उपराष्ट्रपति का चुनाव सम्पन्न हो गया। सी पी राधाकृष्णन भारत के नये उपराष्ट्रपति बन गये।
यह चुनाव भारत पर जबरन थोपा गया था। थोपने वाले मोदी जी एवम् उनके तथाकथित चाणक्य थे। चुनाव थोपने का कारण यह था कि जगदीप धनखड़ जो कि उप राष्ट्रपति थे, वे मोदी-शाह के हाथ से निकल गये थे। उन्हें जबरदस्ती अस्वस्थ घोषित कर दिया गया। और धनखड़ जी ने अपनी कथित अस्वस्थता का हवाला देकर चुपचाप इस्तीफा दे भी दिया। इस्तीफा देने के बाद उनकी वाचाल वाणी को यकायक विराम लग गया। वे ‘‘चुप’’ ही नहीं हो गये बल्कि एक तरह से राजनैतिक पटल से ‘‘गायब’’ हो गये।
इधर धनखड़ जी चुप हुए तो मोदी-शाह, संघ-भाजपा को एक ज्यादा वफादार व समझदार संघी चाहिए था। कुछ दिन की खोजबीन के बाद एक कट्टर संघी सी.पी. राधाकृष्णन के रूप में मिल गया। उन्होंने अपने होश संभालने से पहले ही संघ की शिक्षा-दीक्षा हासिल कर ली थी। वे धनखड़ की तरह घाट-घाट का पानी नहीं पिये हुए थे। राघाकृष्णन जी ने संघ के घाट में ही अपने सारे संस्कार करवाये हैं। धनखड़ की तरह उनके अंदर कांग्रेसी, जनता दलीय विषाणु नहीं पलते रहे हैं। इसलिए वे मोदी-शाह, संघ-भाजपा के लिए कोई समस्या नहीं बनेंगे।
उप राष्ट्रपति के चुनाव के साथ मोदी-शाह ने फिर वही काम किया जिसके वे महारथी हैं। राघाकृष्णन को न केवल राजग के मत मिले बल्कि विपक्षी गठबंधन-इण्डिया गठबंधन के मत भी मिले। इन मतों को कैसे हासिल किया गया होगा, यह अब कोई रहस्य नहीं है। मोदी-शाह ने उप राष्ट्रपति चुनाव से फिलहाल वह सब कुछ हासिल कर लिया जो वे हासिल करना चाहते थे। बेचारे धनखड़ जी! चौबे जी से छब्बे जी बनने चले थे पर मोदी-शाह ने उन्हें दुबे जी भी नहीं रहने दिया। वे न घर के रहे न घाट के।
राधाकृष्णन जी, शांति से अब तक अपना काम काज करते रहे हैं। आशा है कि वे मोदी-शाह के जीवन में कोई समस्या नहीं खड़ी करेंगे। भले ही भारत का लोकतंत्र संकट में घिरा ही रहे।