जून महीने के उत्तरार्द्ध में पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में ईरान और अमरीका के बीच समझौता ज्ञापन (मेमोरंडम आफ अण्डरस्टैंडिंग) पर दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने हस्ताक्षर कर दिया। इस समझौता ज्ञापन के बाद 60 दिनों के अन्दर दोनों पक्षों के बीच अंतिम समझौता करने संबंधी बातचीत जारी रहेगी। इस समझौता ज्ञापन में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि यह पश्चिम एशिया के सभी युद्ध क्षेत्रों विशेष तौर पर लेबनान में भी लागू होगा। इसके अनुसार लेबनान में इजरायली हमला रोकना होगा और लेबनान के क्षेत्रों से इजरायली सेना को बाहर जाना होगा। इसमें यह भी कहा गया है कि लेबनान की क्षेत्रीय एकता और सम्प्रभुता को बरकरार रखा जायेगा। इस समझौता ज्ञापन के अनुसार अगले 60 दिनों के लिये बिना किसी शुल्क के होरमुज जलडमरुमध्य के जहाजी रास्ते को वाणिज्यिक आवाजाही के लिये खोल दिया जायेगा। इसके साथ ही, फारस व ओमान की खाड़ी की अमरीकी नाकेबंदी खत्म की जायेगी। ईरान की जब्त की गई परिसम्पत्तियों को उसे वापस किया जायेगा और ईरान पर तेल, पेट्रोकेमिकल्स और इनके उत्पादों पर प्रतिबंध हटा लिये जायेंगे। इसके अतिरिक्त ईरान के पुनर्निर्माण और विकास की मद में 300 अरब डालर के निवेश की व्यवस्था अमरीका करेगा। इन 60 दिनों के दौरान ईरान के आणविक कार्यक्रम पर समझौता होने और ऊपर बताई गई बातों को लागू करने सम्बन्धी व्यापक और तकनीकी बातों पर समझौता करने का प्रयास किया जायेगा।
17 जून को इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन पर अमरीका और ईरान के राष्ट्रपतियों ने हस्ताक्षर किये और 19 जून को स्विटजरलैण्ड में दोनों पक्षों के बीच वार्ता आगे होनी थी। लेकिन समझौता ज्ञापन को इजरायल की यहूदी नस्लवादी सरकार ने मानने से इंकार कर दिया। उसने लेबनान पर बमबारी और जमीनी हमले तेज कर दिये। इजरायली प्रधानमंत्री ने कहा कि चूंकि समझौता ज्ञापन में उनकी कोई हिस्सेदारी नहीं है इसलिये वे इससे बंधे हुए नहीं हैं। इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में लितानी नदी के उत्तर में हमले तेज कर दिये और एक दिन में 47 लोगों को मार डाला। इससे ईरान ने आगे की वार्ता में भाग लेने के लिये स्विटजरलैण्ड की यात्रा को स्थगित कर दिया। ईरान ने कहा कि समझौता ज्ञापन का उल्लंघन हुआ है और इसे लागू कराने की जिम्मेदारी अमरीका की है। अमरीकी उप राष्ट्रपति वैंस ने इजरायली सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि इजरायल दक्षिणी लेबनान पर हमला करके समूचे पश्चिमी एशिया को खतरे में डाल रहा है। ट्रम्प ने भी कहा कि यदि अमरीका नहीं होता तो इजरायल बिल्कुल ही नहीं टिक पाता। इजरायल मौजूद है क्योंकि उसके साथ अमरीका और ट्रम्प है। अमरीकी दबाव के आगे इजरायल को पीछे हटना पड़ा। लेकिन यहूदी नस्लवादी इजरायली प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल के घोर दक्षिणपंथी सहयोगी बेन ग्वीर और स्ट्रेमोविच दक्षिण लेबनान से पीछे न हटने की बात करते रहे। इजरायली प्रधानमंत्री ने दक्षिणी लेबनान के भीतर 10 किमी. तक एक बफर जोन बनाने पर जोर दिया।
ईरान ने पहले होरमुज जलडमरूमध्य के रास्ते को खोल दिया था। लेकिन लेबनान पर इजरायली हमलों के बाद ईरान ने होरमुज के जुएस्ते को बंद कर दिया। इससे फिर से खलबली मच गई। तेल और गैस के टैंकरों की आवाजाही रुक गई। तब मध्यस्थ पाकिस्तान ने ईरान से वार्ता में आने के लिये जोर दिया। इस दौरान इजरायली हमले भी रुक गये थे।
पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में अमरीकी और ईरानी प्रतिनिधिमण्डलों के बीच वार्ता स्विटजरलैण्ड में समझौता ज्ञापन को लागू कराने और आगे की बातचीत जारी रखने के लिये शुरू हुई।
अमरीकी प्रतिनिधि मण्डल के साथ ईरानी प्रतिनिधियों ने फोटो खिंचाने से मना कर दिया। जैसे ही वार्ता शरू हुई अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने एक बार फिर से ईरान को धमकी दी। उसने कहा कि यदि ईरान समझौता ज्ञापन को लागू नहीं करता और होरमुज जलडमरूमध्य के जहाजी रास्ते को नहीं खोलता तो वह ईरान को तबाह कर देगा। उसने वार्ताकारों को भी वहीं मार डालने की धमकी दी। इसकी जानकारी मिलते ही ईरानी वार्ताकार वार्ता को छोड़कर बाहर आ गए। मध्यस्थों के प्रयास के बाद वे जब फिर से चारों पक्षों- दो मध्यस्थ और अमरीका के साथ वार्ता के लिए आए तो उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति की धमकी की निंदा की। बाद में ईरानी वार्ताकार कालीवेफ ने कहा कि ट्रम्प की धमकी को वे कोई तरजीह नहीं देते। यदि ट्रंप ऐसा कोई कदम उठाते हैं तो ईरानी सेना और इस्लामी क्रांतिकारी गार्ड कोर इसका जोरदार जवाब देने के लिए तैयार है।
इसके बाद वार्ता हुई और ईरान को कई रियायतें देने के लिए अमरीका मजबूर हुआ। ईरान ने बार-बार यह स्पष्ट कर दिया कि जो चीज दुश्मन उससे युद्ध के मैदान में नहीं पा सका उसे वह वार्ता की मेज में हरगिज नहीं मिलेगी। ईरान का व्यापक और बड़े पैमाने पर नुकसान और तबाही होने के बावजूद ईरान इस अमरीकी-इजरायली हमले में और ज्यादा मजबूत होकर उभरा है। ईरान पश्चिमी एशिया में एक बड़ी ताकत के तौर पर उठ खड़ा हुआ है। अभी तक ईरान को दुनिया में और इस क्षेत्र में अलग-थलग समझ जाता था। अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत ने ईरान को चारों तरफ से घेर रखा था। खाड़ी देशों की हुकूमतें अमरीका के साथ थीं। इजरायल के पीछे अमरीकी साम्राज्यवादियों की ताकत थी। पिछले ढाई वर्षों से ज्यादा समय से इजरायल ने गाजापट्टी में व्यापक नरसंहार और भीषण तबाही मचा रखी थी। उसने लेबनान पर भी हमले लगातार जारी रखे थे। इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत की वृहत्तर इजरायल की परियोजना आगे परवान चढ़ रही थी। उसने गाजापट्टी का 60 प्रतिशत हिस्सा फिलिस्तीनियों से खाली करा लिया था। पश्चिमी तट पर भी लगातार यहूदी बस्तियां बढ़ती जा रही हैं। उसने सीरिया की गोलन पहाड़ियों से आगे बढ़कर दश्मिक के पास तक के इलाके पर कब्जा कर रखा है।
अभी भी इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत वृहत्तर इजरायल की अपनी परियोजना को आगे बढ़ाने पर आमादा है। लेकिन ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमलों के बाद जिस तरीके से ईरान ने पलटवार किया और इस क्षेत्र में मौजूद अमरीकी फौजी अड्डों को तहस-नहस कर दिया; पिछले 47 वर्षों से तमाम प्रतिबंधों और हमलों व हत्याओं के बावजूद ईरान ने जिस तरीके से दुनिया की सबसे ताकतवर फौज को जवाब दिया, उसकी कल्पना न तो अमरीकी साम्राज्यवादियों ने की थी और न ही इजरायली यहूदी नस्लवादी शासकों ने की थी। उन्होंने हमले के पहले ही दिन ईरान के सर्वोच्च नेता और बड़ी संख्या में शीर्ष फौजी कमांडरों की हत्या कर दी थी। लेकिन इसके बाद जिस तरीके से ईरान ने ड्रोनों और मिसाइलों के माध्यम से इस क्षेत्र में मौजूद अमरीकी फौजी अड्डों को तबाह किया। उनके जंगी जहाजों और एम क्यू: 9 टियर महंगे ड्रोनों को मार गिराया। जब उसने होरमुज को बंद कर दिया तो यह किसी भी हथियार से ज्यादा कारगर साबित हुआ। दुनिया भर में तेल और गैस का संकट आसन्न हो गया। तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ने लगीं। अमरीकी साम्राज्यवादी अपने जंगी बेड़ों के बावजूद होरमुज जलडमरूमध्य को नहीं खुलवा सके। ईरान को तबाह-बर्बाद करने के तमाम प्रयासों के बावजूद वे उसे पलटवार और जोरदार पलटवार करने से नहीं रोक सके। अंततः अमरीकी साम्राज्यवादियों को मजबूर होकर समझौते की मेज पर आना पड़ा।
