युद्ध अन्य साधनों से राजनीति का ही जारी रूप है!

Published
Wed, 07/01/2026 - 15:50
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‘युद्ध अन्य साधनों से राजनीति का ही जारी रूप है।’ यह उक्ति कार्ल शन क्लाजविच की है जो प्रशिया के जनरल थे। ‘युद्ध के बारे में’ नामक 1832 में प्रकाशित अपनी रचना में उन्होंने इस उक्ति का प्रतिपादन किया था। तब से लेकर आज तक यह उक्ति युद्धों को समझने में एक महत्वपूर्ण सूत्र का काम करती रही है। 
    
पिछले तीन-चार महीनों में सारी दुनिया में ही ईरान पर अमरीका-इजरायली हमले की काफी चर्चा होती रही है। भांति-भांति के कोणों से इस युद्ध को समझने का प्रयास किया गया है। और अब जब एक ‘समझदारी पत्र’ के साथ युद्ध विराम हो गया है तो इसे भी समझने की कोशिश की जा रही हैं। अटकलें लगाई जा रही हैं कि अमेरिका-इजरायल फिर ईरान पर हमला करेंगे या नहीं? आने वाले समय में पश्चिम एशिया की भू-राजनीति का स्वरूप क्या होगा? सारी दुनिया के ही समीकरण कैसे बदलेंगे? क्या अब से अमरीकी साम्राज्यवादियों का वैश्विक पराभव और तेज हो जाएगा? आने वाले समय में रूस-चीन-अमेरिका के संबंध कैसे विकसित होंगे? क्या स्वयं ईरान एक बड़ी ताकत बन कर उभरेगा? इत्यादि-इत्यादि। 
    
क्लाजविच की बात मानें तो ईरार पर अमेरिका-इजरायल पर हमला उसके पहले पश्चिम एशिया में चल रही अमरीकी-इजरायली राजनीति का ही जारी रूप था। साथ ही यह सारी दुनिया में ही चल रही अमरीकी राजनीति का जारी रूप था। 
    
अमेरिका-यूरोप में बहुत सारे साम्राज्यवादी उदारवादियों ने मासूमियत का लबादा ओढ़़ते हुए कुछ यह भाव प्रकट किया कि सनकी डोनाल्ड ट्रम्प ने नेतन्याहू के बहकावे में आकर ईरान पर हमले का बेवकूफी भरा कदम उठा लिया। पर यह बात बेमानी है इसका खुलासा तब हो जाता है जब इस बात को ध्यान में रखा जाये कि इन लोगों ने युद्ध का वास्तव में विरोध नहीं किया था। वे बस युद्ध से खुद को अलग दिखाना चाहते थे। और जब युद्ध विराम हो गया है तो युद्ध विराम की आलोचना भी यह दिखाती है कि ये वास्तव में युद्ध के खिलाफ नहीं थे। असल बात वही है जो जून 2025 में जर्मन चांसलर ने ईरान पर इजरायली हमले के संदर्भ में कही थी- ‘इजरायल हमारे लिए गंदा काम कर रहा है’ या ‘इजरायल जो गंदा काम कर रहा है वह हमारा ही गंदा काम है जो वह कर रहा है’। जो यूरोपीय साम्राज्यवादी आज ईरान के मसले पर अमेरिका से दूरी बना रहे हैं वे अमरीकी जीत की सूरत में ईरान में बांट-बखरा करने पहुंच जाते। इसी तरह जो अमरीकी नेता आज ट्रंप की आलोचना कर रहे हैं वे जीत की सूरत में उसकी वाहवाही कर रहे होते।
    
अस्तु, ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमला ट्रंप की सनक का परिणाम नहीं था और न ही वह नेतन्याहू के बहकावे का परिणाम था। वह उस राजनीति का परिणाम था जिसे अमरीकी साम्राज्यवादी 1950 के दशक से ही पश्चिम एशिया और खासकर ईरान के संदर्भ में अपनाए हुए हैं। 1953 में मोसद्दक का तख्तापलट तथा 1979 में शाह रजा पहलवी के शासन का खात्मा तथा इस्लामी शासन की स्थापना इसमें दो महत्वपूर्ण पड़ाव रहे हैं। पहले ने ईरान पर अमरीकी साम्राज्यवादियों की पकड़ बना दी और दूसरे ने उसका खात्मा कर दिया। तब से लेकर आज तक अमरीकी साम्राज्यवादी ईरान पर अपनी पकड़ दोबारा बनाने के लिए हर संभव प्रयास करते रहे हैं। ईरान के बारे में सारी अमरीकी नीतियों, बातों, कार्रवाईयों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। 
    
