एकीकृत वैश्विक पूंजीवाद में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता

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पूरी दुनिया में घूम-घूम कर विदेशी नेताओं को जबर्दस्ती गले लगाने वाले मोदी आजकल स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का राग अलाप रहे हैं। उनके परम मित्र डोनाल्ड ट्रंप जितना ज्यादा उन्हें थपड़िया रहे हैं, उतना ही मोदी का यह अलाप बढ़ता जा रहा है। दुनिया भर में भारत का डंका बज रहा है, यह तो मोदी और सारे संघी कब का भूल चुके हैं। 
    
पाखण्डी संघी प्रधानमंत्री के इस अलाप के फर्जीबाड़े को विरोधियों ने तुरंत ही यह इंगित कर उजागर कर दिया कि मोदी स्वयं जिन चीजों का इस्तेमाल करते हैं वे स्वदेशी नहीं हैं। परम उपभोक्तावादी और राजसी ठाठ-बाट से रहने वाले मोदी अपनी ख्वाहिशें देशी सामानों से पूरा नहीं कर सकते। 
    
लेकिन पाखंडी संघी प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत आचरण से अलग क्या आज के एकीकृत वैश्विक पूंजीवाद के जमाने में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का कोई मतलब है? क्या आज यह संभव भी है? कहीं ऐसा तो नहीं कि आज स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का नारा महज जुमला बन कर रह जाने के लिए अभिशप्त है?
    
भारत में स्वदेशी का नारा देश की आजादी की लड़ाई के दौरान मुखर हुआ। इसे पहली बार प्रस्तुत करने का श्रेय बाल गंगाधर तिलक को दिया जाता है हालांकि इसे व्यापक तौर पर लोकप्रियता महात्मा गांधी के जमाने में मिली। 
    
आजादी की लड़ाई के दौरान इस नारे की व्यवहार में क्या असलियत रही? इसे किस हद तक अपनाया गया?
    
इसका जवाब यह है कि आर्थिक तौर पर स्वदेशी के नारे का प्रभाव समूची आजादी की लड़ाई के दौरान नगण्य रहा। देश में विदेशी सामानों का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता रहा तथा निरपेक्ष तौर पर इसकी मात्रा बढ़ती रही। यदि कुछ सामानों के मामले में सापेक्ष तौर पर कोई गिरावट आई भी तो इसलिए कि देशी पूंजीपति अब देश में ही आधुनिक उद्योगों में उनका उत्पादन करने लगे थे। और इन आधुनिक उद्योगों में ‘‘स्वदेशी’’ कुछ भी नहीं था। इनकी मशीनें और तकनीक विदेश से आयातित होती थीं। अक्सर इंजीनियर भी विदेशी होते थे। यहां तक कि उद्योगों का प्रबंधन करने वाली ‘मैनेजिंग एजेन्सियां’ भी विदेशी होती थीं। पूंजी भी विदेश से उगाही जाती थी। यदि इनमें कुछ भी स्वदेशी था तो इतना ही था कि ये उद्योग भारत की धरती पर होते थे तथा इनमें भारतीय मजदूर काम करते थे। इन अर्थों में तो यहां विदेशी मालिकाने वाले उद्यम भी स्वदेशी थे। 
    
महात्मा गांधी ने जब स्वदेशी की बात की तो इसमें पूंजी, तकनीक, मशीन, कच्चा माल, मजदूर सब देशी होने थे। इसीलिए उन्होंने चरखे को इसका प्रतीक बनाया जिससे सूत काता जाता था और फिर खादी कपड़ा बुना जाता था। हालांकि तब तक हथकरघा कबीर के जमाने का न रहकर अंग्रेजी आविष्कार से प्रभावित हो चुका था। 
    
चरखे और हथकरघे ने देश के सूती कपड़ा उद्योग तथा उसके उपभोग पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं डाला। इसका जो भी प्रभाव पड़ा वह राजनीतिक था। इसने आजादी की लड़ाई के प्रतीक का स्थान ग्रहण कर लिया। इसने जन-जन तक यह संदेश पहुंचाया कि यदि देश के लोगों के आर्थिक हालात खराब हैं तो उसका कारण विदेशी शासन है। हर जगह खादी में नजर आने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ता और नेता इस भावना को मूर्त रूप में संचारित करते थे। 
    
