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पूंजीवादी जनतंत्र और धनतंत्र

आजकल अपने देश में चुनावों में पैसे के खेल को लेकर काफी चर्चा है। इस चर्चा को तब काफी बल मिला जब सर्वोच्च न्यायालय ने छः साल बाद आखिरकार चुनावी बांड की संवैधानिकता पर अपना

पूंजीवादी जनतंत्र में जन और तंत्र

इस समय संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सर्वोच्च अदालत में इस बात को लेकर मुकदमा चल रहा है कि क्या 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद डोनाल्ड ट्रम्प समर्थकों ने जो विद्रोह करने की कोशिश की थी और जिसमें

धर्म का धंधा

आज से करीब ढाई हजार साल पहले जब प्लेटो यानी अफलातून ने अपनी ‘गणराज्य’ नामक किताब में आदर्श राज्य व्यवस्था का खाका खींचा तो साथ ही इसके स्थायित्व की भी व्याख्या की। उसने क

‘हिन्दू राष्ट्र’ की ओर एक और कदम

संघ परिवार की ओर से गाहे-बगाहे यह बात होती रही है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना के सौ साल होने तक भारत एक ‘हिन्दू राष्ट्र’ बन जायेगा। अब यह समय बहुत नजदीक आ गया

धारा-370 फैसला : जी हुजूर, सिर-माथे पर !

संविधान की धारा-370 को निष्प्रभावी करने के केन्द्र सरकार के 2019 के फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये हालिया फैसले ने वर्तमान मुख्य न्यायाधीश से उम्मीद लगाये उदा

पूंजीवादी जनतंत्र में ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनाव

उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर में पूंजीपति वर्ग ने ‘इतिहास के अंत’ में ‘उदार पूंजीवादी जनतंत्र की अंतिम विजय’ के बाद काफी प्रगति की है। उसने अब पूंजीवादी जनतंत्र को महज ‘स्वत

यहूदी राज्य और जनतंत्र

पश्चिमी साम्राज्यवादी, खासकर अमरीकी साम्राज्यवादी यह कहते नहीं थकते कि पश्चिम एशिया में इजरायल अकेला जनतंत्र है। अभी हालिया संघर्ष में अमरीकी राष्ट्रपति ने इजरायल के प्रत

इस्लाम विरोध : एक साम्राज्यवादी कुचक्र

इजरायल फिलिस्तीन के बीच वर्तमान संघर्ष के दौरान एक बार फिर इस्लाम विरोध चरम पर है। भारत के हिन्दू फासीवादियों से लेकर पश्चिमी साम्राज्यवादी शासक सभी इस्लाम पर निशाना साध रहे हैं। तरह-तरह से बताया ज

हिन्दू फासीवादी और जियनवादी

इजरायल के जियनवादी शासकों द्वारा गाजापट्टी पर ताजा बर्बर हमले के दौरान भारत के हिन्दू फासीवादियों की प्रतिक्रिया काबिले गौर है। भाजपा के आई टी सेल से लेकर पूंजीवादी प्रचा

एम एस स्वामीनाथन और हरित क्रांति

मनकोम्बु सम्बासिवान स्वामीनाथन अथवा एम एस स्वामीनाथन का बीते 28 सितम्बर को निधन हो गया। वे 98 साल के थे। वे भारत में तथाकथित हरित क्रांति के जनक माने जाते थे। पिछले कुछ स

आलेख

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?