ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमलों के एक महीने से ज्यादा हो रहे हैं। अमरीकी और इजरायली शासकों ने सोचा था कि नेतृत्व को और शीर्ष सैन्य अधिकारियों की हत्या करके वे ईरान में सत्ता परिवर्तन कर देंगे और अपने किसी पिट्ठू को ईरान की सत्ता में बिठा देंगे। उनकी नजर में यह काम सिर्फ तीन-चार दिनों में या ज्यादा से ज्यादा चंद हफ्तों में अंजाम दे दिया जायेगा। वे यह सपना पाले हुए थे कि ईरान की जनता अपने शासकों के विरुद्ध बगावत कर सड़कों पर उतर आयेगी।
लेकिन क्या हुआ? एक महीने के बाद ईरान की जनता अपनी सत्ता और सेना के समर्थन में और ज्यादा मजबूती के साथ खड़ी दिखाई देती है। जबकि अमरीकी जनता समूचे अमरीका में ईरान पर गैर कानूनी युद्ध थोपने के विरुद्ध लाखों-लाख की तादाद में सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन कर रही है। इस ‘‘नो किंग’’ प्रदर्शनों के दौरान लाखों-लाख लोग ट्रम्प प्रशासन पर यह आरोप लगा रहे थे कि ईरान के विरुद्ध युद्ध अमरीका का नहीं है। यह इजरायल का युद्ध है। अमरीकी शासक इजरायल के लिए अमरीकी सेना के नौजवानों को बलि का बकरा बना रहे हैं। अमरीकी जनता के पैसों और सैनिक संसाधनों को तबाह कर रहे हैं। यहां तक कि अमरीकी शासक हलकों तक में इस आक्रामक युद्ध का विरोध तेज होता गया है। कई सीनेटरों और कांग्रेस सदस्यों ने यह कह कर युद्ध का विरोध किया कि ईरान से जब कोई तात्कालिक खतरा नहीं था, तब अमरीका ने ईरान पर हमला क्यों किया? दूसरे अमरीकी कांग्रेस को ही किसी देश पर सैन्य हमला को स्वीकृति देने का अधिकार है। इस मामले में अमरीकी कांग्रेस की स्वीकृति ली ही नहीं गई। उनके अनुसार यह युद्ध गैर कानूनी है।
अब जब युद्ध लम्बा खिंचता जा रहा है तथा अमरीकी शासक वर्ग के अलग-अलग धड़ों का विरोध सामने आ रहा है। चूंकि ईरान पर व्यापक हमलों के चलते हुई व्यापक बर्बादी और लोगों के मारे जाने के बावजूद ईरान की सत्ता ने जब जवाबी प्रहार करना जारी रखा तो अमरीकी शासकों के भीतर मतभेद उभर कर सामने आने लगे। न सिर्फ डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्यों की ओर से बल्कि खुद ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सांसद विरोध करने लगे। ये लोग यह कहने लगे कि ट्रम्प प्रशासन के पास इस आक्रामक युद्ध के लिए कोई स्पष्ट लक्ष्य नहीं है। ट्रम्प भी अपने बयानों में लगातार इस युद्ध के लक्ष्य को बदलते रहे हैं। कभी हुकूमत परिवर्तन, तो कभी आणविक शक्ति न हासिल करने देने का कारण, तो कभी मिसाइलों की मारक क्षमता को कम करने की बात, तो कभी लेबनान, फिलिस्तीन और यमन तथा क्षेत्र के अन्य प्रतिरोध संगठनों को मदद न करने की मांगों को इस युद्ध का कारण ट्रम्प ने बताया है।
लेकिन जब ईरान की इस्लामी क्रांतिकारी गार्ड कोर ने सेना के साथ मिलकर जवाबी हमले शुरू कर दिये और खाड़ी देशों में मौजूद अमरीकी सैन्य अड्डों व इजरायली सैन्य ठिकानों पर एक-एक करके हमले करने लगे तब अमरीकी व इजरायली हमलावरों को यह समझ में आने लगा कि यह युद्ध लम्बा खिंचेगा। अमरीकी साम्राज्यवादियों के खाड़ी देशों में तैनात सैन्य अड्डों की राडार प्रणाली तथा वायु रक्षा प्रणाली को भेदते हुए इन सैन्य अड्डों को ईरान ने काफी बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया। इसी प्रकार, इजरायल के रक्षा कवच को, उसकी वायु रक्षा प्रणाली डेविड स्लिंग, एरो रक्षा प्रणाली तथा आयरन डोम को बेकार करके इजरायल के वायुक्षेत्र में ईरान मनचाही बमबारी करने में सफल होने लगा। अब ईरानी मिसाइलें और ड्रोन मनचाहे तरीके से इजरायल के सभी रणनीतिक ठिकानों पर हमले करने लगे।