यहां यह भी ध्यान रखने की बात है कि यद्यपि अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली यहूदी नस्लवादी शासकों ने संयुक्त रूप से ईरान पर आक्रमण किया था। लेकिन दोनों के मकसद हमले के कुछ समय बाद अलग-अलग होने लगे थे। अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते। अमरीकी साम्राज्यवादियों को कोई लक्ष्य हासिल नहीं हुआ। न तो वे हुकूमत परिवर्तन कर सके, न ही आणविक कार्यक्रम को रोक सके और न ही ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को सीमित कर सके। वे ईरान से बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग करते रहे, लेकिन ईरान और जोरदार प्रति हमले से अमरीकी-इजरायली हमलावरों को जवाब देता रहा।
अमरीकी साम्राज्यवादियों को अब तक यह समझ में आ गया था कि ईरान वेनेजुएला नहीं है। ईरान न ही क्यूबा या वेनेजुएला की तरह अमरीका से भौगोलिक तौर पर नजदीक है। ईरान की प्रतिरोधक क्षमता का उसे अहसास हो गया था। एक महाशक्ति को एक कमजोर देश ने मुंहतोड़ जवाब दिया था। अब अमरीकी महाशक्ति किसी तरह से इस युद्ध से हटना चाहती थी। लेकिन महाशक्ति होने का दर्प भी था। वह अपने समर्थकों को अपनी विजय का पैगाम भी देना चाहती थी। इसलिए ट्रम्प बार-बार ईरान की सेना, वायु सेवा और जल सेना को नष्ट कर देने, उसे आर्थिक तौर पर तबाह करने की बात करते रहते हैं। लेकिन न सिर्फ अमेरिका के अन्दर बल्कि खाड़ी देशों के शासकों में और दुनिया भर में अमरीकी पराजय का संदेश चला गया है। खाड़ी देशों के शासकों को यह समझ में आने लगा है कि यदि अमरीका अपने फौजी अड्डों की रक्षा नहीं कर सकता तो इन खाड़ी देशों की रक्षा कैसे कर सकेगा। बल्कि उल्टे इन देशों में अमरीकी फौजी अड्डों की मौजूदगी ही इनको ईरानी हमलों का निशाना बना रही थी। ईरानी शासकों ने यह घोषित कर रखा था कि उसकी अपने पड़ोसी देशों से कोई दुश्मनी नहीं है बल्कि वे उन्हें अपने पड़ोसी मित्र की भावना से देखते हैं। लेकिन यदि ईरान पर हमला करने के लिए पड़ोसी देशों की जमीन, हवाई क्षेत्र या जल क्षेत्र का इस्तेमाल होता है तो वह उसके हमले का वैध लक्ष्य बन जाते हैं। इसका एक हद तक असर भी पड़ा।
अब स्थिति यह है कि पश्चिमी एशिया के कई देश अपनी सुरक्षा के लिए अन्य विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं।
साऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ सुरक्षा संधि कर रखी है। यह ऐसी संधि है जिसमें कहा गया है कि एक देश पर होने वाला हमला दूसरे देश पर भी हमला माना जाएगा। साऊदी अरब, मिस्र, तुर्की और पाकिस्तान मिलकर एक सुरक्षा गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हो सकता है कि इस गठबंधन का और आगे विस्तार हो। अभी तक ट्रम्प जिस अब्राहम समझौते की विजय दुदुम्भी बजा रहा था, अब उसकी चर्चा बहुत कम हो गई है। इसी युद्ध के दौरान ट्रम्प ने खाड़ी देशों से कहा था कि ईरान के साथ समझौता करने के एवज में इन देशों को अब्राहम समझौता करके इजरायल के साथ संबंधों की बहाली करनी होगी। अब इसकी चर्चा गायब हो गई है।
