भारत का कपड़ा उद्योग : महिला मजदूरों के अंतहीन शोषण की कब्रगाह

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कपड़ा उद्योग का वैश्विक स्तर पर साम्राज्यवादी देशों के साथ-साथ पिछड़े पूंजीवादी देशों की भी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है।  यह इस तथ्य से भी पता चलता है कि पिछले कुछ सालों में वस्त्र एवं परिधान उद्योग में भले ही पिछड़े पूंजीवादी देश केंद्रीय भूमिका में ना हों लेकिन उनकी भागीदारी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में काफी मजबूत हुई है। इस हिस्से के बतौर भारत आज विश्व भर में वस्त्र एवं परिधान उद्योग का एक बड़ा केंद्र है।
    
वस्त्र एवं परिधान उद्योग की विनिर्माण क्षमता में भारत का विश्व स्तर पर दूसरा नम्बर है। भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वस्त्र उद्योग का 2.3 प्रतिशत का योगदान है। 2030 तक इसके 5 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। 2023 में वस्त्र तथा परिधान उद्योग में वैश्विक स्तर पर भारत छठा सबसे बड़ा निर्यातक देश रहा (वैश्विक व्यापार में 3.9 प्रतिशत हिस्सेदारी)। वित्त वर्ष 2024 में भारत के वस्त्र एवं परिधान उद्योग की औद्योगिक उत्पादन में 13 प्रतिशत तथा निर्यात में 12 प्रतिशत की हिस्सेदारी रही। वित्त वर्ष 2024 में इस क्षेत्र का निर्यात 34.1 अरब अमेरिकी डालर रहा जिसमें अमेरिकी, यूरोपीय संघ और संयुक्त अरब अमीरात प्रमुख बाजार थे।
    
भारत विश्व में जूट का सबसे बड़ा उत्पादक देश है और पालिएस्टर, विस्कोस, नायलान एवं एक्रेलिक सहित मानव निर्मित फाइबर का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। वस्त्र उद्योग में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति भारत सरकार ने दे दी है। यह कुछ तथ्य अपने आप ही यह साबित करने के लिए काफी हैं कि भारत का वस्त्र एवं परिधान उद्योग भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। 
    
पूरी दुनिया में लगभग 10 करोड़ से अधिक श्रम शक्ति इस क्षेत्र में लगी हुई है। जिसमें भारत में लगभग 4.5 करोड़ से अधिक श्रम शक्ति इस क्षेत्र में कार्यरत है। गौरतलब है कि पूरी दुनिया के हिस्से के बतौर भारत वस्त्र एवं परिधान उद्योग का एक बड़ा क्षेत्र बनता है जिसमें पूरी दुनिया के श्रम शक्ति के हिस्से के बतौर भारत में श्रम शक्ति का एक बड़ा हिस्सा इस क्षेत्र में कार्यरत है। इतनी बड़ी उत्पादन क्षमता और श्रम शक्ति का यह क्षेत्र मजदूरों के शोषण-उत्पीड़न का भी एक बड़ा क्षेत्र बनता जा रहा है। 
    
भारत में वस्त्र एवं परिधान उद्योग में महिला एवं पुरुष मजदूर दोनों ही शामिल हैं लेकिन इस क्षेत्र में एक बड़ा हिस्सा महिला मजदूरों का बन जाता है। भारत में इस क्षेत्र में लगभग 70 प्रतिशत श्रम शक्ति महिला मजदूरों की है। इतनी बड़ी मात्रा में महिला मजदूरों के लगे होने के चलते इस उद्योग को महिला प्रधान उद्योग के बतौर भी चिन्हित किया जाता है। कई बार पूंजीवादी बुद्धिजीवी व भारत सरकार महिलाओं की बड़ी संख्या में इस क्षेत्र में कार्यरत होने के चलते इसे महिला सशक्तिकरण के बतौर भी प्रचारित करती है व अपनी पीठ खुद थपथपाती है।
    
