सुनहरी राख

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
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वर्मा जी की सरकारी नौकरी उस समय लगी जब पांचवीं जमात फेल आदमी को भी सरकारी नौकरी मिल जाती थी। और प्रमोद का दाखिला उस समय सरकारी स्कूल में हुआ जब सरकारी कर्मचारियों के बच्चों का सरकारी स्कूल में पढ़ना एक आम चलन था। लेकिन बड़े बेटे के इंटर पास होने तक देश में बहुत कुछ बदल चुका है।
    
इंटर की परीक्षा में पूरे स्कूल में प्रमोद अव्वल आया है, और अब वर्मा जी उसके भविष्य के लिए चिंतित हैं। ‘‘आप परेशान न हों पापा! जब नौकरी लगेगी तो दुनिया देखेगी। पिता को आश्वस्त करते हुए प्रमोद ने बात आगे बढ़ाई।’’ अभी कुछ दिन कालेज देखना है। नौकरी की टेंशन नहीं है।’’
    
बचपन से मेधावी छात्र महज किताबी कीड़ा नहीं है। मन में एक बेचैनी है। सामाजिक घटनाएं उसे प्रभावित करती हैं। वाद-विवाद पसंद  है। उसकी यही पसंदगी उसे क्रांतिकारी राजनीति के दायरे में खींच लाई। जहां उसका परिचय क्रांतिकारी साहित्य, पर्चे, पुस्तिका अखबार, मीटिंगों से हुआ। पुराने स्कूली दोस्तों, पड़ोस के अलावा भी अब कुछ नए परिचित लोग जो एक नई दुनिया के ख्वाहिशमंद हैं, अब प्रमोद के जीवन का हिस्सा हैं। इनका संग साथ प्रमोद को प्रिय है।
    
‘‘रमेश भाई आज शाम का खाना हमारे घर पर है आपका!’’ फोन पर दावत की सूचना। नई दुनिया के ख्वाहिशमंदों में एक नाम। रमेश। जो अब प्रमोद का दोस्त, उसके परिवार का हिस्सा है।
    
‘‘किस बात की दावत है भाई?’’ एक गर्मजोशी से भरा हुआ हाथ। ‘‘इंडियन नेवी से जॉब का कॉल लेटर आया है।’’ हाथ पकड़े हुए ही प्रमोद ने आगे का वाक्य पूरा किया। बधाई हो। प्रमोद को हथेली पर पहले से ज्यादा गर्मजोशी भरा दबाव महसूस हुआ। आज दो दोस्त देर रात गए सोए।
    
ट्रेनिंग शुरू हुई। दिन महीने में बीते। हथियार, पनडुब्बी, टैंक, सेना।
    
सरकारी नौकरी महज सरकारी नौकरी न थी। सरकार की असीम शक्ति का संकेत था। इस रौनक में प्रमोद को खुद का चेहरा भी चमकता हुआ महसूस होना था। 
    
आज 6 महीने बाद पुनः दो दोस्त खाने पर बैठे हैं। ‘‘क्या अखबार पोस्ट किया जा सकता है तुम्हें?’’ रमेश का प्रश्न। ‘‘बस एक दिक्कत है। अगर खोल कर देख लिया तो मेरे लिए समस्या हो जाएगी।’’ कुछ देर ठंडी खामोशी।
    
‘‘फिर किस रूप में भूमिका देखते हो अपनी इंकलाब में? रमेश का पुनः प्रश्न। 
    
‘‘रमेश जब छुट्टी आऊंगा तो जो भी बन पड़ेगा आर्थिक सहयोग या कार्यक्रम में भागीदारी करूंगा।’’ मौखिक आश्वासन पर खाने की टेबल खाली होती है।
    
साल बीतने का सिलसिला बीतने लगा। प्रत्येक मुलाकात में 6 महीने का अंतराल रहता। लेकिन हर मुलाकात में दिलों की दूरियां बढ़ती जा रही हैं। प्रमोद के इर्द-गिर्द एक आभामंडल चमकने लगा है जिसने उसे विशिष्टता बोध से भर दिया है। मानो वह खुद सरकार की असीमित ताकत का प्रतिनिधित्व कर रहा हो। 
    
‘‘प्रमोद भाई फंड करना है। सम्मेलन है।’’ चाय पीते हुए रमेश ने बात कही।

प्रमोद- हां हां, ले लो।

रमेश- सांकेतिक नहीं करना है इस बार। बढ़ा के करो!

प्रमोद- कितना करना है?

रमेश- 500 रुपए करो। 

प्रमोद- इतना नहीं हो पाएगा। मेरा बजट नहीं बन पाएगा।

रमेश- क्या सिर्फ बौद्धिक शांति के लिए इतनी बातें हम लोगों से करना पसंद है तुम्हें? वो कमिटमेंट कहां है तुम्हारा जो किया करते थे?

प्रमोद- मैं मना कब कर रहा हूं तुम्हें।

रमेश- मंदिर के लिए दान करके महान होने का एहसास महसूस करना और समाज के लिए समर्पण के बीच गहरा फर्क है दोस्त। 
    
काफी बहस के बाद प्रमोद ने 200 रुपए दिए लेकिन अब प्रमोद के तर्कों में पुराने के प्रति अविश्वास साफ है। पुराने दावे, विश्वास फौजी सलाम की चमक के आगे गुम हो गया है।
    
‘‘सरकार की इतनी बड़ी ताकत, फौज, सेना, मीडिया कैसे होगा इंकलाब? बड़े से बड़ा आंदोलन मिनटों में कुचल दिया जाएगा!’’ प्रमोद के तेवर तल्ख हो चुके हैं।
    
वाद-विवाद का लंबा क्रम बेनतीजा रहा। कालेज का निर्मल हृदय, निर्मल आत्मा हथियारों, पनडुब्बियों, बारूद की चमक में चौंधियाकर खुद को उसी चमक का हिस्सा मानकर विशिष्टता बोध से ग्रसित हुई और मैली हो गई।
    
शट अप यू....बा.....तक। ये नौ सेना के अधिकारी की लताड़ है, जो प्रमोद को पड़ी है। गाली, तिरस्कार, अपमान। अपनी बौद्धिकता पर जो घमंड था उसकी यहां बस इतनी ही औकात है, जितनी एक फैक्टरी के भीतर मशीन के पुर्जे की होती है। आभा मंडल टूटकर बिखर गया और धरती सुनहरी राख से भर गई।
    
‘‘रमेश भाई कैसे हो?’’ इंसान की आवाज अक्सर उसके भीतर की टूटन को बयां कर देती है।         
‘‘क्या बात प्रमोद भाई सब ठीक तो है?’’
    
‘‘तुमसे मिलना चाहता हूं!’’ प्रमोद की बातों में आग्रह है।
    
‘‘जब छुट्टी आओ तो इत्तिला कर देना।’’ एक अपनत्व।

प्रमोद- फेसबुक में संगठन के सम्मेलन की पोस्ट देखी 1000 रुपए का फंड भेजा है तुम्हारे अकाउंट में।

रमेश- घर कब आ रहे हो?

प्रमोद- इस महीने की 12 तारीख को पहुंच जाऊंगा। रात का खाना मेरे घर पर ही है आपका। अभी रखता हूं। मिलकर बहुत सी बातें करनी हैं।

रमेश- गुड नाइट। ख्याल रखना अपना।
    
दो जोड़ी खामोश आंखें। खाक ए ज़रीन आंखें। सुकून भरी नींद में डूब गई हैं। -पथिक
 

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