इधर ईरान ने अपने कूटनीतिक प्रयासों को तेज कर दिया है। ओमान के साथ मिलकर ईरान होरमुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन करने संबंधी समझौता कर रहा है। ईरान के राष्ट्रपति ने पाकिस्तान का दौरा करके दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत करने का कदम उठाया है। ईरान ने अजरबैजान में मुस्लिम देशों के संसद अध्यक्षों की बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा तंत्र को विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है।
इस युद्ध में भारी नुकसान के बावजूद ईरान एक क्षेत्रीय बड़ी शक्ति के तौर पर उभरा है। ईरान ने क्षेत्रीय देशों से कहा है कि खुद क्षेत्रीय देश आपस में मिलजुल कर एक सुरक्षा तंत्र विकसित करें। इससे बाहरी तकतों को इस क्षेत्र में दखलंदाजी का मौका नहीं मिलेगा। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो अमरीकी साम्राज्यवाद के लिए यह एक झटका होगा।
जहां तक इजराइल का प्रश्न है वह इस समय अपने आस-पास के देशों के साथ अलगाव में पड़ता जा रहा है। यदि अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ उसके मतभेद और आगे बढ़े तो वह और ज्यादा अलगाव में जा सकता है। उसकी वृहत्तर इजरायल की परियोजना अब कपोल कल्पना लगती है।
अभी भी अमरीकी साम्राज्यवादियों का प्रभाव इस क्षेत्र में कमजोर होने के बावजूद सभी साम्राज्यवादियों की तुलना में ज्यादा है। इसमें चीनी साम्राज्यवादियों की इस क्षेत्र में दखल बढ़ी है। वे रूसी साम्राज्यवादियों के साथ मिलकर ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन इत्यादि के माध्यम से अमरीकी साम्राज्यवादियों के लिए बड़ी चुनौती बनते हैं। पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन अमरीकी वर्चस्व को कमजोर करने की ओर है।
समझौता ज्ञापन के बाद नई टकराहटें
अमेरिका-ईरान के बीच समझौता ज्ञापन के चलते कायम हुई शांति कुछ रोज भी नहीं चल सकी। इस शांति को भंग करने की शुरूआत अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने की। उन्होंने हिजबुल्लाह को किनारे करते हुए लेबनान की सरकार और इजरायल के बीच एक ऐसी समझौता वार्ता की शुरूआत कर दी जिसमें इजरायल को लेबनान में हस्तक्षेप की मुंह मांगी मुराद मिल गयी। इजरायल-लेबनान के समझौते में इजरायल को हिजबुल्ला के निरस्त्रीकरण तक लेबनान में हस्तक्षेप का अधिकार मिल गया। हिजबुल्ला ने इस समझौते को लेबनानी सरकार का आत्मसमर्पण करार देते हुए इसे मानने से इंकार कर दिया। उसने हथियार न छोड़ने का एलान कर दिया। एक तरह से यह समझौता ईरान-अमेरिकी समझौते का भी उल्लंघन था क्योंकि इस समझौते में इजरायल के लेबनान में हस्तक्षेप न करने व लेबनान से अपनी सेना की वापसी की बातें दर्ज थीं।
व्यवहार में टकराहट 25 जून के बाद तब तीव्र हो गयी जब अमेरिका ने एक टैंकर वाहक जहाज पर ईरान द्वारा हमला करने का आरोप लगाते हुए ईरान के तटों पर व मिसाइल-रडार ठिकानों पर हमला बोल दिया। जवाब में ईरान ने होरमुज को फिर से बंद करने की धमकी दी साथ ही कुवैत व बहरीन में अमेरिकी ठिकानों पर अपनी मिसाइलों से हमला बोल दिया। इस हमले से बौखलाकर अमेरिकी सरगना ट्रम्प ने ईरान का नामोनिशां दुनिया के नक्शे से मिटा डालने की धमकी दे डाली। एक ओर दोनों देशों की सेनायें नये-नये हमले करने में जुटी थीं तो दूसरी ओर मध्यस्थ दोनों देशों को फिर से आगे की वार्ता के लिए बातचीत के लिए मनाने में जुटे हैं। इस तरह समझौते का लागू होने और किसी अपेक्षाकृत स्थायी शांति से यह इलाका अभी काफी दूर नजर आ रहा है। अपनी पुरानी हरकतों की तरह अमेरिकी साम्राज्यवादी समझौते के पीछे भी अपनी षड्यंत्रकारी चालों से बाज नहीं आ रहे हैं।