाब एक दिन तानाशाहों का 
काम तमाम कर देता है।    -भारत सिंह

आलेख

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।