विविध

विभाजन

साइकिल से फैक्टरी पहुंचने में दस मिनट लगते हैं। 8 बजकर 10 मिनट ये वो अंतिम समय है जिस वक्त तक मजदूरों को फैक्टरी में पहुंच जाना होता है। उसके बाद लेट आने पर गेट पर रोका भ

हिंदू

हिंदू तो मैं इसलिए हूं  क्योंकि मुसलमान नहीं हूं

मैं हिन्दू नहीं हूँ? 
हजारों साल तक मुझे 
मंदिर में नहीं घुसने दिया, 
फिर भी मैं हिन्दू हूं 
क्योंकि मैं मुसलमां नहीं हूं।

आपका नजरिया - मजदूर मेहनतकश परिवार और पतित पूंजीवादी संस्कृति

आज हम जिस समाज में रह रहे हैं वह सड़ गल रहा है। समाज में नैतिकता, सामूहिकता का पतन हो रहा है। उससे मजदूरों-मेहनतकशों के परिवार भी अछूते नहीं हैं। तथाकथित आधुनिक जीवन शैली

राजनीति से बेरुखी ठीक नहीं

राजनीति सत्ता को प्राप्त करने अथवा उसे अपने हाथ में कायम रखने के लिए किया जाने वाला संघर्ष या आम भाषा में लड़ाई है

राजनीति के प्रति घृणा मजदूरों-मेहनतकशों में आम है। हर चुनाव में करीब-करीब एक तिहाई से एक चौथाई आबादी ऐसी है जो कभी वोट डालने ही नहीं जाती है। और कभी-कभी तो यह संख्या आधी तक हो जाती है। वोट न डालने वालों और चुने गये लोगों के खिलाफ वोट डालने वालों की संख्या को आपस में जोड़ दिया जाये तो यह बात सामने आयेगी कि चुनाव जीता हुआ व्यक्ति आबादी की बहुसंख्या का नहीं बल्कि एक बेहद छोटी अल्पसंख्या का प्रतिनिधि है। और यही बात मौजूदा सरकार पर भी लागू होती है। 

बलात्कार की संस्कृति और संस्कृति का पाखंड

बलात्कार की घटनाओं की इतनी विशाल पैमाने पर मौजूदगी की जड़ें पूंजीवादी समाज की संस्कृति में हैं

इस बात को एक बार फिर रेखांकित करना जरूरी है कि पूंजीवादी समाज न केवल इंसानी शरीर और यौन व्यवहार को माल बना देता है बल्कि उसे कानूनी और नैतिक भी बना देता है। पूंजीवादी व्यवस्था में पगे लोगों के लिए यह सहज स्वाभाविक होता है। हां, ये कहते हैं कि किसी भी माल की तरह इसे भी खरीद-बेच के जरिए ही हासिल कर उपभोग करना चाहिए, जोर-जबर्दस्ती से नहीं। कोई अपनी इच्छा से ही अपना माल उपभोग के लिए दे दे तो कोई बात नहीं (आपसी सहमति से यौन व्यवहार)। जैसे पूंजीवाद में किसी भी अन्य माल की चोरी, डकैती या छीना-झपटी गैर-कानूनी या गलत है, वैसे ही इंसानी शरीर व इंसानी यौन-व्यवहार का भी। बस। पूंजीवाद में इस नियम और नैतिकता के हिसाब से आपसी सहमति से यौन व्यभिचार, वेश्यावृत्ति, पोर्नोग्राफी इत्यादि सब जायज हो जाते हैं। बस जोर-जबर्दस्ती नहीं होनी चाहिए। 

नये आपराधिक कानून : अधिक क्रूर-अधिक दमनकारी तंत्र की संहिता

तीन आपराधिक कानून ना तो ‘ऐतिहासिक’ हैं और ना ही ‘क्रांतिकारी’ और न ही ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति दिलाने वाले

ये तीन आपराधिक कानून ना तो ‘ऐतिहासिक’ हैं और ना ही ‘क्रांतिकारी’ और न ही ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति दिलाने वाले। इसी तरह इन कानूनों से न्याय की बोझिल, थकाऊ अमानवीय प्रक्रिया से जनता को कोई राहत नहीं मिलने वाली। न्यायालय में पड़े 4-5 करोड़ लंबित मामलों से भी छुटकारा नहीं मिलने वाला। ये तो बस पुराने कानूनों की नकल होने के साथ उन्हें और क्रूर और दमनकारी बनाने वाले हैं और संविधान में जो सीमित जनवादी और नागरिक अधिकार हासिल हैं ये कानून उसे भी खत्म कर देने वाले हैं।

सूचना : वार्षिक सेमिनार

‘नागरिक’ पाक्षिक की ओर से इस वर्ष वार्षिक सेमिनार का आयोजन वाराणसी में किया जा रहा है। सेमिनार का विषय ‘बदलता मीडिया एवं जनसरोकार’ है। 
    

सच में ! बस अब बहुत हुआ !

राष्ट्रपति मुर्मू का बयान

‘‘बस, अब बहुत हुआ’’ राष्ट्रपति मुर्मू का बयान हर अखबार के फ्रंट पेज पर छपा। जो खूब चर्चा का विषय बना। 
    

रूसी क्षेत्र कुर्स्क पर यूक्रेनी हमला - मसखरे जेलेन्स्की की हताशा भरी कार्रवाई

रूसी क्षेत्र कुर्स्क पर यूक्रेनी हमला

जेलेन्स्की हथियारों की मांग लगातार बढ़ाते जा रहे थे। अपनी हारती जा रही फौज और लोगों में व्याप्त निराशा-हताशा को दूर करने और यह दिखाने के लिए कि जेलेन्स्की की हुकूमत रूस पर आक्रमण कर सकती है, इससे साम्राज्यवादी देशों को हथियारों की आपूर्ति करने के लिए अपने दावे को मजबूत करने के लिए उसने रूसी क्षेत्र पर आक्रमण और कब्जा करने का अभियान चलाया। 

बुद्धिजीवी भ्रम बेचते हैं - पार्टी जीतती है, लोग हारते हैं -रंगनायकम्मा

गरीबी का मुख्य कारण पूंजीवादी उत्पादन पद्धति है जो बड़े पैमाने पर श्रम का शोषण करती है

बुद्धिजीवी लोग संविधान और लोकतंत्र को मासूम बच्चों की तरह लागू मानकर चुनाव के मौजूदा दौर पर भविष्यवाणियां कर रहे हैं। ये बुद्धिजीवी चाहते हैं कि कोई ऐसी पार्टी सत्ता में

आलेख

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?