बैरागीवाला घटनाक्रम को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश

Published
Wed, 07/01/2026 - 15:50
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(क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, चेतना आंदोलन, उत्तराखंड महिला मंच, इंसानियत मंच, सी पी आई, सी पी एम, सी पी आई एम एल-लिबरेशन, मजदूर संघर्ष संगठन, तंजीम ए रहनुमा ए मिल्लत, कांग्रेस के प्रतिनिधि, स्वतंत्र पत्रकार त्रिलोचन भट्ट समेत कुल 11 लोगों की टीम देहरादून के विकासनगर क्षेत्र के बैरागीवाला गांव में 13 जून को विनोद कश्यप की हत्या के बाद हुए साम्प्रदायिक उन्माद, हिंसा, तोड़-फोड़ आगजनी के संबंध में तथ्यों की जांच पड़ताल हेतु 18 जून को गई।)

तथ्य ओर निष्कर्ष
    
बैरागीवाला गांव देहरादून से तकरीबन 40 किमी की दूरी पर विकास नगर से कुछ पहले है। गांव में हिंदू-मुस्लिम आबादी मिश्रित है। आबादी का अनुपात लगभग बराबर ही है। ग्राम प्रधान अभी विकी कश्यप है। 
    
मुख्य सड़क से लगभग डेढ़ दो किमी. की दूरी पर मृतक विनोद कश्यप का घर है। इससे आधा किमी. पहले गांव में प्रवेश के दौरान आरोपी मासूम अली का घर है जो अब पूरी तरह तबाह बर्बाद है। बुलडोजर से ध्वस्त है। ट्रैक्टर, ट्रोली, भूसा, कुट्टी मशीन, जानवरों के रहने की जगह सब राख बन चुकी है। इसके आस-पास हिंदू परिवार भी हैं।
    
गांव में प्रवेश के दौरान जगह-जगह तीन-चार के समूह में पुलिसकर्मी मौजूद थे इसके अलावा कुछ जगह पर आई टी बी पी के जवान थे। एक दिन पहले 17 तारीख से प्रशासन ने नाकेबंदी हटा दी थी। अब भीतर बिना किसी रुकावट के प्रवेश करने दिया जा रहा था।
    
तथ्यान्वेषण टीम सबसे पहले मृतक विनोद कश्यप के घर पर गई जहां घर पर भाजपा का प्रतीक कमल लगा हुआ था। मृतक विनोद भाजपा से जुड़ा हुआ था। मृतक के दो भाई अशोक और राजेश तथा उनके पिता से उनके दुख को साझा करते हुए और उन्हें सांत्वना देते हुए टीम ने इस बीच परिजनों से बातचीत की। 
    
पिता और पुत्रों ने इसे साम्प्रदायिक झगड़ा या हिंसा मानने से इंकार कर दिया। उनके हिसाब से यह पुरानी रंजिश के चलते हुआ। तीनों ने ही मुसलमानों के साथ सालों-साल से मोहब्बत से साथ-साथ रहने की बातें बतायीं। बताया कि मृतक की माता जो गांव से ही हैं, द्वारा शादी में हिंदुओं के साथ ही मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा ‘भात देने’ (विवाह की परम्परा में एक रस्म) की रस्म में हिस्सा लिया जाता रहा है। खुद मासूम अली के परिवार के साथ मृतक विनोद कश्यप व उनके लंबे समय से लेन-देन के रिश्ते रहे हैं। मासूम अली और उनके परिवार व रिश्तेदार जिसमें लियाकत, वाजिद आदि हैं, इस परिवार को ही वे इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। 
    
अशोक ने बताया कि असल विवाद पानी का नहीं था। उस दिन हम तीनों भाई वहीं थे। मासूम अली के बेटों से बातचीत होने लगी और बात आगे बढ़ने लगी। तब मासूम अली से मैंने कहा कि चाचा इन्हें समझाओ। मगर मासूम अली ने कहा कि इन्हें मारो। तब उसके परिवार के 30-40 लोग इकट्ठा हो गए। हथौड़े-फावड़े आदि से मारने लगे। इसमें विनोद के सिर पर फावड़े से मारने पर वो गिर गया। फिर भी उसे मारा गया। हमें भी मारा गया इसी में हमें सिर और पसलियों में चोट आई।
    
भाइयों ने बताया कि मृतक विनोद कश्यप पढ़ा-लिखा था। पोस्ट ग्रेजुएट के तौर पर उसने सरस्वती विद्या मंदिर में भी एक वक्त तक पढ़ाने का काम किया फिर उसके बाद कुछ माह पहले शटरिंग का काम शुरू किया था। इस शटरिंग के काम में सामान मासूम अली के परिवार के लोग भी लेकर गए थे। 
    
