विविध

सत्ता पक्ष और विपक्ष : खोटे सिक्के के दो पहलू

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अगर यह प्रश्न पूछा जाए कि केन्द्र व विभिन्न राज्यों में सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी भारत के मजदूरों व मेहनतकश किसानों, शोषित-उत्पीड़ित जनों के हितों के अनुसार देश को

छात्रवृत्तियों के लिए बजट नहीं, परीक्षा पर चर्चा के लिए लिमिट नहीं

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2018 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पर चर्चा’ करना शुरू किया। एक दिन के इस कार्यक्रम में (2018 में) 3.67 करोड़ रुपए खर्च हुए। 2025 तक यह खर्च 5 गुना से ज्यादा बढ़

ईरान पर अमेरिकी हमले के निहितार्थ

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बहुत कम लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि इजरायल द्वारा गाजा में जो नरसंहार किया जा रहा है उसके लिए हथियार केवल अमेरिकी साम्राज्यवादी नहीं दे रहे हैं। फ्रांसीसी, जर्मन और ब्रिटिश साम्राज्यवादी भी यह हथियार दे रहे हैं। फर्क बस इतना है कि अमेरिकी साम्राज्यवादी नंगे रूप में गाजा में नरसंहार का समर्थन करते हैं जबकि यूरोपीय साम्राज्यवादी इस पर लीपा पोती करते हैं। यह भी याद रखना होगा कि ईरान पर इजरायली हमले को जर्मन चांसलर ने यह कह कर जायज ठहराया कि इजराइल दुनिया के हित में ‘गंदा काम’ कर रहा है। 

9 जुलाई : आम हड़ताल को सफल बनाओ

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मजदूर वर्ग आबादी में भारत का सबसे बड़ा वर्ग है। पर भारत की राजनीति में इसके मुद्दे इसकी मांगें इसकी भारी आबादी के सापेक्ष कहीं नजर नहीं आते। धर्म-जाति-क्षेत्र के मुद्दे कह

एक कविता

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खुद ही घोषित कर देने से कौन गुरु स्वीकारेगा
लहरा दोगे ज्ञान का परचम तब ही जग पहचानेगा

केन्याः प्रदर्शनों में पुलिस द्वारा 16 लोगों की हत्या

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केन्या में ऐतिहासिक वित्त विधेयक विरोधी प्रदर्शनों की पहली वर्षगांठ के अवसर पर पूरे देश में जगह-जगह 25 जून को प्रदर्शन आयोजित किये गये, जिसमें पुलिस और प्रदर्शनकारियों के

दिल्ली की मजदूर बस्तियों में चला सरकार का बुलडोजर

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देश में हो रहे तथाकथित ‘‘विकास’’ की सबसे बड़ी कीमत देश के मजदूरों-मेहनतकशों को चुकानी पड़ती है। दिल्ली में फरवरी 2025 में बीजेपी की सरकार बनी उसके बाद दिल्ली में डबल इंजन क

अमरीकी और चीनी प्रतिद्वन्द्विता तीव्र होने की ओर

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अमरीकी साम्राज्यवादी चीन को अपना प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी मानते हैं। वे इसके लिए दुनिया भर में व्यूह रचना कर रहे हैं। चीन की बढ़ती आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक ताकत ने पुराने व

आलेख

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।