मजे की बात यह है कि स्वदेशी आंदोलन तथा स्वदेशी की बात करने वाले महात्मा गांधी और कांग्रेस पार्टी को देश के उन पूंजीपतियों का सहयोग-समर्थन मिला जो विदेशी पूंजी, तकनीक, मशीन, इंजीनियर और प्रबंधन पर निर्भर थे। इसका कारण यह था कि उन्हें यह स्पष्ट दिख रहा था कि कांग्रेस पार्टी के आंदोलन से उनकी खुद की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ रही थी। बाद में उन्हें देशी शासन के तहत सुनहरा भविष्य दिखने लगा। उन्हें स्वदेशी में कोई विश्वास नहीं था पर इस आंदोलन से वे भरपूर फायदा उठा सकते थे और उठाना चाहते थे। इसी से ऐसा हुआ कि ‘विदेशी’ पर निर्भर देशी पूंजीपति स्वदेशी आंदोलन का सहयोग-समर्थन करने लगे हालांकि ‘विदेशी’ से संबंध विच्छेद का उनका कोई इरादा नहीं था। जैसा कि इतिहास ने दिखाया भारत के पूंजीपति वर्ग ने ‘विदेशी’ से पूर्ण संबंध विच्छेद कभी भी नहीं किया- आयात प्रतिस्थापन के जमाने में भी नहीं। 
    
महात्मा गांधी को अच्छी तरह पता था कि स्वदेशी के नारे का कोई आर्थिक मतलब नहीं है। कि देश का पूंजीपति वर्ग आधुनिक उद्योगों को त्यागकर चरखे-करघे के जमाने में नहीं लौटेगा। इसीलिए उन्होंने 1909 में अपनी किताब ‘हिन्द स्वराज’ में चाहे जो लिखा हो, आजादी की पूर्व सं ध्या पर उन्होंने ‘टाटा-बिड़ला योजना’ को ही देश का भविष्य स्वीकार किया। यह अकारण नहीं था कि उन्होंने कांग्रेस के तमाम पोंगापंथी और पुरातनपंथी नेताओं के आगे नेहरू को तरजीह दी तथा उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, उस नेहरू को जो ‘हिन्द स्वराज’ की मूल भावना के एकदम खिलाफ थे। देश की आजादी के साथ स्वदेशी का भी अवसान हो गया और वह अधिकाधिक जुमला भर बनता गया। चरखा, हथकरघा और खादी भी अजायबघर की चीज बनते गये। ठीक उसी तरह जैसे पुराने कांग्रेसी अजायबघर की चीज बनते गये जो गांधी आश्रमों में पाये जाते थे। 
    
भारतीय राजनीति में स्वदेशी का नारा 1990 के दशक में एक बार फिर उछला जब देश में उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियां लागू हुईं। इसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उछाला- स्वदेशी जागरण मंच का गठन कर के। 
    
यहां फिर इस तथ्य को रेखांकित करना होगा कि भारतीय जनता पार्टी उदारीकरण-वैश्वीकरण की पक्की समर्थक थी। यह इस हद तक था कि उसने आरोप लगाया कि नरसिंहराव-मनमोहन सिंह सरकार ने उसकी उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों को चुरा लिया था। भाजपा अपने पुराने अवतार भारतीय जनसंघ के जमाने से ही इस तरह की नीतियों की समर्थक रही थी। इसी कारण उसने कांग्रेस सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की प्रधानता तथा आयात-प्रतिस्थापन की नीतियों का हमेशा विरोध किया था। स्वाभाविक था कि जब कांग्रेस पार्टी ने 1991 में इस तरह की नीतियों को लागू किया जो उसकी पुरानी नीतियों के उलट थीं तो भाजपा उस पर चोरी का आरोप लगाती।
    
अस्तु, भाजपा तो  धड़ल्ले से उदारीकरण- वैश्वीकरण की नीतियों का समर्थन कर रही थी पर उसका मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ स्वदेशी जागरण मंच का गठन कर इसका विरोध कर रहा था। यह बिल्कुल उसी तरह था जैसे भाजपा श्रम कानूनों में सुधारों की वकालत करती थी जबकि संघ का ही दूसरा संगठन भारतीय मजदूर संघ इसका विरोध करता था। 
    
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा यह रणकौशल अपनाए जाने के कारण थे। संघ का परंपरागत आधार छोटी सम्पत्ति वालों में रहा है, खासकर छोटे व्यवसायियों में। उदारीकरण-वैश्वीकरण के तहत इनकी बड़े पैमाने पर तबाही होनी थी अथवा ज्यादा सही कहें तो देश के पूंजीवादी विकास के साथ इनकी जो तबाही हो रही थी उसे अब बहुत तेज हो जाना था। अपने परंपरागत आधार की इस संभावित दुर्गति को देखते हुए संघ को कुछ करना था अन्यथा उसका यह आधार उससे छिटक जाता। स्वदेशी जागरण मंच के जरिए संघ ने इस असंतोष को कम करने की कोशिश की। 
    
