मजदूर हो रहे बेकार : लफ्फाजी और सिर्फ लफ्फाजी करती सरकार

/workers-ho-rahe-bekaar-laphphaaji-aur-only-laphphaji-karati-government

ट्रम्प के 50 प्रतिशत टैरिफ 27 अगस्त से भारत में लागू हो गये। टैरिफ लागू होने से पहले ही इसका असर मजदूर वर्ग पर पड़ता दिखने लगा था। तिरुपुर, नोएडा, सूरत के कपड़ा और परिधान निर्माताओं ने उत्पादन रोक कर हजारों मजदूरों की जीविका पर संकट खड़ा कर दिया। झींगा मछली पकड़ने वाले मछुआरों की कमाई एक झटके में जमीन पर आ गिरी। गुजरात के रत्न व आभूषण उद्योग में एक लाख मजदूरों का रोजगार खत्म हो जाने का खतरा पैदा हो गया। आगरा व कानपुर का चमड़ा उद्योग गहरे संकट का शिकार हो गया। इसमें लगे 2 लाख लोग रोजी खोने के भय से जूझने लगे। दवा उद्योग का भी हाल इस सबसे जुदा नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक ट्रम्प द्वारा थोपे मौजूदा टैरिफ से देश में 20 लाख रोजगार खतरे में पड़ने वाले हैं। 
    
भारत से अमेरिका को झींगा मछली, जैविक रसायन, दवा, कपड़ा, हीरे और सोने के आभूषण, विद्युत व यांत्रिक मशीनरी, चमड़ा व चप्पल, फर्नीचर आदि वस्तुएं निर्यात होती रही हैं। अब झींगा निर्यात पर 60 प्रतिशत, कालीन पर 53 प्रतिशत, कपड़े पर 59 प्रतिशत, हीरे-सोने पर 52 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है। भारत से अमेरिका को वर्ष 2024 में 77.5 अरब डालर का कुल निर्यात हुआ था। नये टैरिफ से इसमें 62 प्रतिशत की गिरावट (लगभग 48 अरब डालर की कमी) आने की उम्मीद है। 
    
इसका सीधा असर भारत के तमाम क्षेत्रों के उद्योगों के बंद होने, लाखों मजदूरों के बेकार होने, पहले से मांग की कमी से जूझ रही अर्थव्यवस्था में और मांग की कमी होने के रूप में सामने आना है। यह सब भारतीय अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर भी ले जा सकता है। क्योंकि क्रयशक्ति में गिरावट बाकी क्षेत्रों के उत्पादन को भी प्रभावित करेगी। 
    
इन हालातों में जब लाखों मजदूरों की जीविका खतरे में पड़ चुकी है तब मोदी सरकार क्या कर रही है? मोदी सरकार हर रोज नयी-नयी लफ्फाजी के अलावा कुछ नहीं कर रही है। कभी वह दूसरे देशों को निर्यात बढ़ाने व इस तरह अमेरिका को होने वाले निर्यात की भरपाई करने का मंसूबा घोषित कर रही है तो कभी स्वदेशी अपनाने का जुमला फेंक रही है तो कभी रूस-चीन-जापान से मित्रता बढ़ा ट्रम्प के आगे न झुकने का दावा कर रही है। हालांकि पर्दे के पीछे उसने भारतीय किसानों के हितों को दांव पर लगाते हुए कपास के आयात पर 11 प्रतिशत तटकर कटौती की घोषणा कर अमेरिका को मनाने की कोशिशें भी शुरू कर दी हैं। इन सब कदमों में मोदी सरकार की चिन्ता का सबब बेकार होते मजदूर कहीं से नहीं हैं। पूंजीवादी मीडिया में भी विभिन्न सेक्टरों के पूंजीपतियों को घाटे की बातें तो हैं पर बेकार होते मजदूरों की तकलीफ नदारद है। 
    
अगर सरकार को मजदूरों की चिंता होती तो इन सेक्टरों में मजदूरों को काम से निकालने पर रोक लगाने की घोषणा तो कर ही सकती थी। मालिकों ने इन मजदूरों का खून-पसीना निचोड़ अकूत मुनाफा कमाया हुआ है। वे आसानी से मजदूरों को काम व वेतन देते रह सकते थे पर मालिकों ने पहले दिन से ही मजदूरों को दूध में पड़़ी मक्खी की तरह निकालना शुरू कर दिया। मालिक सरकार से राहत पैकेज की गुहार लगाने पर लगे हैं पर वे मजदूरों के रोजगार की गारंटी करने को तैयार नहीं हैं। 
    
जगजाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी ने एक मित्र अम्बानी के हितों की खातिर दूसरे मित्र ट्रम्प को नाराज किया है। रूस से खरीदे जा रहे तेल की वजह से ही ट्रम्प मोदी से नाराज हैं। और रूस से खरीदे तेल का सारा फायदा मुकेश अंबानी को मिल रहा है। रूस से आ रहा कच्चा तेल मुकेश अम्बानी की रिलांयस इंडस्ट्रीज और रूसी रोसनेफ्ट द्वारा संचालित नायरा एनर्जी को अधिकतर जा रहा है। दोनों मिलकर रूस से प्रतिदिन आने वाले 15 लाख बैरल तेल का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पा रही हैं। सरकारी रिफाइनरियों को इनकी तुलना में कम तेल मिल रहा है। ये दोनों निजी कम्पनियां रूस से आये इस तेल को ऊंची कीमत पर विदेश निर्यात कर भारी मुनाफा पीट रही हैं जबकि ओ एन जी सी सरीखी सरकारी कंपनियां घरेलू आपूर्ति कर रही हैं। उक्त दो निजी कंपनियों की ईंधन निर्यात में 81 प्रतिशत भागीदारी रही है। 
    
स्पष्ट है कि रूस से आ रहा सस्ता तेल, सस्ती कीमत पर भारतीय ग्राहकों को मिलने के बजाय तेल कंपनियों व सरकार की जेब में जा रहा है। ऐसे में इस खरीद से नाराज ट्रम्प के टैरिफ से जो लाखों मजदूर बेरोजगार होने हैं, उनको मुकेश अंबानी की दौलत में से छोटा सा हिस्सा देकर ही बेकार होने से रोका जा सकता है। पर अपने जिस मित्र की खातिर मोदी ट्रम्प को नाराज कर सकते हैं, उसे लाखों मजदूरों की खातिर वे नाराज कर दें, यह तो मोदी स्वप्न में भी नहीं सोच सकते। 
    
ऐसे में मोदी सरकार लफ्फाजी के पुल खड़े करते हुए मजदूरों को सड़कों पर बेसहारा छोड़ने के अलावा कुछ नहीं करने वाली। वक्त की मांग है कि मजदूर वर्ग व बाकी आम जन अपने छीने जाते रोजगार की रक्षा में उठ खड़े हों। साथ ही अम्बानी को लुटायी जा रही दौलत का भी हिसाब करने की मांग करें। 

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?