योग दिवस

Published
Wed, 07/01/2026 - 15:50
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आज का दिन भी बाकी दिनों की तरह सामान्य ही था सिवाय उस सूचना के जो गेट पर टंगी थी। बीते कुछ सालों से कंपनी हर वर्ष 21 जून को शहर की किसी खुली जगह पर योग दिवस का आयोजन करती आ रही है जिसमें फैक्टरी के सारे मजदूरों-कर्मचारियों को आमंत्रण पत्र के रूप में गेट व अन्य जगह नोटिस चस्पा कर दिया जाता है। 
    
‘‘कल योग दिवस पर जाओगे’’? प्रश्न पूछने वाला हृष्ट पुष्ट युवक महेश है। ‘‘मुझे तेलू समझा है क्या!’’ जवाब देने वाला मजदूर जतिन है जिसे फैक्टरी में काम करते हुए काफी समय हो गया है।
    
‘‘इसमें तेलू वाली कौन सी बात है?’’ पुनः प्रश्न। ‘‘अभी बिजी हूं बाद में बात करते हैं, काम निपटाना है, थोड़ी देर में डिस्पैच देनी है। शाम को बता दूंगा कि क्यूं तेलू बोला’’ इतना कहकर जतिन अपने काम में लग जाता है। कुछ सोचते हुए महेश भी अपनी टेबल पर आ जाता है। 
    
दिन ढलते-ढलते अगले दिन की सरगर्मी तेज हो गयी है। एच आर का विश्वस्त मजदूर एक पर्चा लेकर घूम रहा है जिसमें योग दिवस पर जाने वालों के नाम लिखे जाने हैं। ‘‘देख कोशिश करना कि जिनका नाम लिखे वो कल को जरूर पहुंचे टीशर्ट गिनती की आई हैं।’’ एच आर ने राजन को समझाते हुए कहा। ‘‘अगर कोई नहीं आया तो मैं तुझे ही पकडूंगा।’’ ‘‘अरे सर आप टेंशन मत लो, टी शर्ट लेने के बाद कोई नहीं आया तो मुझसे बचकर कहां जाएगा।’’ चापलूसी और जी हुजूरी में राजन पारंगत है। 
    
‘‘तेरा नाम लिख दिया है पर्चे पर कल सुबह सात बजे पहुंच जाना और मेहता साब (एच आर) के टेबल से टी शर्ट ले आ अपनी।’’ आदेश के लहजे में राजन ने महेश की टेबल पर जाकर उसे आदेश दिया। 
    
यूं तो राजन पद में आपरेटर है। शरीर में लंबा-चैड़ा। जिसके सर पर मैनेजमेंट का हाथ रहता है। अक्सर अपने से कमजोर मजदूरों को धमकाना, डराना उसके लिए आम बात सी है। और मनोज को फैक्टरी आए कुछ ही दिन हुए हैं। ‘‘ठीक है भैय्या मैं पहुंच जाऊंगा’’। ‘शाबाश बेटे’ कंधे पर हाथ मारते हुए राजन ने कहा ‘‘ऐसे की मिलकर हमारे साथ चलना’’ कहता हुआ राजन आगे बढ़ गया। 
    
‘‘दादा आप तो नहीं जाओगे न कल को?’’ मनोज ने जतिन को संबोधित करते हुए पूछा। ‘‘नहीं’’ स्थिर, दृढ़ किन्तु शांत जवाब। ‘‘आप कभी नहीं गए योग दिवस में आज तक’’। पुनः प्रश्न और दूसरी तरफ पुनः जवाब ‘‘नहीं’’!
    
‘‘सुबह आपने तेलू वाली बात कही थी। अब तो टाइम है अब बताओ। मनोज ने आग्रह किया। जतिन ने कुछ सोचते हुए बोलना शुरू किया कल वहां पहुंचने वाले चार तरह के लोग होंगे। पहला, स्टाफ के लोग। इनमें कुछ की मजबूरी है कुछ की जिम्मेदारी। दूसरा, जो लोग कौतुहल वश वहां जायेंगे। तीसरा, कुछ लोग टी शर्ट के लालचवश जाने वाले होंगे। चैथा, चापलूस, जी हुजूरी, तेलू लोग होंगे। अभी तुम नए नए आए हो। यहां के हालात से वाकिफ नहीं हो कुछ समय बाद खुद समझ में आ जाएगा।
    
सफेद रंग की टी शर्ट पर योग दिवस छपा हुआ है। कंपनी मालिक, मैनेजमेंट, शहर का डी.एम., नगर पालिका अध्यक्ष सभी ने एक रंग की टी शर्ट पहनी है। मनोज का यह पहला मौका है जब इसकी बगल में बैठा पुलिस वाला उसे भैय्या कहकर संबोधित कर रहा है। आज इस खुली जगह पर मानो समानता और भाईचारे का राज है। 
    
आज सुबह 8ः30 पर कंपनी में एंट्री हुई है। गार्ड टी शर्ट देखकर चुपचाप एंट्री कर लेता है। कौतूहल खत्म हुआ। झोले में से वही पुरानी रोज के धूल धूसरित कपड़े उतारे गये, मनोज जानता है कि अब इन्हीं कपड़ों, धूल-भरी, कानफोडू मशीनों की आवाज के बीच ड्यूटी करनी है। 
    
समय बीता अब करीब साल भर से जीवन इस वातावरण का आदी हो चुका है। पिछले साल की टी शर्ट लोहे की गर्द से पीली पड़ चुकी है। गौर से देखने पर ही मालूम चलता है कि कभी इसका रंग सफेद था। पुनः 21 जून आने वाली है और हाथ में पर्चा लिए राजन घूम रहा है। 
    
‘‘मनोज भाई तुम आओगे योग दिवस पर’’? मनोज ने एक नजर जतिन दा को देखा फिर राजन की तरफ जिनमें उपहास का भाव था। ‘‘टी शर्ट की सफेदी की चमकार अब मैली हो गयी है।’’ मनोज ने जवाब दिया। बीते एक साल में जतिन और मनोज आपस में मित्रवत हो गये हैं। राजन को सच का भान है फिर भी कोशिश करता है। ‘‘अरे मनोज भाई चलो यार।’’ प्रस्ताव में चापलूसी मिश्रित मुस्कुराहट है। मनोज की आंखें तिरस्कार में हंस उठी और होठों पर मुस्कराहट जो अक्सर किसी के गलीचपने पर आ जाती है। जतिन दा ने वाक्य पूरा करते हुए कहा ‘‘ये तेलू नहीं है।’’ जतिन दा का जवाब सुनते ही राजन ने आगे की राह लेना ही बेहतर समझा। 
    
जाते-जाते राजन की नजर मनोज की टी शर्ट पर गई। धूल-धूसरित गर्द से काली एक साल पुरानी टी शर्ट जिसमें से मनोज का चेहरा अब चमकने लगा था।         -एक मजदूर

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