अमरीकी व इजरायली हमलावर स्कूलों, अस्पतालों, रिहायशी इलाकों और ऐतिहासिक स्थानों पर हमला करके तबाही लाने के बाद ईरान की औद्योगिक इकाईयों, तेल व गैस संयंत्रों व पानी पीने लायक बनाने वाले संयंत्रों को तबाह करने लगे। इन हमलों का जवाब ईरान ने इजरायल के तेल रिफाइनरी, पानी साफ करने के संयंत्रों और अन्य अवरचनागतत ढांचों पर तथा अमरीकी हिस्सेदारी में बने खाड़ी देशों के संयंत्रों पर हमलों के जरिये दिया।
इसी के साथ ही, ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के निकासी रास्ते को रोक दिया। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के तेल का 20 प्रतिशत पारगमन होता है। यह ईरान ने बंद कर दिया। इसका असर यह पड़ा कि खाड़ी के देशों का तेल और गैस का निर्यात ठप पड़ गया।
अमरीकी साम्राज्यवादियों ने धमकी दी कि ईरान होर्मुज के रास्ते को खोले अन्यथा अमरीका ताकत के बल पर इस रास्ते को खोल देगा। जब यह धमकी काम नहीं आयी, ईरान ने कई जाने वाले टैंकर जहाजों को जला दिया तो दुनिया भर में तेल और गैस की आपूर्ति का संकट आ गया। अमरीकी साम्राज्यवादियों की जब यह धमकी भी काम नहीं आयी और ईरान का होर्मुज के रास्ते पर नियंत्रण बना रहा तब अमरीकी साम्राज्यवादियों के सरगना ट्रम्प ने ईरान की सत्ता को 48 घण्टे में होर्मुज के रास्ते खोलने की धमकी दी। और यह कहा कि यदि ईरान 48 घण्टे के अंदर होर्मुज के रास्ते को नहीं खोलता तो वे ईरान के ऊर्जा केन्द्रों को तबाह कर देंगे और इसकी शुरूवात सबसे बड़े ऊर्जा संयंत्र से करेंगे। यह धमकी भी काम नहीं आयी। 48 घण्टे से पहले ही ट्रम्प ने ईरान को 5 दिन का समय और बढ़ा दिया। इस बार ट्रम्प ने एक और शिगूफा छोड़ा। ट्रम्प ने कहा कि ईरान से समझौता वार्ता हो रही है। इसलिए पांच दिन का समय बीतने के पहले उसने 10 दिन का समय और बढ़ा दिया। इसके साथ ही, उसने समझौते के लिए 15 सूत्रीय मांगों की फेहरिस्त पेश कर दी। ईरान की हुकूमत ने ट्रम्प की इस बात का पूर्णतया खण्डन किया कि कोई समझौता वार्ता चल रही है। इसके साथ ही उसने 15 सूत्रीय ट्रम्प की मांगों को पूर्णतया खारिज कर दिया। ईरान के प्रवक्ता ने यह भी कहा कि अमरीका के साथ वह किसी भी तरह की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वार्ता में नहीं जायेगा। ईरान ने अपनी पांच मांगां को इसके जवाब में पेश किया।
हर बार जब अमरीका ईरान को समय देने की धमकी देता होता था, तब वह घोषणा करता था कि अमरीका ने ईरान को पूरी तरह तबाह कर दिया है। उसकी वायु सेना ध्वस्त कर दी गयी है। उसकी नेवी नष्ट कर दी गयी है। उसकी सरकार के शीर्षस्थ लोगों का सफाया कर दिया गया है। इसके बाद भी वह समझौता वार्ता करना चाहता था। इससे यह स्पष्ट होता जा रहा था कि ट्रम्प किसी तरह से युद्ध की समाप्ति चाहता था। लेकिन यह समाप्ति विजय की घोषणा के साथ करना चाहता था। लेकिन ईरान इसके लिए तैयार नहीं था।
