फ्रांस में ‘‘सब कुछ रोको आंदोलन’’

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फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों रूस-यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन की मदद करने के चक्कर में फ्रांसीसी मजदूर-मेहनतकश अवाम के ऊपर लगातार आर्थिक बोझ डालकर उनकी जिंदगी को और ज्यादा असहनीय बनाते जा रहे हैं। एक तरफ तो वे एकाधिकारी पूंजीपतियों को रियायतें दर रियायतें दे रहे हैं और दूसरी तरफ मजदूरों की छुट्टियों में कटौती कर रहे हैं, पेंशन में कटौती कर रहे हैं, काम करने की उम्र बढ़ा रहे हैं, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सेवाओं के मद में कटौती कर रहे हैं। ऐसी हालत में फ्रांस के अंदर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकट गहराता जा रहा है। पिछले दो वर्षों के दौरान चार प्रधानमंत्रियों की सरकारें गिर गई हैं। लेकिन मैक्रों पीछे हटने को तैयार नहीं है। फिर से उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए पांचवें प्रधानमंत्री की नियुक्ति की गयी है। लोगों का गुस्सा चरम पर है। 
    
इसकी अभिव्यक्ति पहले 8 सितम्बर को प्रधानमंत्री बायरू द्वारा विश्वास मत हासिल करने में बुरी तरह असफलता में मिली और बायरू की सरकार गिर गयी। इसके बाद 10 सितम्बर को नये प्रधानमंत्री की नियुक्ति के बाद समूचे फ्रांस में मजदूरों और व्यापक मेहनतकश अवाम द्वारा ‘‘सब कुछ रोको’’ आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन में लाखों लोग शामिल हुए। इस आंदोलन को कुचलने के लिए मैक्रों ने 80 हजार पुलिसकर्मियों को तैनात किया। पुलिस ने शांतिपूर्ण रैलियों पर हमले किये और पेरिस सहित कई शहरों में विरोध प्रदर्शनों पर ड्रोन उड़ाये। समूचे फ्रांस में 540 लोगां को गिरफ्तार किया, इसमें 211 लोग अकेले पेरिस में गिरफ्तार किये गये। 
    
इन विरोध प्रदर्शनों में वे मजदूर यूनियनें भी शामिल होने को मजबूर हुईं जो अभी तक मजदूरों को एक दायरे के भीतर ही रखती थीं और इस तरह पूंजीवादी सत्ता की मदद करती थीं। सी.जी.टी. और मेलेनचान की पार्टी एल.एफ.आई. ने भी मजदूरों के ‘‘सब कुछ रोको’’ आंदोलन को समर्थन दिया। वे ऐसा करने के लिए मजबूर हो गये। यह आंदोलन सोशल मीडिया के व्यापक इस्तेमाल के चलते फ्रांस में फैल गया। इस आंदोलन का नेतृत्व किसी स्थापित पार्टी के द्वारा नहीं किया गया। यह कुछ वर्ष पहले येलो वेस्ट आंदोलन की तरह ही और उससे और ज्यादा बढ़कर था। 
    
फ्रांस में नये प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्न् की नियुक्ति के बाद यह गुस्सा और तेज हो गया है। मौजूदा आंदोलन 10 सितम्बर के आह्वान तक ही सीमित नहीं रहेगा। 18 सितम्बर को एक और बड़े पैमाने पर आंदोलन को बढ़ाने की योजना है। 
    
जिन वजहों से फ्रांस गम्भीर आर्थिक संकट में फंसा हुआ है, उन वजहों को और बढ़ाया जा रहा है। फ्रांस के ऊपर कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद का 118 प्रतिशत है और घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 5.8 प्रतिशत है। यह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक स्थिति कही जायेगी। इससे निपटने के लिए मैक्रों की सत्ता ने 2026 तक 43.8 अरब यूरो के खर्चों में कटौती की घोषणा की। 
    
एक तरफ मौजूदा शासन ने मजदूरों की जिंदगी को और ज्यादा असहनीय बनाने के लिए सामाजिक मदों में कटौती की, उनके काम के घण्टे छुट्टियों में कटौती करके बढ़ाये, दूसरी तरफ रक्षा बजट में खर्च लगभग दो गुना करने की योजना पेश कर दी। फ्रांसीसी मजदूर-मेहनतकश आबादी भले ही भयावह गरीबी और फटेहाली में चली जाय, यूक्रेन की मदद के लिए अरबों यूरो का प्रावधान रखा जा रहा है। यह मैक्रों को यूरोप में रूस के विरुद्ध लड़ने वाला नायक बनने में तो शायद मददगार बन सकता है, लेकिन इसकी कीमत फ्रांस की मजदूर-मेहनतकश अवाम को चुकानी पड़ रही है। सेना का बजट फ्रांस में 2017 में 32 अरब यूरो था जिसे बढ़ाकर 2030 तक 64 अरब यूरो किया जा रहा है। 
    
इसी के साथ ही, पूंजीपतियों और सम्पत्तिशाली वर्गों को सम्पत्ति कर में 4.5 अरब यूरो की प्रति वर्ष छूट और पूंजीगत आय पर प्रतिवर्ष 9 अरब यूरो की छूट दी जा रही है। यह एकाधिकारी पूंजीपतियों को 211 अरब यूरो की सार्वजनिक सहायता देने के प्रावधान के अतिरिक्त समाज के परजीवी पूंजीपति वर्ग की मदद के चलते फ्रांस की सरकार पर कर्ज बढ़ गया है। जो कुल मिलाकर 2017 से लेकर अब तक 10 खरब यूरो हो गया है। इससे महंगाई बढ़ रही है। 
    
ऐसी स्थिति में, फ्रांस में मजदूर वर्ग का यह व्यापक विरोध प्रदर्शन उनके गुस्से का इजहार तो कर रहा हैं, लेकिन जब तक पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने की सोच से लैस मजदूर वर्ग की कोई संगठित शक्ति खड़ी नहीं होती है, तब तक इस व्यापक विरोध प्रदर्शन का फायदा उठाने के लिए दक्षिणपंथी ताकतें आगे आयेंगी। आज फ्रांस की यही स्थिति है। धुर दक्षिणपंथी ली पेन की पार्टी मैक्रों की सत्ता के विरुद्ध बढ़ रहे असंतोष और गुस्से को भुनाने के लिए तैयार है। फ्रांस के एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग का बड़ा हिस्सा उसे एक वैकल्पिक इंतजाम के रूप में पाल-पोस रहा है। उसकी यूक्रेन की मदद करने विरोधी लफ्फाजी मजदूरों के एक हिस्से को प्रभावित भी कर रही है। मैक्रों के विरुद्ध बढ़ रही नफरत का इस्तेमाल धुर दक्षिणपंथी ताकतें कर ले रही हैं। यही आज की स्थिति है। इस स्थिति में मैक्रों का पतन दूर की बात नहीं है। 

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