भारत के अंदर वस्त्र एवं परिधान उद्योग के कुछ बड़े शहर व राज्य हैं। जैसे- तिरुपुर (तमिलनाडु) निट गारमेंट्स का हब, सूरत (गुजरात) - सिंथेटिक टेक्सटाइल, लुधियाना (पंजाब) - ऊनी वस्त्र, वाराणसी (यू पी) - बनारसी सिल्क, भीलवाड़ा (राजस्थान) - सूती वस्त्र और यार्न, फरीदाबाद/गुरुग्राम (हरियाणा) - निर्यात आधारित रेडीमेड गारमेंट्स, कोलकाता (पं. बंगाल) - जूट और सिल्क, मुंबई/अहमदाबाद/कोयंबटूर - पारंपरिक कपड़ा मिलें आदि। लेकिन लघु उद्योगों के स्तर पर भी अनेकों राज्यों/शहरों में काम होता है। जिसमें शोषण-उत्पीड़न की मात्रा और भी ज्यादा खतरनाक व कार्य परिस्थितियां मजदूरों के लिए अत्यधिक कष्टकर व अमानवीय हैं। 
    
भारत में औद्योगिक उत्पादन का यह क्षेत्र मजदूरों के लिए विशेष कर महिला मजदूर जो कि इस उत्पादन में बड़ी संख्या में लगी हुई हैं, के लिए एक धीमा जहर बनता जा रहा है। शोषण-उत्पीड़न की तो बात ही छोड़ दें यह क्षेत्र महिला मजदूरों के लिए उनकी कब्रगाह बनता जा रहा है जिसे हम इस बात से समझ सकते हैं कि हर साल इस क्षेत्र में काम करने वाले महिला व पुरुष मजदूर गंभीर बीमारियों के चलते असमय ही अपने जीवन से हाथ धो रहे हैं।
    
भारत में गैर सरकारी संगठन व कुछ निजी संस्थाओं ने इस क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों के बीच कुछ सर्वे किया है हालांकि यह सर्वे बहुत कम इलाकों या यूं कहें कि कुछ बस्तियों में किया है फिर भी इस सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले हैं। 
    
2008 में इंडियन जरनल आफ कम्युनिटी मेडिसन ने लघु स्तरीय परिधान उद्योग में लगे हुए श्रमिकों का सर्वे किया। सर्वे कोलकता के एक झुग्गी झोंपड़ी वाले इलाके में किया गया। सर्वे का मुख्य विषय मजदूरों का स्वास्थ्य संबंधी था। सर्वे के नतीजे हैरान व परेशान कर देने वाले थे। लेकिन इन सब के बावजूद भी आज ऐसे कई सर्वे के नतीजों को सरकार ठंडे बस्ते में डाल दे रही है। 
    
सर्वे के नतीजे बताते हैं इस उद्योग में लगे हुए मजदूर में लगभग 69.64 प्रतिशत में मस्कुलोस्केलेटल (मांसपेशी हड्डियों व जोड़ों में दर्द की समस्या) की समस्या सबसे आम समस्या थी। इसके अलावा त्वचा रोग- 25 प्रतिशत, सामान्य कमजोरी- 14 प्रतिशत, एसिडिटी और सीने में जलन- 26.79 प्रतिशत, मासिक धर्म संबंधी समस्याएं- 5.36 प्रतिशत, अनिद्रा- 21.43 प्रतिशत, दृष्टि संबंधी समस्याएं- 12.05 प्रतिशत, एनीमिया- 8.93 प्रतिशत, चोट- 9.82 प्रतिशत, कोनी स्टमकाइटिस (होठों पर घाव सूजन का रोग)- 14.1 प्रतिशत, पैरों में सूजन- 7.4 प्रतिशत, उच्च रक्तचाप- 16.07 प्रतिशत, कुपोषण- 37.50 प्रतिशत, इसके अलावा खांसी और जुकाम, दस्त, बुखार और पेट दर्द आम समस्या पाई गईं। यहां सर्वे के आंकड़े एक छोटी सी झलक मात्र हैं जो एक ही इलाके में काम करने वाले मजदूरों पर आधारित हैं। अगर पूरे देश के स्तर पर इस तरह के सर्वे आयोजित किए जाएं तो जो तस्वीर निकल कर सामने आएगी, वह काफी भयावह होगी। 
        