मृतक के परिवार ने आरोप लगाते हुए कहा कि मासूम अली का परिवार भूमाफिया है। इसके खिलाफ राजेश ने स्थानीय प्रशासन में जो शिकायतें दर्ज की थीं, वह भी दिखाई गयीं। आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायत की कई बीघा जमीन मासूम अली के परिवार ने हड़पी है। राजेश ने कहा कि इस संबंध में उसने एक जनहित याचिका हाईकोर्ट में लगाई है।
    
मृतक विनोद कश्यप के चुनाव लड़ने के संबंध में पूछे जाने पर राजेश ने बताया कि स्कूल में पढ़ाने से पहले विनोद ने ग्राम प्रधान का चुनाव भी लड़ा था। तब उसके खिलाफ मासूम अली के परिवार की महिला खड़ी थी जो चुनाव जीती भी। राजेश ने यह भी आरोप लगाते हुए कहा कि मासूम अली के परिवार से ग्राम प्रधान के कार्यकाल में जमीन की बड़े पैमाने पर धांधली हुई। इस पर आर टी आई भी लगाई गई। 
    
यह पूछे जाने पर कि मासूम अली का परिवार यदि इस हद तक भूमाफिया है तब क्या उसे भाजपा का भी संरक्षण हासिल है क्योंकि अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कोई कार्रवाई तो इससे पहले हुई नहीं। तब राजेश ने इसका जवाब देते हुए कहा कि जमीन की लूट का करोड़ों का खेल है इसमें नीचे से लेकर ऊपर तक पैसा जाता (बंटता) है, अधिकारी-नेता सभी को। कोई भी पार्टी हो, सब इस मामले में एक से हैं।  
    
उन्होंने जोर देकर कहा कि यह मामला केवल रंजिश का है लेकिन इसे सांप्रदायिक बना दिया गया। जब यह पूछा गया कि सांप्रदायिक तत्वों ने यहां हिंसा का तांडव रचा तब आप इसे कैसे देखते हैं। इसका जवाब देते हुए अशोक ने कहा कि सबका अपना नजरिया है। वो गांव में आए शायद, उन्हें लगा कि हिंदू पीड़ित हैं इसलिए वो पक्ष में आए होंगे। बाकी हम उन्हें भी गलत कैसे कहें क्योंकि पीड़ित के पक्ष में आए।
    
तथ्यान्वेषी टीम ने इसके बाद गांव के कुछ लोगों से मुलाकात की। इसमें मुसलमान भी थे। उन्होंने बताया कि गांव से 40 परिवार पलायन कर गए थे। इसकी बड़ी वजह यही थी कि सांप्रदायिक उन्मादी भीड़ जिसमें बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू रक्षा दल के लोग थे जो अश्लील और भद्दी गालियों वाले नारे लगा रहे थे जो काफी उत्तेजक भी थे। एक ओर वे आगजनी तोड़-फोड़ कर रहे थे तो दूसरी ओर नारे लगा रहे थे और पुलिस शुरुवात में उनके साथ-साथ चल रही थी। 
    
इस बीच कुछ मुस्लिम परिवारों ने एहतियात के बतौर और इस डर से भी कि कहीं हमारे पक्ष से भी लोग इसमें न कूद जाएं और फिर सारा आरोप मुस्लिमों पर ही लगे, यहां से पलायन करना ही उचित समझा। लेकिन कई अन्य मुस्लिम परिवार यहीं रहे। अब अधिकतर परिवार आ गए हैं जो अभी नहीं आए हैं वो भी आ जायेंगे। उन्होंने कहा कि इस सांप्रदायिक उन्मादी भीड़ में अधिकतर बाहर के लोग शामिल थे। अंदर गांव से बहुत कम लोग शामिल थे। 
    
उन्होंने यह भी बताया कि ऐसा गांव में पहली बार हुआ वरना यहां हम सभी मिलजुल कर रहते थे। विवाद भी होते थे मगर सुलटा लिए जाते थे। इस विवाद को बाहर से आए लोगों ने इसके लिए मुस्लिम समुदाय को जिम्मेदार ठहराकर इस घटना को हिंसा-आतंक में बदल दिया। 
    
