साम्राज्यवादियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश

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आसियान का 47वां शिखर सम्मेलन

मलयेशिया की राजधानी कुआलालाम्पुर में दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संघ (।ेवबपंजपवद वि ैवनजी.म्ेंज ।ेपंद छंजपवदे. ।ैम्।छ) का 47वां शिखर सम्मेलन 26 अक्टूबर से 28 अक्टूबर के बीच सम्पन्न हुआ। अभी तक आसियान के दस देश सदस्य रहे हैं। इस सम्मेलन में पूर्वी तिमोर को इसका सदस्य बना लिया गया है। इस मुख्य शिखर सम्मेलन के अतिरिक्त अन्य मीटिंगें भी हुईं, जो इसके विस्तारित पक्ष हैं। इस सम्मेलन में बाहरी ताकतों के बतौर अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग और कनाडा के प्रधानमंत्री आदि भी शामिल थे। डोनाल्ड ट्रम्प ने थाइलैण्ड और कम्बोडिया के बीच हाल ही में हुई सैनिक झड़पों को रोकने और युद्धविराम कराने का अपनी आदत के मुताबिक दावा भी किया। ट्रंप इस सम्मेलन में प्रथम दिन ही मौजूद रहे। वे इसके बाद जापान और दक्षिण कोरिया की यात्रा पर चले गये।
    
डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण-पूर्व एशिया में अपने प्रभाव क्षेत्र के विस्तार के लिए और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए इस शिखर सम्मेलन में हिस्सेदारी की। ट्रम्प यह जानते हैं कि चीन आसियान के देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। चीन की बेल्ट और रोड पहल में आसियान के कई सारे देश जुड़े हुए हैं। ट्रम्प सभी देशों के विरुद्ध टैरिफ युद्ध छेड़े हुए है। वह चीन के ऊपर 100 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा कर चुके हैं। इसके जवाब में चीन ने दुर्लभ मृदा के निर्यात पर रोक लगा दी है। चीन दुनिया की 90 फीसदी दुर्लभ मृदा पर नियंत्रण रखता है। दुर्लभ मृदा के तत्वों का इस्तेमाल ड्रोनों, मिसाइलों, विमानों और कई आधुनिक मशीनरी में होता है। यदि दुर्लभ मृदा के तत्वों का निर्यात रुक जाये तो बड़े पैमाने पर दुनिया की आधुनिक उद्योगों की आपूर्ति श्रंखला रुक जायेगी। इससे डोनाल्ड ट्रंप के सामने चीन के साथ समझौता करने के अलावा फिलहाल कोई विकल्प नहीं दिखाई पड़ता। ट्रंप मलयेशिया के साथ इस दुर्लभ मृदा पर समझौता करना चाहते हैं। मलयेशिया इसके लिए तैयार भी हो गया है। अभी तक मलयेशिया इसे चीन को निर्यात करता रहा है। मलयेशिया के साथ हुए समझौते के तहत ट्रंप ने उस पर लगाये गये टैरिफ पर कुछ रियायत दी है। लेकिन जिस रियायत की उम्मीद आसियान के देश देख रहे थे, वैसी रियायत नहीं मिली। 
    
आसियान के देशों के सामने बड़ी चुनौती यह है कि वे दोनों साम्राज्यवादी शक्तियों- अमरीकी और चीनी- में से किसी के साथ स्पष्ट पक्ष नहीं लेना चाहते। आसियान के देशों में कुछ तो साफ तौर पर अमरीकी साम्राज्यवादियों के पक्ष में खड़े हैं। लेकिन अधिकांश देश दोनों साम्राज्यवादियों के साथ रिश्ता रखना चाहते हैं। वे चीनी साम्राज्यवादियों से आशंकित भी हैं और उनके साथ व्यापारिक साझीदार भी हैं। यदि फिलीपीन्स को छोड़ दिया जाये तो जो भी आसियान के देश हैं वे चीन की बेल्ट और रोड इनीशियेटिव के साथ जुड़े हुए हैं। इनमें से कई अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ व्यापक रणनीतिक साझीदारी के समझौतों के साथ जुड़े हुए हैं। आसियान एक समूह के बतौर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाये रखना चाहता है। वह दोनों बड़ी शक्तियों की टकराहट के बीच पिसना नहीं चाहते। 
    
