इजरायल-ईरान के बीच जंग के हालात

1 अप्रैल को सीरिया की राजधानी दमिश्क में ईरानी राजनयिक भवन पर इजरायल ने हमला बोल दिया था। इस हमले में ईरान के वरिष्ठ इस्लामी नेता मोहम्मद रजा जाहेदी व रिवोल्यूशनरी गार्ड (ईरानी सेना) के 8 अधिकारी मारे गये थे। इस हमले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए ईरान के शीर्ष नेता ने बदला लेने का वायदा किया था। अंततः 2 हफ्ते बाद 13 अप्रैल की रात को ईरान ने 200 से अधिक मिसाइलें इजरायल पर दाग दीं। ईरान के इस हमले से दुनिया में इजरायल-ईरान के बीच जंग का एक नया मोर्चा खुलने का खतरा मंडराने लगा है। 
    
इजरायल-ईरान के मध्य लम्बे समय से चल रहे प्राक्सी युद्ध के सीधे युद्ध में बदलने की जब तब आशंका व्यक्त की जाती रही थी। जब से अमेरिकी शह पर इजरायल ने फिलिस्तीनी जनता का कत्लेआम शुरू किया है तब से ईरान अमेरिका-इजरायल के इस नरसंहार का खुलेआम विरोध करता रहा है। फिलिस्तीन के पक्ष में हिजबुल्ला-हौथी के लड़ाकों का भी वह खुलकर समर्थन करता रहा है। ईरान के इस विरोध के चलते ही इजरायल ने उसके सीरिया स्थित राजनयिक भवन पर जानबूझकर हमला किया व शीर्ष नेता व 8 अधिकारियों की हत्या कर दी। इस हमले के विरोध में ही ईरान आत्मरक्षा के तर्क पर 13-14 अप्रैल को मिसाइली हमले को मजबूर हुआ। 
    
हालांकि ईरान ने लगभग 200 मिसाईलें दागीं पर इजरायल के मिसाइल डिफेंस सिस्टम ने अमेरिकी-ब्रिटिश मदद से ज्यादातर मिसाइलें हवा में नष्ट कर दीं। केवल कुछेक मिसाइलें ही इजरायल की धरती पर गिरीं जिनमें 1 बच्चे के घायल होने व एक सैन्य बेस पर कुछ नुकसान की खबर सामने आ रही हैं। ईरान ने इस हमले के बाद घोषित कर दिया कि वो अपनी ओर से और हमले नहीं करेगा पर अगर इजरायल कोई जवाबी कार्यवाही करेगा तो वह उसका प्रत्युत्तर जरूर देगा। 
    
इस हमले से पूर्व ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में इजरायली कंपनी के पुर्तगाली झण्डे वाले जहाज पर कब्जा कर लिया था। जहाज पर 17 भारतीय होने की खबर सामने आयी थी। ईरान ने इजरायल पर बमबारी को ‘आपरेशन द प्रामिस’ नाम दिया। क्योंकि शीर्ष नेता ने 1 अप्रैल की घटना के बदले का वायदा किया था। 
    
ईरान के इस मिसाईल हमले पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने खुलकर इजरायल का पक्ष लिया और ईरान के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र व जी-7 से कड़े रुख प्रदर्शित करने के कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिये। ब्रिटिश साम्राज्यवादी भी खुलकर इजरायल के पक्ष में खड़े नजर आये। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने दोनों पक्षों से संयम रखने व युद्ध का नया क्षेत्र न खोलने की अपील की है। 
    
अब अगर इजरायल इस हमले की कोई प्रतिक्रिया करता है तो सम्भव है दुनिया युद्ध के एक नये मोर्चे को झेलने को मजबूर हो जाये। अगर यह मोर्चा शुरू होता है तो इसका भार दुनिया भर की जनता को नई मुसीबतों से उठाना पड़ेगा। तेल की कीमतें इस युद्ध की आशंका से ही बढ़ने लगी हैं। 
    
इस युद्ध के दोषी मुख्यतः अमेरिकी साम्राज्यवादी व इजरायली शासक होंगे। समूचे पश्चिम एशिया को इन्होंने बीते कुछ दशकों से तबाह कर दिया है अब ये और बड़े युद्ध की ओर बढ़ेंगे। फिलिस्तीन में ये पहले ही हजारों लोगों-बच्चों-महिलाओं का कत्लेआम कर चुके हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादी इस क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व कायम रखना चाहते हैं पर यह भी सच है कि चीनी-रूसी साम्राज्यवादी उसके प्रभुत्व को चोट पहुंचाते जा रहे हैं। ऐसे में ईरान से युद्ध का नया मोर्चा अगर हत्यारे अमेरिकी-इजरायली शासक खोलते हैं तो वे अपनी दूरगामी शिकस्त की राह खोल रहे होंगे। भले ही ईरान को हराने में ये सफल हो जायें पर पश्चिम एशिया पर इनकी पकड़ कमजोर पड़ती जायेगी। इनका वर्चस्व कमजोर पड़ता जायेगा। इस युद्ध के चलते इनके कुकर्मों के प्रति दुनिया की जनता के सब्र का घड़ा भी भर कर छलक सकता है। युद्ध के खिलाफ जनता का आक्रोश अमेरिकी साम्राज्यवाद की कब्र भी खोद सकता है। 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।