तेल-गैस एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों तथा भू-राजनीति की वजह से पश्चिम एशिया सारी दुनिया के लिए अति महत्वपूर्ण हो जाता है। इसीलिए प्रथम विश्व युद्ध के समय से ही सारी साम्राज्यवादी ताकतें इस क्षेत्र में प्रभुत्व के लिए आपस में घमासान करती रही हैं। आज पश्चिम एशिया जो कुछ भी है वह इसी घमासान का परिणाम है। ईरान को छोड़कर लगभग बाकी सारे देशों की भौगोलिक सीमाएं भी इसी का परिणाम हैं। एक देश के तौर पर इजरायल का अस्तित्व भी इसी का परिणाम है। 
    
द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक इस क्षेत्र पर यू के व फ्रांस का दबदब था। वे ही इस क्षेत्र की नियति को तय करते थे। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इस क्षेत्र पर अमरीकी साम्राज्यवादियों का दबदबा हो गया। 1956 के ‘स्वेज संकट’ को दबदबों की विभाजक रेखा माना जा सकता है। 
    
तब से अब तक अमरीकी साम्राज्यवादी इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाये रखने की हर संभव कोशिश करते रहे हैं। तेल-गैस का अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्र होने के चलते यह साथ ही सारी दुनिया में उनके प्रभुत्व को बनाये रखने में सहायक रहा है। इजरायल इस क्षेत्र में अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए एक मजबूत आधार क्षेत्र व लठैत दोनों की भूमिका निभाता रहा है। इसीलिए इजरायल की हिफाजत और उसके मंसूबों को परवान चढ़ाना असल में अमरीकी साम्राज्यवादियों का अपना मामला है। यह अमेरिकी जनता के हित में हो या न हो पर अमरीकी साम्राज्यवादियों के हित में जरूर है। आज दोनों के बीच यानी अमरीकी साम्राज्यवादियों और अमरीकी जनता के बीच इजरायल को लेकर विलगाव स्पष्ट देखा जा सकता है। अमरीकी शासक हलकों में इजरायल को लेकर अद्भुत एकता ‘इजरायली लाबी’ का कमाल नहीं है। यह पश्चिम एशिया और दुनिया भर में अमरीकी साम्राज्यवादियों की नीति का कमाल है जिन पर उनमें एकता है। ईरान को लेकर डेमोक्रेट, रिपब्लिकन, इत्यादि सभी एक ही भाषा बोलते हैं। 
    
यदि पश्चिम एशिया को लेकर अमरीकी साम्राज्यवादियों की एक खास नीति रही है तब फिर ईरान पर हमला उन्होंने 2026 में क्यों किया? उन्होंने 1979 के बाद क्यों नहीं किया?
    
इसका उत्तर यह है कि ईरान पर किसी बहाने से हमला हमेशा ही अमरीकी साम्राज्यवादियों के बीच चर्चा का विषय रहा है। 1980 में सद्दाम हुसैन द्वारा ईरान पर हमला अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ही करवाया। वह युद्ध आठ साल चला और ईरान को भारी नुकसान हुआ। उसके बाद 1995 से ही ‘नयी अमेरिकी सदी की परियोजना’ के तहत ईरान हमले का लक्ष्य रहा है। 2003 में इराक पर अमरीकी हमले के बाद से तो लगातार यह गंभीर चर्चा का विषय रहा है। हर बार केवल सफलता की अनिश्चितता के चलते ही ईरान पर अमरीकी हमला टलता रहा है। यह याद रखना होगा कि नेतन्याहू तो पिछले तीस साल से परमाणु हथियार के बहाने ईरान पर हमले की वकालत करता रहा है। 
    
इतने लम्बे समय तक ईरान पर हमले से बचने के बाद यदि अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने 2026 में हमला कर दिया तो इसकी दो वजहें हैं। एक तो यह कि चीन के एक मजबूत साम्राज्यवादी ताकत के तौर पर उभरने के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादी बौखला उठे हैं। वे पुराने तौर-तरीके छोड़कर ज्यादा नंगे तरीकों पर उतर आये हैं। वे किसी भी तरीके से अपने वर्चस्व मे गिरावट को रोकना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने उतने ही नंगे लंपट को अपना राष्ट्रपति बना दिया है। 
    