जैसा कि सभी जानते हैं वस्त्र एवं परिधान उद्योगों में कार्यरत महिला मजदूरों को लंबे समय तक मशीनों के साथ काम करने, रसायनों के संपर्क में रहने और अस्वच्छ वातावरण के कारण कई प्रकार की बीमारियां और स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन बीमारियों में अगर मुख्यतः देखें तो पेशी और अस्थि संबंधी समस्या जिसमें कमर दर्द, गर्दन दर्द, लंबे समय तक खड़े रहने या एक ही मुद्रा में काम करने से होती हैं। जोड़ों में दर्द, गठिया जैसी बीमारियां निरंतर दोहराए जाने वाले काम से होती हैं। वर्नाल सिंड्रोम पैरों में नसों का सूजना, लंबे समय तक खड़े रहने से होता है। त्वचा संबंधी रोग, एक्जिमा और एलर्जी, रंगाई-छपाई व धुलाई में प्रयुक्त रसायनों के संपर्क से होते हैं। फंगल संक्रमण, गीले व गर्म और अस्वच्छ कार्य वातावरण में काम करने से होते हैं। श्वसन संबंधी रोग, सिलिकोसिस या ब्रोंकाइटिस, कपास के रेशों और धूल से फेफड़ों में सूजन हो जाती है। दमा, लगातार धूल और केमिकल के संपर्क से होता है। इसके अलावा प्रजनन पर प्रभाव, अनियमित मासिक धर्म, अत्यधिक शारीरिक श्रम और तनाव के कारण, गर्भावस्था संबंधी जटिलताएं, रसायनों के कारण गर्भावस्था में शिशु पर असर, गर्भपात का खतरा, मानसिक स्वास्थ्य समस्या, तनाव और चिंता, अत्यधिक काम का दबाव, यौन उत्पीड़न आदि, कम वेतन, असुरक्षित माहौल, घरेलू जिम्मेदारियां, आंखों की समस्याएं, दृष्टि में कमजोरी कम रोशनी में सिलाई या कढ़ाई करने से लगातार भारी काम करने से आंखों में जलन, रासायनिक धुएं और कपास के रेशों के कारण, इसके अलावा इन क्षेत्रों में लगी हुई महिलाओं में रसायनों के संपर्क के कारण कैंसर जैसी बीमारी भी देखने को मिल जाती हैं। 
    
इन गम्भीर समस्याओं के बावजूद भी इस क्षेत्र में कार्यरत महिला मजदूरों को कई बार कंपनियां सुरक्षा उपकरण ग्लव्स मास्क, जूते जैसी चीज तक भी मुहैय्या नहीं करातीं। साथ ही कई बार फैक्टरियां इस तरह से बनाई जाती हैं कि उनमें वेंटिलेशन का भी सही तरह से ध्यान नहीं रखा जाता। इस सबके चलते मजदूर महिलाएं लगातार गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रही हैं जिसका उन्हें अहसास तक भी नहीं होता कि यह बीमारियां इन कंपनियों में काम करने के दौरान उनको लगी हैं। इसके अलावा कई बार फैक्टरियों में मजदूरों को ईएसआई, पीएफ जैसी बुनियादी सुरक्षा भी नहीं दी जाती जिसके चलते कई बार गंभीर बीमारियों की शिकार होने के कारण महिलाएं या तो प्राइवेट अस्पतालों से महंगा इलाज कराने को बाध्य होती हैं या कई बार महंगा इलाज न करा पाने के चलते अपने जीवन से हाथ धो बैठती हैं। 
    
इसका एक अन्य कारण मजदूरों को अलग-अलग स्तरों में बांटना भी है। जिसमें स्थाई मजदूर, ठेका, कैजुएल, एफ टी ई के तहत, पीस रेट पर काम करने वाले, दिहाड़ी मजदूर आदि शामिल हैं जो और भी ज्यादा शोषण-उत्पीड़न की मार झेलने को अभिशप्त हैं। इस तरह की महिला मजदूर आज बड़ी संख्या में हैं जिन्हें ईएसआईसी, इपीएफ, बोनस, न्यूनतम वेतन, मातृत्व अवकाश जैसी कोई भी सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती। यह सब पूंजीपति वर्ग के लिए बेहद मुफीद है क्योंकि इससे उसके मुनाफे में इजाफा होता है। 
    
एकाध फैक्टी में क्रेच जैसी सुविधा तो हैं लेकिन उनकी शर्त व उनमें रखरखाव इस तरह का है कि कई बार स्थाई महिला मजदूर भी अपने बच्चों को उसमें नहीं डाल पातीं। अन्यों की तो बात ही क्या करें उन्हें तो पहले ही इस सुविधा से बाहर कर दिया गया है। 
    