वैसे संघ के पक्ष में कहा जा सकता है कि इसके नेताओं-कार्यकर्ताओं की निम्न मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि के चलते तथा उसके परंपरागत आ धार के छोटी सम्पत्ति वालों के बीच होने के चलते समूचे संघ परिवार की दृष्टि अत्यन्त संकीर्ण है। वह छोटी सम्पत्ति वालों की नजर से ही सारी दुनिया को देखता है और इसीलिए पूंजीवाद को भी। उसकी दृष्टि छोटे दुकानदार या बाबू की दृष्टि होती है। लेकिन इसकी त्रासदी यह है कि पूंजींवाद में सत्तानशीन होने पर यह बड़े पूंजीपति वर्ग के हिसाब से चलता है और काम करता है। वह बड़े पूंजीपति वर्ग की सेवा करता है।
    
अब संघ ने चाहे अपनी निम्न मध्यम वर्गीय दृष्टि के तहत स्वदेशी जागरण मंच का गठन किया हो या फिर महज जन असंतोष को कम करने के रणकौशल के तहत, स्वदेशी का नारा महज नारा बन कर रह जाना था। उदारीकरण-वैश्वीकरण के उपभोक्तावादी दौर में संघ के समर्थक धड़ल्ले से विदेशी सामानों का उपभोग करते रहे। छोटे देशी उद्यम तबाह होते गये और विदेशी ब्राण्ड के सामानों की बिक्री बढ़ती गयी। संघी प्रधानमंत्री मोदी तो बस उस प्रवृत्ति के प्रतीक पुरुष हैं जो जुबान से स्वदेशी-स्वदेशी कहते हुए विदेशी सामानों का अधिकाधिक उपभोग करती जाती है। बाद में संघ के सहयात्री बाबा रामदेव ने अपने उत्पादों का बाजार बढ़ाने के लिए नारा उछाला पर यह चला नहीं, खासकर इसलिए कि उनके ज्यादातर उत्पाद नकली या बेहद घटिया गुणवत्ता के थे। 
    
यह है देश में स्वदेशी का संक्षिप्त इतिहास। इस संक्षिप्त अवलोकन से स्पष्ट है कि पूंजीवाद में स्वदेशी का नारा या तो महज जुमला बन कर रह जायेगा या ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक गोलबंदी का औजार। एक आर्थिक नीति के तौर पर इसका कोई भविष्य नहीं है। इसके कारण स्वयं पूंजीवाद की कार्यपद्धति में ही छिपे हैं। 
    
पूंजीवाद अपनी उत्पत्ति के समय से ही एक वैश्विक व्यवस्था रही है। समय के साथ इसके वैश्विक चरित्र की व्यापकता और गहनता बढ़ती गयी है। पहले छूटे क्षेत्र और आजादी क्रमशः इसके दायरे में आते गये हैं। इसी तरह अधिकाधिक मानवीय गतिवि धयां इसके दायरे में आती गयी हैं। 
    
पूंजीवाद के इस वैश्विक चरित्र के कारण ‘स्वदेशी’ की बात अपने आप में ही असंगत हो जाती है। जो व्यवस्था अपनी प्रकृति में ही वैश्विक हो, उसमें स्वदेशी-विदेशी का भेद निरर्थक या अप्रासंगिक हो जाता है। तब भी समय-समय पर इस भेद की बात उठायी जाती रही है और उसने पूंजीवाद के विकास में अपनी भूमिका अदा की है। 
    
अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के पूंजीवादी अर्थशास्त्रियों ने वैश्विक श्रम विभाजन की बात की थी। उन्होंने कहा था कि सारी दुनिया के लिए सबसे अच्छा यही होगा कि सारे देश केवल उन्हीं चीजों का अपने यहां उत्पादन करें जिन्हें वे सबसे सस्ता और अच्छा उत्पादित कर सकते हैं। बाकी का वे दूसरे देशों से आयात कर लें। यह सबके लिए फायदेमंद होगा। यह देखना कोई मुश्किल नहीं है कि इस श्रम विभाजन की वकालत उन देशों के अर्थशास्त्री कर रहे थे जो पूंजीवादी विकास में आगे थे। जहां तकनीक व मशीनें ज्यादा उन्नत थीं। इस श्रम विभाजन का व्यावहारिक मतलब यह होता कि अगड़े देश न केवल अगड़े बने रहते बल्कि समय के साथ अगड़े-पिछड़े की खाई बढ़ती जाती। पिछड़े देश केवल कच्चे मालों का निर्यातक बन कर रह जाते। 
    