ट्रम्प ने 28 फरवरी को आक्रमण करने से पहले ईरान की व्यापक घेरेबंदी कर ली थी। उसने फारस की खाड़ी में अपना एक युद्धपोत तैनात कर रखा था। दूसरा युद्धपोत भी वह बाद में लाल सागर में ले आया। खाड़ी के देशों में मौजूद फौजी अड्डों में 40 से 50 हजार सैनिक पहले से तैनात थे। जब अमरीका-इजरायल ने ईरान पर संयुक्त हमलों की बौछार की, तब और उसके पहले भी ईरान की सत्ता ने घोषित कर रखा था कि यदि ईरान पर हमला होगा तो वह सिर्फ ईरान तक ही युद्ध सीमित नहीं रहेगा। ईरान खाड़ी के देशों में मौजूद अमरीकी सैन्य ठिकानों को तबाह कर देगा। ईरान ने खाड़ी के देशों से भी यह कहा कि वे सिर्फ खाड़ी के देशों पर हमला नहीं करेंगे। ईरान की हुकूमत ने खाड़ी के देशों से कहा कि वे अपनी जमीन, वायुक्षेत्र और जलक्षेत्र को ईरान के विरुद्ध हमलों का इस्तेमाल न होने दे। यदि उनके क्षेत्र का ईरान के विरुद्ध हमलों में इस्तेमाल होगा तो वे भी ईरानी हमलों के वैध लक्ष्य होंगे। इसके बावजूद, खाड़ी के देशों की जमीन और वायुक्षेत्र का ईरान पर हमलों करने के लिए इस्तेमाल हुआ और जब ईरान के तेल व गैस उद्योग पर हमला किया गया, तो इसका जवाब ईरान ने खाड़ी देशों के अमरीकी फौजी अड्डों, उनके हवाई अड्डों, उनके तेल और गैस के ठिकानों पर जवाबी हमला कर दिया। इन हमलों के दौरान अमरीकी वायु रक्षा प्रणाली भी ध्वस्त हो गयी। खाड़ी के देश- साऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन, ओमान और जार्डन में अमरीकी अड्डों पर ईरानी हमले हुए। इसके साथ ही, इजरायल में सभी जगहों पर ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों से हमले लगातार तेज से तेजतर होते गये।
अमरीकी और इजरायली हमलावर जहां ईरान में बड़े पैमाने पर तबाही-बर्बादी ढहाते जा रहे थे, वहीं वे बार-बार यह घोषणा करते रहते थे कि ईरान की मिसाइलों और ड्रोनों का जखीरा खत्म होता जा रहा है और अब वे उसे जल्द ही मटियामेट कर देंगे। लेकिन ईरान की मिसाइलों और ड्रोनों के हमले लगातार तेज होते गये।
अमरीकी साम्राज्यवादी और यहूदी नस्लवादी इजरायली शासकों ने खाड़ी के देशों के शासकों को ईरान के विरुद्ध युद्ध में प्रत्यक्ष तौर पर भागीदारी कराने की पूरी कोशिश की। वे इस बात के लिए उनको उकसाते रहे कि ईरान ने उनके देश पर हमला किया है, इसलिए उन्हें इस हमले का विरोध करना चाहिए। और अमरीका-इजरायल के साथ मिलकर इस युद्ध में शामिल होना चाहिए। लेकिन खाड़ी के देश इस युद्ध में प्रत्यक्ष हिस्सा लेने के लिए तैयार नहीं हुए। इन देशों ने ईरान द्वारा उनके क्षेत्र पर हमला करने पर निंदा की और उसका जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखने की बात की। वे अभी तक इससे आगे नहीं बढ़े। इसमें भी संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन की स्थिति से भिन्न स्थिति अन्य खाड़ी देशों की थी। उपरोक्त दोनों देश अब्राहम समझौते के तहत बंधे हैं और इजरायल के साथ घनिष्ठ रिश्तों में जुड़े हुए हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादी और यहूदी नस्लवादी इजरायली शासकों को जब यह समझ में आने लगा कि वे होर्मुज के रास्ते को जबरन खुलवाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं तो अमरीकी शासक ट्रम्प ने नाटो देशों से, यूरोपीय संघ के देशों से, और आस्ट्रेलिया से होर्मुज के रास्ते को खोलने में अपने बेड़े को भेजने की मांग की। ट्रम्प ने रूस और चीन से ईरानी शासकों के साथ बात करके होर्मुज के रास्ते को चालू रखने की सिफारिश की। इस मामले में नाटो के सहयोगियों ने ट्रम्प से साफ मना कर दिया। इसके बाद ट्रम्प ने नाटो देशों के शासकों को कायर और कागजी बाघ करार दिया। कुल मिलाकर ईरान के विरुद्ध इस आक्रामक युद्ध में ट्रम्प का साथ न तो नाटो के देशों ने दिया और न ही रूस और चीन ने दिया।
