वो कम्युनिस्ट नहीं थे

/vo-communist-nahin-the

चार्ली चैपलिन की याद में
 

चार्ली चैपलिन का जन्म 16 अप्रैल 1889 को लंदन में हुआ था। काम करते हुए अमेरिका पहुंचे और फिल्मों में काफी नाम कमाया। अमेरिकी सरकार ने ‘‘कम्युनिस्ट’’ होने के शक में निगरानी रखी, लंबी जांच की। सितम्बर 1952 में इन्हें आदेश दिया गया कि ‘जांच के लिए पेश हों’, चैपलिन यूरोप के लिए सफर पर थे, तय किया कि अमेरिका वापस नहीं आएंगे। 1972 में आस्कर अवार्ड देने के लिए जब अमेरिका से आमंत्रण आया तब ही वहां गए। 25 दिसम्बर 1977 को स्विट्जरलैंड में उनका निधन हुआ।
    
मूक फिल्मों में अपने किरदार के लिये आज भी चार्ली चैपलिन दुनिया भर में पसन्द किये जाते हैं। किरदार जो गरीब, अभाव ग्रस्त दुत्कारा-आवारा। जिसका पहनावा; ढीली पैंट, तंग कोट, छोटी हैट, बड़े जूते, छोटी सी मूंछ और एक छड़ी। चैपलिन का यह बेघर आवारा किरदार ‘‘द ट्रैम्प’’ के नाम से मशहूर है। वह हर दौर के उस मेहनतकश का प्रतिनिधि है जो इस पूंजीवादी व्यवस्था में उजड़ रहा है। यह बेघर आवारा किरदार मुनाफाखोर पूंजीवादी व्यवस्था में जीवित रहने के लिए कुछ भी जतन करके स्वाभिमान से जीने में माहिर है। वह पूंजीवादी नैतिकता के बेतुकेपन को मानने से इंकार करता है। वह व्यवस्था के उत्पीड़नकारी कायदों का बेलौस विरोधी है और उनसे बचने में माहिर है। यह किरदार ‘किड ऑटो रेसेज एट वेनिस’ (1914) से लेकर ‘माडर्न टाइम्स’ (1936) तक निखरता रहा। उस समय कुछ ने यहां तक कहा कि ईसा मसीह की तुलना में चार्ली चैपलिन को दुनिया में ज्यादा लोग जानते हैं। 
    
‘माडर्न टाइम्स’ बेघर आवारा किरदार की आखिरी फिल्म थी। 1959 में इस किरदार के बारे में चार्ली ने माना ‘‘मैं उसे मारने में गलत था। परमाणु युग में भी इस छोटे आदमी के लिए जगह थी।’’
    
चार्ली चैपलिन 1910 में पहली बार अमेरिका गए। उनके काम से प्रभावित हो कीस्टोन स्टूडियोज ने 1913 में उन्हें फिल्मों के लिए साइन किया। इसके बाद वो स्थायी रूप से (1952 में आने पर रोक लगाने तक) अमेरिका में रहे। हालांकि उन्होंने कभी अमेरिकी नागरिकता के लिए आवेदन नहीं किया और वहां के नागरिक नहीं बने। 1919 में उन्होंने मैरी पिकफोर्ड, डगलस फेयरबैंक्स और डी.डब्ल्यू. ग्रिफिथ के साथ मिलकर ‘यूनाइटेड आर्टिस्ट’ की स्थापना की। इसके जरिये उन्होंने स्टूडियो के दबाव के बिना कलाकार की रचनात्मक आजादी का अधिकार हासिल किया। इसके जरिये ‘द ट्रैम्प’ किरदार को बढ़ाने और वास्तविक जीवन में उसके लिए अधिकार हासिल करने वाले चार्ली चैपलिन अमेरिकी शासकों की निगरानी और जांच के दायरे में आ गए। 1922 से एफबीआई ने चार्ली चैपलिन के अमेरिकी कम्युनिस्ट पार्टी से संबंधों की जांच शुरू की। लम्बी जांच और मोटी फाइल में 1949 में जांचकर्ता ने लिखा ‘‘ऐसा कोई गवाह उपलब्ध नहीं है जो इस बात की पुष्टि कर सके कि चैपलिन अतीत में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे हैं या उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी को चंदा दिया है।’’ 
    
इसके बावजूद अमेरिका में मैकार्थी युग के चरम काल में चार्ली के अमेरिका में रहने पर रोक लगा दी गयी। 1947 में अमेरिका के हालातों पर चार्ली चैपलिन ने कहा, ‘‘आजकल अगर आप फुटपाथ में अपना बायां पैर भी रखते हैं तो आप पर कम्युनिस्ट होने का आरोप लगा देते हैं।’’ इसी दौरान चार्ली संगीतज्ञ हैंस आइस्लर के बचाव में सामने आये जिन्हें कम्युनिस्ट होने के कारण कुछ माह बाद निर्वासित कर दिया गया। चार्ली चैपलिन की कम्युनिस्टों के बारे में राय थी कि ‘‘कम्युनिस्ट हम जैसे ही आम लोग हैं जो सुंदरता से प्यार करते हैं, जो जीवन से प्यार करते हैं।’’ अपने बारे में उनका मानना था कि ‘‘मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं लेकिन मुझे यह कहते हुए गर्व है कि मैं खुद को काफी हद तक कम्युनिस्ट समर्थक महसूस करता हूं।’’
    
आज की तुलना में उस समय मानव मुक्ति की धारा के तौर पर कम्युनिस्ट विचार सर्वाधिक लोकप्रिय थे। रूसी अक्टूबर समाजवादी क्रांति, कम्युनिस्ट विचारों पर चलकर अकूत बलिदानों के बाद सफल हुई थी। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर के फासीवादी आक्रमण के खिलाफ सोवियत संघ के बारे में चार्ली ने कहा ‘‘एक साहसी नई दुनिया जिसने आम आदमी को आशा और आकांक्षा दी।’’
    
चार्ली चैपलिन की फिल्मों में महिला किरदार हमेशा संकट में फंसी युवतियां या अमीर युवतियां जिनके प्रति सब आकर्षक होते। उस समय अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही सम्मानित महिलाएं उनकी फिल्मों की किरदार नहीं थीं। अपने निजी जीवन में भी चैपलिन अपने संबंधों में पत्नी-प्रेमिका के प्रति क्रूर रहे। इस मामले में कहा जा सकता है कि वे अपने समय की दकियानूसी सोच में फंसे रहे।
चार्ली चैपलिन अपनी फिल्मों में मेहनतकशों की जीवटता के लिए याद किये जाते हैं। पूंजीवादी शोषण के बारे में ‘माडर्न टाइम्स’ तो फासीवाद पर ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ में हिटलर पर व्यंग्यात्मक फिल्म बनाई। 1940 में बनी ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ आज भी हिटलर और फासीवाद के प्रति सचेत करने वाली मनोरंजक फिल्म है।
    
वे मेहनतकश जनता के हिमायती थे। अपने ‘‘द ट्रैम्प’’ किरदार के लिए चैपलिन ने कहा ‘‘इसका पूरा सार यह है कि चाहे वह कितना ही लाचार हो जाए, चाहे सियार उसे कितना भी नोंच डालें, वह फिर भी गरिमापूर्ण व्यक्ति बना रहता है।’’ गरिमापूर्ण जीवन के लिए लड़ता हुआ मेहनतकश वर्ग चार्ली चैपलिन को इसके लिए याद रखेगा।

Tags

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।