घर बनाते बनाते

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2 BHK 3 BHK के होर्डिंग सड़कों पर लगे हुए हैं। एक मुस्कुराता हुआ इंसानी जोडा और उनके साथ दो बच्चे खेलते हुए। ऐसा ही विज्ञापन होता है अखबारों में, मकान बेचने वाले पम्फलेट में। इसके साथ में होती हैं खूबियां कि ये नया घर रेलवे स्टेशन से कितनी दूर है, बस अड्डे से कितनी दूर है, चौबीस घंटे बिजली-पानी, सिक्योरिटी, ग्रीन एरिया इत्यादि। ये घर 25 लाख से शुरू होकर करोड़ों तक की रेंज के होते हैं। 
    
घर कैसा होना चाहिए, एक बालकनी, कमरे हवादार हों, खिड़कियां हों। किचन और बाथरूम में टाइल्स होनी चाहिए। दो बेडरूम और एक ड्राइंग रूम होना चाहिए। ड्राइंग रूम में सुन्दर डिजाइन की सेन्टर टेबल के साथ सोफा सेट होना चाहिए। घर ऐसा होना चाहिए कि उसे लोग देख तो सकें लेकिन उसके अन्दर न आ सकें उसके लिए सुन्दर सा गेट। घर बनाते समय सोच ऐसी होती है कि घर बड़ा होना चाहिए कि कोई रिश्तेदार आ जाये तो कोई दिक्कत न हो लेकिन घर बनाते-बनाते तो ऐसा हो जाता है कि रिश्तेदारी तो क्या सगे भाइयों में भी लाठी और ईटें चल जाती हैं। मुन मुटाव ऐसा कि कोई किसी की शक्ल तक देखना नहीं चाहता और कोई किसी के घर जाना नहीं चाहता और न ही कोई किसी को बुलाना चाहता है। आज सोफा सेट तो है लेकिन घर के लोग ही उस पर लेटते-बैठते हैं। वैसे तो पूरे घर की परिकल्पना ही ऐसी होती है कि उसमें बाहरी व्यक्ति के लिए आधे-एक घंटे से ज्यादा रुकना बहुत मुश्किल होता है। 
    
घर की हर चीज घर के लोगों के लिए डिजाइन की होती है उसमें बाहरी व्यक्ति बड़ी मुश्किल से समा पाता है। शानदार डिजाइन, इन्टरनल डेकोरेशन, स्मार्ट किचन, स्मार्ट बाथरूम और उसके बाद सोफे पर एसी रूम में बैठकर बहुत अच्छा लगता है पर्यावरण के बारे में पढ़ते हुए। पर्यावरण के नाम पर पौधे आज घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं। घर ऐसा होता है जिसमें आदमी खुद को कैद कर लेता है और बाहर की दुनिया से कट जाना चाहता है। क्योंकि यह समाज अच्छा नहीं है। ऐसे समाज से कट जाना ही बेहतर है। अब उसकी मंजिल घर है। घर में अच्छे से रहने के लिए ही वह घर से बाहर निकलता है उन सामानों को पाने के लिए जो उसे घर में चाहिए।
    

निचले तबके के लोग भी इसी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए कुछ करते हैं। वे रजिस्ट्री वाली जमीनें तो खरीद नहीं सकते तो मुख्य शहर से दूर कहीं नयी जगह जमीन खरीदते हैं। जहां सीवर या पानी व नाली की कोई व्यवस्था नहीं होती है। और सरकार की नजर में वे अवैध निर्माण हैं। इससे पहले तो मजदूर ठेले, खोमचे, रेहड़ी, फेरी और आटो वाले किसी खाली पड़ी जमीनों पर झुग्गी बनाकर रहने लगते थे, लेकिन वह अब खत्म होता जा रहा है।  
    
आजकल घरों में स्टील की रेलिंग लगती है जिसमें जंग नहीं लगती मगर रिश्तों में जंग जरूर लग चुकी है। इंसान घर केवल जिंदा रहने के लिए नहीं खरीदता बल्कि मरने के लिए भी खरीदना चाहता है। किराये के मकान में कोई मरना नहीं चाहता। जिससे उसको उसके घर वाले कुछ समय तो याद कर सकें। कोई मुझसे पूछता है कि तुम कहां के रहने वाले हो तो अगर मैं कहूं कि मैं भारत का रहने वाला हूं तो यह अधूरी बात होगी। भारत में कहां उत्तर प्रदेश, उत्तर प्रदेश में कहां, बहराइच, बहराइच में कहां, नयी बस्ती में कहां? नयी बस्ती में हमारे दादा जी रहते थे। हमारे पिताजी थोड़े बड़े हुए तो कानपुर आकर रहने लगे। अब हम लोग गुड़गांव में एक मजदूर बस्ती में रहते हैं। गांव में अब हमारा कुछ भी नहीं है। पत्नी के बार-बार कहने पर शहर से आठ किलोमीटर दूर खेतों में एक टुकड़ा लिया अब उसी में एक टिन की चद्दर डालकर रहते हैं। प्रापर्टी डीलर ने उस 32 गज के टुकड़े को दुकान कहकर बेचा था लेकिन उसी टुकड़े में बिना किसी पार्टीशन के सब कुछ है। सरकार की नजर में यह अवैध है। 
    
इमारतें सभ्यता का प्रतीक होती हैं। आज जो घरों की हालत है उससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि सभ्यता कहां पहुंच गयी है। लाखों रुपये खर्च करके एक छोटा सा घर हासिल हुआ है। इसके लिए रोटी और सब्जी में कटौती तक की है। आज उस घर के बाथरूम में खुलकर अगर नहाने लग जाओ तो कोहनी दीवार से टकरा जाती है। बस एक मग और डालकर बाहर आ जाता है। ये दर्द ऐसा होता है कि जिसे किसी को बताया भी नहीं जा सकता और न ही इलाज हो सकता है। संस्कृति ऐसी है कि हर घर दूसरे घर से अच्छा दिखना चाहता है। आदमी बन्दरों में लंगूर और लंगूरों में बन्दर बनना चाहता है। इंसान भी बन्दरों की एक प्रजाति से विकसित हुआ लेकिन बंदरों की प्रकृति के विपरीत ये घर बनाने लगा और आजाद जंगलों से कंकरीट के जंगलों में फंस गया। स्थायी घरों ने एक समय में सभ्यता का विकास किया लेकिन आज स्थायी घरों में मानव ने खुद को कैद कर लिया है। 
        -इबलीस, फरीदाबाद
 

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