यहां यह ध्यान में रखने की बात है कि इन सभी देशों का शासक वर्ग अपने-अपने यहां मजदूर-मेहनतकश आबादी का दुश्मन है और अपने यहां के पूंजीपतियों और धन्नासेठों के हितों का प्रतिनिधित्व करता है। इस तरह ये विश्व पूंजीवादी व्यवस्था से अभिन्न रूप से जुड़े हैं। लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजी की ताकत के हिसाब से रिश्ते बनते हैं। साम्राज्यवाद के युग में तो और ज्यादा यह गैर-बराबरी के और शोषणकारी रिश्ते होते हैं। अमरीकी और चीनी साम्राज्यवादियों के साथ इनका कोई बुनियादी विरोध नहीं है। ये शासक सिर्फ इस या उस साम्राज्यवादी के साथ मोलभाव करके अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहते हैं और साम्राज्यवादी भी अपनी एकाधिकार की विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति का फायदा उठाकर इन देशों को अपने प्रभाव क्षेत्र में रखना चाहते हैं। वे पूरे तौर पर इन देशों को गुलाम नहीं बना सकते। दुनिया उपनिवेशवाद के दौर से आगे जा चुकी है। 
    
इस समूचे दक्षिणपूर्व एशिया में आसियान के देशों का इन दोनों साम्राज्यवादियों के साथ तालमेल बिठाकर चलना इनके हित में है और इनकी मजबूरी भी है। यदि अमरीकी साम्राज्यवादी और चीनी साम्राज्यवादियों के बीच युद्ध होता है तो अंततोगत्वा इनके लिए भी पक्ष चुनने की मजबूरी खड़ी हो जायेगी। ट्रंप के नेतृत्व में अमरीकी साम्राज्यवादियों ने टैरिफ युद्ध की घोषणा के चलते दुनिया भर के देशों में खलबली मचा दी है। लेकिन खुद देश के भीतर ट्रम्प का विरोध बढ़ता जा रहा है। इस बार आसियान देशों के अंदर भी ट्रम्प के विरोध में कई देशों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गये। खुद मलयेशिया में भी ट्रंप को गाजा नरसंहार का अपराधी घोषित करते हुए लोग सड़कों पर निकले। इसी प्रकार, दक्षिण कोरिया में भी ट्रम्प की गाजा में नरसंहार कराने की भूमिका पर विरोध प्रदर्शन हुए। 
    
ट्रम्प देश के भीतर और देश के बाहर व्यापक विरोध बढ़ते जाने के बावजूद युद्ध की तैयारियों में लगे हुए हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी चीन को मुख्य दुश्मन के बतौर मानते हैं और इसी हिसाब से चीन की घेरेबंदी कर रहे हैं। जापान और दक्षिण कोरिया की यात्रा के दौरान ट्रंप ने जापान और कोरिया के साथ जहाजरानी निर्माण उद्योग में बड़े पैमाने के साझे निवेश की पेशकश की। यह भी चीन का मुकाबला करने की दृष्टि से किया गया है। चीन का जहाजरानी उद्योग दुनिया के जहाजरानी उद्योग में सबसे बड़ा है। 
    
अमरीकी साम्राज्यवादी चीन को घेरने के लिए जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और फिलीपीन्स के साथ अपने फौजी गठबंधनों को मजबूत कर रहे हैं। दूसरी तरफ, चीन लगातार अपने व्यापार और अवरचनाओं के जरिये समूची दुनिया में अमरीका को चुनौती दे रहा है। यह चुनौती वह आसियान के देशों में भी दे रहा है। 
    
अमरीकी साम्राज्यवादी आज क्रमशः कमजोर हो रहे हैं और चीनी साम्राज्यवादी उभार पर है। आसियान के इस शिखर सम्मेलन में पहले दिन के बाद दो दिनों तक चीनी प्रतिनिधि आसियान में द्विपक्षीय व बहुपक्षीय व्यापार बढ़ाने और एकतरफा टैरिफ के विरोध में तथा बहुपक्षवाद को बढ़ावा देने की योजना पर चर्चा के केन्द्र में रहे। 
    
आसियान के देशों के साथ चीनी साम्राज्यवादियों की बढ़ती साझीदारी, तमाम शंकाओं के बावजूद अमरीकी साम्राज्यवादियों के लिए एक बड़़ा सिरदर्द है। ट्रम्प इसी साझीदारी को तोड़ने के लिए इस शिखर सम्मेलन में शामिल हुए। 

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