हाल के दिनों में हरिद्वार में कुछ दक्षिणपंथी और धार्मिक संगठनों (अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, परशुराम अखाड़ा आदि) ने ‘वेज बिरयानी’ नाम के खिलाफ अभियान चलाया है। दुकानों और ठेलों पर ‘वेज बिरयानी’ की जगह ‘वेज पुलाव’ लिखने के लिए दबाव बनाया गया, स्टिकर लगाए गए और यह तर्क दिया गया कि ‘बिरयानी’ शब्द हरिद्वार की धार्मिक पहचान के अनुरूप नहीं है।
कुछ धार्मिक संगठनों के नेताओं ने यह भी कहा कि ‘बिरयानी’ मुस्लिम पहचान या मुगल काल से जुड़ा शब्द है और इसलिए इसे हरिद्वार जैसे तीर्थ नगरी में नहीं होना चाहिए।
क्या ‘बिरयानी’ कोई धार्मिक शब्द है?
तथ्य यह है कि बिरयानी एक खाद्य व्यंजन है, कोई धार्मिक प्रतीक नहीं। भारत में हैदराबादी, लखनवी, मालाबार, कोलकाता और कई अन्य प्रकार की बिरयानियां बनाई जाती हैं। समय के साथ शाकाहारी बिरयानी भी भारतीय खानपान का हिस्सा बन चुकी है। भोजन का नाम किसी व्यक्ति के धर्म का प्रमाण नहीं होता।
यदि किसी भोजन, शब्द या सांस्कृतिक परंपरा को बिना आधार ‘जिहादी’ कह दिया जाए, तो यह एक पूरे समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह और नफरत को बढ़ावा देना दिखाता है। ‘जिहादी’ शब्द को हिंसक उग्रवाद के रूप में जोड़ कर आज आरएसएस-भाजपा व हिन्दू कट्टरपंथियों द्वारा खूब प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। किसी खाने के नाम या सामान्य सांस्कृतिक प्रथा के लिए इसका प्रयोग तथ्यात्मक गलत भी है।
इतिहासकारों और भाषाविदों के अनुसार ‘बिरयानी’ शब्द की जड़ें फारसी भाषा में मानी जाती हैं। सबसे प्रचलित मत यह है कि यह फारसी शब्द ‘बिरयान’ या ‘बिरियान’ से निकला है, जिसका अर्थ है ‘भूनना’ या ‘पकाने से पहले तलना/भूनना’।
एक अन्य व्याख्या के अनुसार यह फारसी शब्द ‘बिरिंज’ से जुड़ा है, जिसका अर्थ ‘चावल’ होता है।
‘बिरयानी’ एक खाद्य व्यंजन का नाम है, कोई धार्मिक शब्द नहीं। भोजन के इतिहास में फारसी, तुर्की, मध्य एशियाई और भारतीय परंपराओं का आपसी प्रभाव रहा है।
आज की भारतीय बिरयानी, विशेषकर हैदराबाद, लखनऊ, कोलकाता आदि की बिरयानियां, सदियों के सांस्कृतिक मेल-जोल का परिणाम है और इनका वर्तमान स्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप में विकसित हुआ है।
उत्तराखंड में धार्मिक उन्माद व वैमनस्य फैलाने के काम जुटी सरकार व हिन्दू कट्टरपंथी कहीं लैंड जिहाद तो कही थूक जिहाद, पेपर लीक जिहाद आदि का हल्ला काट एक खास समुदाय के खिलाफ नफरत का माहौल बना रहे हैं। कुछ दिन पहले कोटद्वार में बाबा शब्द पर बजरंगियों ने बवाल काटा। पूरे शहर को साम्प्रदायिक रंग में रंगने की कोशिश की। शासन प्रशासन मौन रहा। आज जब हरिद्वार में बिरयानी शब्द को लेकर बवाल काटा जा रहा है, यहां भी शासन-प्रशासन मौन है।
एक तरफ बेरोजगारी, महंगाई, मजदूरों की समस्याएं, किसानों की परेशानियां और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे बड़े मुद्दे पर सरकार मौन धारण किये हुए है। दूसरी तरफ सरकार व हिन्दू कट्टरपंथी संविधान को ताक पर रख कर साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने के लिए रात-दिन लगे रहते हैं।