स्वभावतः ही पिछड़े देशों को यह श्रम विभाजन स्वीकार नहीं था। उन्होंने अपने यहां पूंजीवादी विकास के लिए मुक्त व्यापार के बदले संरक्षणवादी नीतियां अपनाईं और भांति-भांति के सिद्धान्तों से इसे जायज ठहराया। स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के नारे इसमें काम आये। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक अलग-अलग समय पर अलग-अलग देश इस रास्ते पर चले। इन्हें अलग-अलग नाम भी मिला। 
    
यह याद रखना होगा कि यह सब वैश्विक पूंजीवाद के दायरे में ही हो रहा था। इसीलिए अलगाव या संरक्षण सीमित ही था। स्वदेशी व आत्मनिर्भरता विदेशी व परनिर्भरता के व्यापक दायरे के भीतर ही थी। केवल क्रांति के बाद समाजवाद की राह पकड़ने वाले देश ही इस वैश्विक पूंजीवाद के दायरे से पूरी तरह संबंध विच्छेद कर पाये थे। 
    
उदारीकरण-वैश्वीकरण के पिछले चार-पांच दशकों में ये भांति-भांति के अलगाव समाप्त हो गये हैं। पहले के समाजवादी देश विश्व पूंजीवादी व्यवस्था में समाहित हो गये हैं और अलगाव व संरक्षण के रास्ते पर चलने वाले भारत जैसे देश भी उसे त्याग कर एकीकृत वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था में एकाकार हो चुके हैं। यहां तक कि भांति-भांति का प्रतिबंध झेलने वाले ईरान, क्यूबा और उत्तरी कोरिया भी एकीकृत वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था से अलग-थलग नहीं हैं। 
    
एकीकृत वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था का एकीकरण केवल व्यापार के कारण नहीं है। यानी केवल आयात-निर्यात इसका आधार नहीं है। इससे भी आगे स्वयं उत्पादन का ही वैश्वीकरण हो गया है। वैश्विक असेम्बली लाइन या वैश्विक मूल्य श्रृंखला इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। इसके अलावा पूंजी, तकनीक और मशीनों का वैश्वीकरण भी इसके प्रमुख आधार स्तंभ हैं। 
    
आज भारत में आई फोन के निर्माण पर संघी प्र धानमंत्री कह सकते हैं कि यह स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की जीत है पर असल में इसमें कुछ भी स्वदेशी और आत्मनिर्भरता नहीं है। यहां सारे कल-पुर्जे, मशीन, तकनीक, पूंजी सब विदेशी हैं। यहां बस भारतीय मजदूर पुर्जे जोड़ भर रहे हैं। यह कंपनी कभी भी फुर्र हो सकती है और चुटकियों में आत्मनिर्भरता समाप्त हो सकती है। 
    
आज एकीकृत वैश्विक पूंजीवाद के जमाने में उतनी ही स्वदेशी और आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है जितनी चीन ने हासिल की है। यह इसके लिए दशकों की दूरगामी योजना की दरकार है जो देश के भीतर विज्ञान व तकनीक के विकास पर जोर दे। ठीक यही चीज भारत में गायब है। विज्ञान व तकनीक का विकास देश में कभी भी पूंजीपति वर्ग या सरकार की प्राथमिकता नहीं रहा। हमेशा ही इस मामले में विदेशी आयातक पर निर्भर रहा गया। संघी तो इस मामले में चार कदम और आगे गये हैं। वे सचेत तौर पर विज्ञान विरोधी पोंगापंथी सोच को बढ़ावा दे रहे हैं। विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों तक में भूत-प्रेत विद्या, ज्योतिष विद्या, वैदिक गणित इत्यादि के विषयों का भला और क्या परिणाम हो सकता है? 
    
देश में विज्ञान-तकनीक का विकास न केवल संघी सरकार की प्राथमिकता नहीं है बल्कि वह इसके विपरीत कार्य कर रही है। ऐसे में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की सारी बातें बस जुमला भर हैं जो संघी प्रधानमंत्री देश के लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए समय-समय पर उछालते रहते हैं।  

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