गांव में आरोपी मासूम अली के घर पर आगजनी की गई और बुलडोजर भी चलाया गया। ट्रैक्टर से लेकर सारा सामान तक फूंक दिया गया। मासूम अली और उसके नजदीक दूसरे घर जो उसके रिश्तेदार का था उसमें भी बुलडोजर से तोड़-फोड़ की गई। यह सब लंपट उन्मादी भीड़ नारे लगाते हुए कर रही थी। मामला आगे बढ़ने पर जब पुलिस पर पथराव होने लगा तब उसके बाद पुलिस पहले पीछे हट गई फिर इसके बाद अन्य जगह से पुलिसकर्मियों और आई टी बी पी के आने के बाद इस सांप्रदायिक भीड़ को खदेड़ने और आतंक के माहौल को नियंत्रित किया गया।
    
मासूम अली के घर के बगल में हिंदू परिवार की महिला ने बताया कि मासूम अली गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं और उन्हें अच्छा आदमी बताया हालांकि उनके बेटों को उग्र मिजाज का बताया। और बताया कि उनकी परिवार से ही महिला ग्राम प्रधान रही है। वर्तमान में ग्राम प्रधान विकी कश्यप हैं। महिला ने यह भी बताया कि उस वक्त जब आग लग रही थी और अनाज के बोरों को अपनी चपेट में ले रही थी तब एक पुलिसकर्मी ने दंगे के लिए आए युवकों की पिटाई के बाद उनसे इन बोरों को सुरक्षित जगह पर रखवा दिया। जब आग गैस सिलेंडर के नजदीक पहुंच रही थी तब आरोपी परिवार के डर से चिल्लाने और मदद मांगने पर एक हिंदू युवक जब सिलेंडर को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए घर की ओर बढ़ा तभी पुलिस के आने से डर की वजह से भागने पर वह गिर गया और उसके कमर में चोट आ गई।
    
मासूम अली के तबाह-बर्बाद घर और राख के ढेर में एक कुत्ता है जो हिंदू-मुस्लिम होने के भाव से परे सभी के घर पर खाना खाकर फिर तबाह-बर्बाद कमरे में आकर दुबक जाता है।
    
उपरोक्त बातें साफ-साफ दिखाती हैं कि अपनी शुरुवात से ही यह सांप्रदायिक तो दूर धार्मिक विवाद भी नहीं था। इसमें गांव के साथ-साथ इन दोनों आरोपी और मृतक परिवार के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा थी, आर्थिक हितों का भी टकराव था साथ ही एक-दूसरे के साथ एक हद तक लेन-देन के संबंध भी थे। यह मामले की जड़ में था। तात्कालिक घटना (कथित पानी विवाद) ने पुराने विवाद को मारपीट से हत्या तक पहुंचाया। 
    
मगर इसे हिन्दू फासीवादी संगठनों ने अपने लिए अवसर के रूप में देखा। इस मामले को साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के औजार में बदल दिया। गांव के पैमाने पर हिंसा, अराजकता और आतंक का माहौल खड़ा कर दिया। मुस्लिम समुदाय के लोगों को आतंकित करके उनके पलायन कर जाने की स्थितियां पैदा कर दी गयीं। इस तरह के उपायों से संपति और सामान की लूट-खसोट और कब्जे के हालात पैदा कर दिये गये। 
    
इन संगठनों को राज्य की हिंदू फासीवादी सरकार और इनकी पुलिस का संरक्षण किसी से भी छुपा नहीं है। यह इस घटना में भी साफ दिखा है। विनोद कुमार की हत्या की सजा कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से कोर्ट में तय फैसले से होती। इसमें जो हत्या में शामिल थे उन्हें सजा होती। मगर मकान, जानवर और परिवार के अन्य लोग तथा बच्चे जो इसमें शामिल नहीं थे उन्हें भी सामूहिक दंड का भागी बनाया गया। बुलडोजर चलाकर धामी सरकार ने अपने कुकर्मों पर पर्दा डालने का ही काम किया। और फासीवादी आंदोलन के जहर को और फैलाने का काम किया।
    
मामला यहीं नहीं रुका। जो हिंदू फासीवादी लंपट दंगाई थे और जो वीडियो फुटेज में साफ-साफ दिख रहे थे, उन पर अज्ञात के रूप में मुकदमा दर्ज किया गया (एक को छोड़कर)। गिरफ्तारी नहीं की गई। मगर दूसरी ओर हत्या करने के आरोप में नामजद मुकदमे दर्ज किए गए और गिरफ्तारियां की जा रही हैं। 
    
इसलिए जरूरी है कि ऐसी घटनाओं के जरिए हिन्दू फासीवादी ताकतों को बेनकाब किया जाय। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के हर हथकंडे का कड़ा प्रतिरोध किया जाये।       -देहरादून संवाददाता

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