‘नो किंग्स’ प्रदर्शनों की दूसरी लहर

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अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प के खिलाफ 18 अक्टूबर को लाखों युवा, श्रमिक, विद्यार्थी व आम जन सड़कों पर उतरे। इसे ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन की दूसरी लहर कहा गया। 2700 से ज्यादा प्रदर्शन इस दिन देश के विभिन्न शहरों में हुए जिसमें 70 लाख लोग शामिल हुए। गौरतलब है कि जून में पहली लहर के प्रदर्शनों में 50 लाख लोग शामिल हुए थे। 
    
इन प्रदर्शनों का उद्देश्य ट्रम्प व उसकी सरकार के तानाशाही पूर्ण रवैय्ये का विरोध करते हुए यह बताना था कि अमेरिका में कोई राजा नहीं है। प्रदर्शनकारी जनवादी अधिकारों के हनन, अप्रवासियों पर हमले, शहरों में सैनिकों की तैनाती, संघीय कर्मचारियों की सामूहिक बर्खास्तगी व सामाजिक कार्यक्रमों में कटौती, गाजा नरसंहार आदि का विरोध कर रहे थे। 
    
यद्यपि इन प्रदर्शनों का ज्यादातर जगह नेतृत्व विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी कर रही थी पर डेमोक्रेटिक पार्टी के अलावा अन्य समूह भी प्रदर्शनों में शामिल हुए। राष्ट्रपति ट्रम्प ने विद्रोह अधिनिमय का प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इस्तेमाल करने की धमकी दी पर इससे प्रदर्शनों पर कोई असर नहीं पड़ा। बड़ी तादाद में लोगों ने सड़कों पर उतर ट्रम्प के राजा की तरह व्यवहार करने का विरोध किया। 
    
अमेरिकी सरकार के नेताओं ने इन प्रदर्शनों के खिलाफ दुष्प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी। ट्रम्प ने इसे विद्रोह की संज्ञा देते हुए विद्रोह अधिनियम के इस्तेमाल की धमकी दी जिसके तहत उन्हें समूचे देश में सेना की तैनाती का अधिकार मिल जाता। एक दिन पूर्व ट्रंप ने सोशल मीडिया पर खुद के एक महत्वाकांक्षी फ्यूहरर का मुकुट पहने व ‘किंग ट्रम्प’ लिखे विमान से प्रदर्शनकारियों पर मल गिराता वीडियो शेयर किया था। वहीं उपराष्ट्रपति वेंस द्वारा पोस्ट किये गये वीडियो में ट्रम्प को तलवार निकालते हुए और डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं को उनके आगे झुके दिखाया गया था। 
    
अध्यक्ष माइक जानसन ने इन प्रदर्शनों को मार्क्सवाद व समाजवाद से जोड़ते हुए इन्हें खतरनाक विचारधारा बताया। न्यूयार्क के मेयर पद पर ममदानी की जीत का हवाला देते हुए उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी में मार्क्सवाद के उदय की बात की। 
    
जहां सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी पर हमलावर थे वही डेमोक्रेटिक पार्टी प्रदर्शनों के प्रति काफी अनिच्छा दिखाते हुए अंत में उसमें शामिल हुई। उसने अपनी ओर से प्रदर्शनों को व्यापक बनाने का कोई प्रयास नहीं किया। उसका रुख ट्रम्प के प्रति जनता के आक्रोश को किसी तरह शांत करने का रहा। यह दिखाता है कि अमेरिकी शासक वर्ग की दोनों पार्टियां तमाम मसलों पर एकमत हैं। ‘वामपंथी’ होने का दिखावा करने वाले बर्नी सैंडर्स का रुख भी अलग नहीं था। वे जनता को डेमोक्रेटिक पार्टी से बांधे रखने को ही प्रयासरत दिखे। 
    
जाहिर है कि अमेरिकी जनता को ट्रम्प की तानाशाही के साथ-साथ दोनों प्रमुख पार्टियों की पूंजीपरस्ती से भी निपटना होगा। अमेरिकी साम्राज्यवाद को निशाने पर लेकर ही जनता अपने हितों को बचा सकती है। 

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लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

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