दूसरे उन्होंने अपनी ताकत और ईरान की ताकत का गलत आकलन किया। या कहें कि वे अपने प्रचार के शिकार हो गये। उन्हें लगा कि दशकों से प्रतिबंध की मार झेल रहे ईरान के नेताओं की हत्या के बाद एक झटके से पूरा निजाम ध्वस्त हो जायेगा और वे वहां अपना पिट्ठू बैठा देंगे। यहीं पर वे मात खा गये। वे ईरान में एक-डेढ़ महीने पहले के वेनेजुएला कांड को दोहराना चाहते थे पर उन्हें वियतनाम का ‘फास्ट फार्वर्ड’ वर्जन मिल गया। नतीजतन बेइज्जत होकर अमेरिकी साम्राज्यवादियों को ईरान से युद्ध विराम करना पड़ा- ईरान की शर्तों पर। ट्रंप शेर की तरह मार्च में शी जिनपिंग से मिलने जाना चाहते थे। अंत में एक महीने बाद वे वहां भीगी बिल्ली की तरह गये। ईरान पर जीत से वे दिखाना चाहते थे कि चीनी साम्राज्यवादियों को अमरीकी साम्राज्यवादियों से मुकाबले का सपना देखना बंद कर देना चाहिए। पर ईरान में उनकी हार ने उलट साबित कर दिया- अमरीकी साम्राज्यवादियों का पराभव और तेज गति से होगा। चीनी साम्राज्यवादी बिना लड़े ही जीत रहे हैं। 
    
इस तरह ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमले के मामले में भी कार्ल वान क्लाजविच सही थे। यह युद्ध पश्चिम एशिया में चल रही राजनीति का ही जारी रूप था। अब जब युद्ध विराम हो गया है तब फिर यह उक्ति क्या बताती है? यही कि पुरानी राजनीति युद्ध के बाद से नये रूप में जारी रहेगी। व्यवहार में इसका मतलब क्या होगा?
    
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे। इजरायल की बात करें तो ‘वृहत्तर इजरायल’ के उसके सपने के लिए ईरान का तबाह होना जरूरी है। इराक, सीरिया की तबाही के बाद ईरान का ही नंबर है। इजरायली शासक अपने इस लक्ष्य को नहीं छोड़ेंगे। नेतन्याहू ही नहीं, अन्य इजरायली नेता भी इसे खुलेआम घोषित करते हैं। दूसरी ओर ईरानी शासक भी अपने निजाम और अपने देश के अस्तित्व में लिए इस क्षेत्र से अमरीकी प्रभाव की समाप्ति व इजरायली जियनवादी शासन के खात्मे पर दृढ़ हैं। रही खाड़ी के देशों की बात तो पिछले पचास-साठ सालों से अमरीकी छत्र छाया में वे खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे थे। अब इस युद्ध में इसी छत्र छाया की वजह से खुद की पिटाई के बाद उन्हें नये सिरे से तय करना होगा कि वे इस छत्र छाया से कितना बाहर निकलें। तुर्की के शासकों की इस क्षेत्र मंे अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं अमरीकी साम्राज्यवादियों व इजरायली जियनवादी शासकों से उनके खास रिश्ते हैं। यह भी इसमें भूमिका निभाएगा। पाकिस्तनी शासकों की इस युद्ध में ‘शांति दूत’ के रूप में भूमिका भविष्य में इस क्षेत्र में उनकी रणनीतिक उपस्थिति की ओर जा सकती है।
    
आज दुनिया की तीनों प्रमुख साम्राज्यवादी शक्तियों- रूस, चीन व अमेरिका- के बीच दुनिया भर के समीकरण पश्चिम एशिया में खास तौर पर घनीभूत हो रहे हैं। चालीस दिनों के युद्ध से सारी दुनिया आर्थिक तौर पर जितनी गंभीरता से प्रभावित हुई उससे इस क्षेत्र के वैश्विक महत्व को समझा जा सकता है। और इसी से यह भी समझा जा सकता है कि इस क्षेत्र में इतना तनाव क्यों है? क्यों इस क्षेत्र में व आस-पास के क्षेत्र में इतनी मारकाट है- सब साम्राज्यवादियों की बदौलत। ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमला इसी का एक परिणाम था जो अपनी बारी में कई सारी चीजों का कारण बनेगा। 
    
मोटा-मोटी कहा जाये तो पश्चिम एशिया में तनावपूर्ण स्थितियां समाप्त नहीं होने जा रहीं। अमेरिकी साम्राज्यवादी हाल-फिलहाल वहां से विदा नहीं होने वाले। इजरायली जियनवादी शासकों को उनका समर्थन भी जारी रहेगा। हां, ईरान इस क्षेत्र में पहले से ज्यादा बड़ी ताकत के रूप में उभरेगा व इससे दूसरे समीकरण प्रभावित होंगे। रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों का प्रभाव भी इस क्षेत्र में क्रमशः बढ़ेगा और अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए सिरदर्द बनेगा। सारी दुनिया के पैमाने पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों का प्रभाव घटेगा और इसी के अनुरूप समीकरण बदलेंगे। 

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