इसी दौरान ईरान ने अमरीका के कई बमबर्षक विमान मार गिराये। साऊदी अरब के सुल्तान हवाई अड्डे में मौजूद अन्य विमानों के अलावा एक राडार युक्त अत्याधुनिक विमान को नष्ट कर दिया। इस विमान को उड़ता राडार भी कहा जाता है। ईरानी सेना ने यू एस एन अब्राहम युद्धपोत को मिसाइल हमलों से बचने के लिए पीछे हटने को मजबूर किया। यू एस एस जेराल्ड फोर्ड नामक युद्धपोत में आग लग गई, इससे वह पीछे हटने को मजबूर हुआ।
अमरीकी-इजरायल आक्रामक युद्ध के विरोध में और ईरान के समर्थन में खुलेतौर पर रूसी और चीनी साम्राज्यवादी आ गये हैं।
एक तरफ, अमरीकी साम्राज्यवादी और यहूदी नस्लवादी इजरायली शासकों को अपने-अपने देश में और विश्वव्यापी पैमाने पर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। दोनों आक्रमणकारी देशों के शासकों के बीच मतभेद और टकराव दिखाई पड़ रहे हैं। इसके साथ ही इस तेल व गैस संकट और युद्ध में संसाधनों को झोंकने के चलते बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और अन्य सामाजिक तनावों से ग्रस्त व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी अपनी बदहाली होती स्थिति के विरुद्ध विरोध कर रही है। इजरायल में लगातार साइरनों की आवाज उन्हें भूमिगत स्थानों पर छिपने के लिए मजबूर कर रही है। इसलिए वे इस युद्ध के विरोध में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
दूसरी तरफ, ईरान की व्यापक आबादी अपने शासकों के साथ और अपनी सेना के साथ ज्यादा एकताबद्ध होकर उसका समर्थन कर रही है।
आक्रामक शासकों के बीच मतभेद, टकराव हैं और आक्रमण के शिकार ईरानी लोगों के बीच एकजुटता है, जुझारूपन की भावना है, मर मिटने का जज्बा है।
इसी बीच ईरान के शासकों ने होर्मुज का रास्ता उन सभी लोगों के लिए खोल दिया है जो दुश्मन या दुश्मन के मददगार देश नहीं हैं।
अमरीका-इजरायल द्वारा ईरान पर थोपा गया युद्ध लम्बे समय से अमरीकी साम्राज्यवादियों की कमजोर होती जा रही स्थिति को और ज्यादा कमजोर करने में बहुत बड़ा योगदान करने जा रहा है। हालांकि अमरीकी साम्राज्यवादी अभी भी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाली ताकत है और उसकी सेना दुनिया की सबसे बड़ी व ताकतवर सेना है।
लेकिन इस युद्ध ने एक बार फिर से इस सच्चाई को उजाकर दिया है कि एक कमजोर देश एक ताकतवर व बड़े देश के आक्रमण को परास्त कर सकता है, बशर्ते कि उस देश की जनता शासकों के साथ खड़ी हो।
आज यही ईरानी अवाम अपने युद्ध में संकल्प लेकर आगे बढ़ रही है। इस युद्ध में लेबनान में हिजबुल्ला और यमन के हौथी सहित इराक के प्रतिरोध संगठन भी शामिल हैं और वे फिलिस्तीन की आजादी के संग्राम की आवाज को गति दे रहे हैं।
पश्चिम एशिया में होने जा रहा यह परिवर्तन साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था में पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर रहा है और अब एक नये समीकरण वाली विश्वव्यापी साम्राज्यवादी व्यवस्था का संकेत साफ-साफ दिखाई दे रहा है। अमेरिकी साम्राज्यवाद का विश्व प्रभुत्व कमजोर पड़ रहा है।
इसी के साथ अंतरसाम्राज्यवादी प्रतिद्वन्द्विता तीव्र हो रही है। शासकों के बीच बढ़ते टकराव के चलते यह परिवर्तन मजदूर वर्ग के आगामी संघर्षों में वस्तुगत तौर पर मददगार होने की संभावना लिए हुए है।