महिला मजदूरों के लिए जो एक और बड़ी जरूरत बनती है वह है मातृत्व अवकाश, लेकिन इस ओर देखें तो यह एक और बुरी तस्वीर पेश करती है। क्या स्थायी और क्या ठेका मजदूर दोनों की स्थिति एक समान है, किसी को भी सवैतनिक मातृत्व अवकाश नहीं दिया जाता। ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने आते हैं कि जहां ठेका मजदूरों को या तो गर्भवती होने के दौरान काम से निकाल दिया जाता है या उन्हें काम छोड़ना पड़ता है। कई बार तो यह भी देखने को मिलता है कि ठेका मजदूर अपनी गर्भावस्था को छिपाती हैं जो उनके लिए कई बार जानलेवा भी हो जाता है। रही बात स्थाई मजदूरों की तो इनकी स्थिति भी कुछ अच्छी नहीं है। स्थाई मजदूर को छुट्टी तो दी जाती है लेकिन उसका कोई वेतन नहीं दिया जाता। न ही ईएसआईसी से उनको पैसे दिये जाते हैं। ऐसे कई मामले हमारे सामने आते हैं कि जब कोई मजदूर गर्भवती होने पर मातृत्व अवकाश लेती है तो उस पीरियड को पूरा करने के बाद जब वह कंपनी में वापस जाती है तो अपने ईएसआईसी के पैसे के लिए उसे कई चक्कर काटने पड़ते हैं। कोर्ट वगैरह में केस करने के बाद उसको पैसा तो मिल जाता है लेकिन कंपनी उसको या तो काम पर रखती नहीं या नयी भर्ती के बतौर दिखाती है। उसकी जो पुरानी नौकरी थी उसको खत्म कर दिया जाता है।
    
ऐसे ही बड़ी संख्या में महिला मजदूरों के काम करने के बावजूद भी इन फैक्टरियों में काम करने वाली महिला मजदूरों को कई बार छेड़छाड़, अपमान व यौन हिंसा झेलनी पड़ती है। सुपरवाइजर, इंजीनियर, मैनेजर द्वारा गाली-गलौज, अपमानजनक अश्लील शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो कि आम बात है। ऐसे कई मामले कई बार प्रकाश में भी आते रहते हैं। लेकिन इतना बड़ा हब होने के बावजूद भी कई कंपनियां विशाखा गाइडलाइन के तहत कंपनी के अंदर कोई शिकायत निवारण कमेटी नहीं बनाती हैं और अगर कमेटी बनाती भी हैं तो वह इतनी गुपचुप और इस तरह से बनाई जाती है कि उसकी जानकारी तक महिला मजदूरों को नहीं होती। अगर कोई सचेत महिला मजदूर किसी तरह से शिकायत निवारण कमेटी में अपनी शिकायत करती भी है तो उस शिकायत का निपटारा कंपनी प्रबंधन उस महिला मजदूर को ही काम से निकाल कर करता है। ऐसे में कई दफा छेड़छाड़ करने वाले और पीड़ित मजदूर महिला दोनों को समान दोषी मानकर भी कार्रवाई की जाती है। ऐसे में बड़ी संख्या में जब महिला मजदूरों के साथ ऐसा बर्ताव होता भी है तो वह सिर्फ इस डर से कि उन्हें भी काम से निकाल दिया जायेगा वे अपने साथ होने वाली छेड़छाड़ को या तो चुपचाप बर्दाश्त करती हैं या फिर काम छोड़ने पर मजबूर होती हैं। 
    
ऐसे ही मजदूरों के अलग-अलग स्तरों के चलते सरकार और पूंजीपति वर्ग इन मजदूरों को आपस में प्रतिस्पर्धा के लिए भी प्रयोग करता है। उदाहरण के लिए पीस रेट पर काम करने वाली अधिकतर महिला मजदूरों पर ज्यादा पीस बनाकर ज्यादा पैसा कमाने का एक दबाव होता है ताकि वह जिस वक्त काम न कर पाए या काम उसे न मिले तो उसकी भरपाई कर पाएं। क्योंकि पीस रेट पर तभी काम ज्यादा मिलता है जब काम का टारगेट ज्यादा हो। नहीं तो कई बार बहुत कम काम भी मिलता है। दूसरी तरफ जो कंपनी के अंदर स्थाई कर्मी हैं या ठेका मजदूर, उन पर यह दबाव बनाया जाता है कि वह पीस रेट में जितने पीस बन रहे हैं, घंटे के हिसाब से वह भी हर घंटे उतने पीस बनाये या उससे भी ज्यादा पीस बना कर दें। ऐसे में मजदूरों की ही आपसी प्रतिस्पर्धा को बढ़ा कर मुनाफे के द्वार खोले जाते हैं। कई बार तो ठेका मजदूरों को भी स्थाई होने का लालच देकर उत्पादन बढ़ाने का दबाव दिया जाता है। कई महिला मजदूर अनेकों  बीमारियों से जिनका हम ऊपर जिक्र कर चुके हैं, शिकार होतीं हैं। सिर्फ इतना ही नहीं कई बार तो बेहोश तक हो जाती हैं। एक तरफ मैनेजमेंट टारगेट का दबाव बनाता है वहीं उत्पादन पूरा होने पर काम नहीं है, का बहाना बनाकर भी ब्रेक देकर कम काम के समय वेतन देने से बचने का रास्ता भी खोज लेता है। 
    
