अंधा बांटे रेवड़ी फिर फिर अपने को दे
हाल ही में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के अर्बन को-आपरेटिव बैंक का मामला उजागर हुआ है जहां लिपिक/कैशियर और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की 27 भर्तियां निकली थीं। इन सभी
हाल ही में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के अर्बन को-आपरेटिव बैंक का मामला उजागर हुआ है जहां लिपिक/कैशियर और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की 27 भर्तियां निकली थीं। इन सभी
उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायधीश डी वाई चन्द्रचूड़ अपने द्वारा लिखित एक किताब के प्रचार के क्रम में ढेर सारे साक्षात्कार दे रहे हैं। न्यूजलाउंड्री को दिये साक्षा
संघ व भाजपा के लोगों के लिए भारत की जाति व्यवस्था एक अलग तरह की मुसीबत खड़ी करती है। वे एक तरफ तो चाहते हैं कि जाति पहचान के स्थान पर हिन्दू पहचान छा जाये और दूसरी तरफ समस
इसे तारीखों का विचित्र संयोग या फिर भारतीय इतिहास का कटु सत्य भी कह सकते हैं। इस वर्ष, जिस दिन (2 अक्टूबर) गांधी जयन्ती है, ठीक उसी दिन विजयादशमी है। यह तो हो सकता है कि
मोदी सरकार ने अचानक 130वां संविधान संशोधन पेश किया। यह संशोधन तब पेश किया गया जबकि मोदी सरकार घरेलू और विदेशी मोर्चे पर अपनी साख गंवा रही थी। अगस्त माह में जब एक तरफ बिहा
11 सितम्बर को प्रधानमंत्री मोदी के नाम से देश के प्रमुख अखबारों में एक लेख छपा। लेख संघ प्रमुख मोहन भागवत के 75वें जन्मदिवस के मौके पर था। मोदी जी ने मोहन भागवत की प्रशंस
राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इस दानव को संत का जामा पहनाने की कोशिश की गयी। ‘‘संघ की यात्रा के 100 वर्ष - नए क्षितिज’’ नामक तीन दिवसीय कार्यक
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर एस एस) को अपने जन्म शताब्दी वर्ष में एक काम यह करना चाहिए कि उन्हें अपना नाम, भारत में बदल देना चाहिए। उन्हें अपने नाम के आगे से ‘राष्ट्रीय’
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।