फिल्म समीक्षा - सतलुज

Published
Thu, 07/16/2026 - 15:50
/movie-review-sataluj

इस समय एक फिल्म सोशल मीडिया प्लेटफार्म और समाज के एक हिस्से में खासी सुर्खियां बटोर रही है। सुर्खियों में आने की सबसे बड़ी वजह यह भी रही कि फिल्म को लगभग चार साल बाद सेंसर बोर्ड की संस्तुति मिली। भारत के आनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म (व्ज्ज्) जी 5 पर फिल्म रिलीज होती है और दो दिन के भीतर प्रतिबंधित कर दी गयी। जिसके बाद फिल्म की पोपुलरटी बढ़ती गयी। 
    
तो चलें फिल्म से रूबरू हो लिया जाये। फिल्म का निर्देशन हनी त्रेहान ने किया है। मुख्य भूमिका में पंजाब के मशहूर सिंगर दिलजीत दोसांझ हैं। जिन्होंने जसवंत सिंह खालरा जो कि एक बैंक कर्मचारी और एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, की भूमिका निभाई है। 
    
पूरी फिल्म वास्तविक घटनाओं पर आधारित है जो 1980-95 के 15 साल के समय काल को छूती है। पंजाब के भीतर एक भयानक आतंक का दौर छाया था जिसे खत्म करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा के.पी.एस. गिल जिसे बतौर डी.जी.पी. नियुक्त करके भेजा गया था का नाम बदलकर इंदरपाल सिंह बिट्टा दिखाया गया है। 
    
बिट्टा अपने विश्वसनीय व्यक्ति की पदोन्नति करके उसे पंजाब में एस एस पी बनाकर भेजता है। फिल्म में उसका नाम सुरजीत सिंह जुग्गा (वास्तविक नाम अजीत सिंह संधू) है, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसके लिए गाड़ी चलाने और गोली चलाने में कोई फर्क नहीं था। 
    
फिल्म कर्ज मांगने आए बुजुर्ग दम्पत्ति से शुरू होती है जो तीसरी बार कर्ज लेने जसवंत सिंह के पास आते हैं, जिनका बेटा पुलिस हिरासत में है और उसे छुड़ाने के लिए कर्ज की जरूरत है। इसी बीच जसवंत का दोस्त कृपाल सिंह लापता होता है और फिर उसकी मां भी लापता हो जाती है। 
    
काफी खोजबीन के बाद मालूम होता है कि उसके दोस्त और उसकी मां की पुलिस द्वारा हत्या कर उनकी लाशों को लावारिस बताकर जला दिया गया है। यहीं से शमशानों की खाक छानते हुए जसवंत सिंह को मालूम होता है कि इन बीते सालों में पुलिस द्वारा 25,000 लोगों को लावारिस बताकर जला दिया, बहा दिया गया है। 
    
यहीं से इन लावारिस लोगों का हिसाब मांगने की लड़ाई शुरू होती है। न सिर्फ पंजाब बल्कि कनाडा जाकर भी जसवंत सिंह इस मुद्दे को उठाता है और ये मामला अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बनता है। 31 अगस्त 1995 को पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या होती है और 6 सितम्बर 1995 को पुलिस द्वारा जसवंत का अपहरण होता है और कुछ महीने बाद जसवंत सिंह की हत्या कर उनका शव नदी में बहा दिया जाता है। 
    
दिलजीत का अभिनय उम्दा है। पूरी फिल्म उस डर और सिहरन को पैदा करने में कामयाब रही जो वह दिखाना चाहती है। किस तरह आतंकवाद की आड़ में निर्दोष बच्चों और बूढ़ों की हत्या कर पुलिस अधीक्षक अनगिनत हत्याकांड रचती है। जरूरत पड़ने पर किसी पुलिस वाले के साथ उसके माता-पिता की हत्या कर देना। किसी आम नागरिक की हत्या कर देना उस दौर में पुलिस के लिए कितना आसान था फिल्म में बखूबी दर्शाया गया है। 
    
इतने कुछ के बावजूद फिल्म कुछ बुनियादी सवालों से बचती रही है मसलन् पंजाब के भीतर अकालियों को कमजोर करने के लिए सन् 1980 में इंदिरा गांधी द्वारा भिंडरावाले को आगे बढ़ाना जिसने आगे चलकर पंजाब में आतंकवाद का जहरीला बीज बोया और अलग पंजाब ‘खालिस्तान’ की मांग को हवा दी। 
    
आपरेशन ब्लू स्टार के बाद इंदिरा गांधी की हत्या, तत्पश्चात राजीव का प्रधानमंत्री बनना और 1984 केे सिख विरोधी दंगों में हजारों सिखों का कत्लेआम। 
    
खालिस्तानियों द्वारा निर्दोष लोगों की हत्या, प्रगतिशील, क्रांतिकारी कवि पाश जैसे कवियों की हत्या, धर्म के नाम पर अलग खालिस्तान के नाम पर आम पंजाबियों को आतंकवाद की दिशा में मोड़ा जाना। 
    
ऐसे बहुत से पहलू हैं जिन पर फिल्म चुप्पी साध लेती है। फिल्म पुलिस हिंसा पर मुखर होती है परन्तु उन कारणों पर चुप्पी साध जाती है कि किस तरह भारतीय शासकों ने पूरे पंजाब को आतंकवाद की आग में झोंक दिया और पूरी सिख कौम को बतौर आतंकवाद के चेहरे के रूप में स्थापित किया। ठीक वैसे ही जैसे आज संघी शासक मुसलमानों को आतंक के चेहरे के रूप में स्थापित कर रहे हैं। 
    
फिल्म के अंत में तत्कालीन डीजीपी बिट्टा को बिल्कुल बेदाग घोषित कर, तत्कालीन एसएसपी जो कि कुछ समय पूर्व आत्महत्या कर लेता है, के साथ चार पुलिसवालों को आरोपी ठहराकर, उन्हें आजीवन कारावास की सजा देकर अदालत भी अपने दायित्वों की इतिश्री कर लेती है। या ज्यादा सही शब्दों में कहें तो अपना रक्त रंजित चेहरा धोकर न्याय की पटकथा लिख देती है। 
    
संक्षेप में कहा जाये तो पुलिस लोकतंत्र का लबादा ओढ़े पूंजीवादी न्याय प्रणाली कितनी बर्बर होती है और किस हद तक जा सकती है इसे इस फिल्म के माध्यम से बखूबी समझा जा सकता है। अपनी तमाम तथ्यात्मक जानकारी के बावजूद फिल्म की सीमाएं हैं जिन्हें तोड़ना दिलजीत या हनी त्रेहान के बस की बात नहीं है। अंततः फिल्म इस पूंजीवादी न्याय प्रणाली पर ही विश्वास कायम करवाती है। और पूंजीवादी न्याय प्रणाली उसी पूंजीवादी व्यवस्था का छोटा सा हिस्सा है जो अपनी बारी में कभी भिंडरावाले को पैदा करती है तो कभी के.पी.एस. गिल को। 

आलेख

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।