इन फैक्टरियों में वेतन के मामले में भी कई असमानताएं हैं। कई बार तो स्थाई मजदूरों को भी राज्य के तय मानकों से भी कम वेतन दिया जाता है व अन्य मजदूरों की तो बात ही क्या करें। बड़ी संख्या में काम करने के बावजूद भी 5 से 6 या 10-15 हजार रु. महीने में इन मजदूरों से काम कराया जाता है। इसके अलावा कई बार मजदूरों पर यह भी दबाव बनाया जाता है कि वह एक साथ दो-दो मशीनों को आपरेट करें और ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करके दें। बड़ी संख्या में महिला मजदूरों के काम करने के बावजूद आज भी इस सेक्टर में महिला व पुरुष मजदूरों के वेतन में अंतर है। 
    
इतना ही काफी नहीं जब से केंद्र में मोदी सरकार आयी है, अपने फासीवादी एजेंडे के तहत यह मजदूरों पर लगातार हमला बोल रही है। इन हमलों में नई चार श्रम संहिताएं भी शामिल हैं। जिसके तहत महिला मजदूरों पर एक बड़ा हमला मोदी सरकार ने बोला है। श्रम संहिताओं में महिलाओं से रात की पाली में काम कराए जाने के कानून को पास करके मोदी सरकार ने महिला मजदूरों की सुरक्षा को एक गंभीर खतरे में डाल दिया है। साथ ही उनके सस्ते श्रम की लूट का पूंजीपतियों के लिए हर ओर से रास्ता साफ कर दिया है। जिसके परिणामस्वरूप जबकि यह नए कानून अभी लागू नहीं हुए हैं लेकिन अलग-अलग फैक्टरी में इसके तहत मजदूरों से काम कराया जाना शुरू कर दिया गया है। कई फैक्टरियां महिला मजदूरों से रात की पाली में भी काम करा रही हैं। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि दो-दो शिफ्ट का काम भी महिलाओं से लिया जा रहा है। वह भी बिना किसी सुरक्षा के गारंटी के।  
    
पहले से ही बहुत कम सुविधाओं, अभावों में काम कर रहे मजदूरों पर आज चौतरफा हमला बोल दिया गया है। एक तरफ भाजपा-आरएसएस का संघी फासीवादी प्रचार जो महिलाओं को मध्यकालीन मूल्य-मान्यताओं के चलते घरों में कैद कर लेना चाहता है जिसके तहत वह महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर लगातार हमले बोले जा रहा है। ऐसे में भारत की मेहनतकश मजदूर आबादी के हिस्से के बतौर देर-सबेर इसके खिलाफ महिला मजदूरों को आवाज बुलन्द करनी होगी। यह कोई ऐसा काम नहीं जो संभव नहीं। हमे बंगलुरु की उन महिला मजदूरों से सीखना होगा जिंन्होंने मोदी सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। 
    
2016 में जब मोदी सरकार ने पीएफ निकालने की सीमा 58 साल कर दी थी तब बंगलुरु के वस्त्र एवं परिधान उद्योगों की महिला मजदूरों ने सड़कों पर आकर मोदी सरकार के इस तुगलकी फरमान को वापस लेने के लिए हल्ला बोल दिया था। संघी सरकार को कानून वापस लेने पर मजबूर कर दिया था।
    
बंगलुरु में जो महिला मजदूरों ने किया आज ऐसे ही नये श्रम कानूनों के विरोध में संघर्ष खड़े करना अति आवश्यक बन जाता है। उसके साथ-साथ इन उद्योगों में लगी महिला मजदूरों को अपनी यूनियन बना कर एकता कायम करनी होगी। मजदूर एकता का झंडा बुलंद कर मोदी सरकार व पूंजीवादी व्यवस्था को पीछे धकेलना होगा, बिना इनको पीछे धकेले इनकी मुनाफे की हवस को खत्म नहीं किया जा सकता।
      (तथ्य व आंकड़े इंडियन एक्स्प्रेस से)
 

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