जेन जी के लिए कविताएं -शैलेन्द्र चैहान

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
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1. ऐतराज

उन्हें
जेन जी की गालियां पसंद नहीं।ladai

उन्हें पसंद हैं
सदियों से चली आती
सभ्य मुस्कानें
जिनके पीछे
छिपी रहती हैं
जातियां, ऊंच-नीच, स्त्री के लिए नियम
पुरुष के लिए छूट
और धर्म के नाम पर सजा हुआ पाखंड
दोहरे मानदंड।

वे कहते हैं
‘‘बेटा, भाषा ठीक रखो।’’
कोई उनसे पूछे
भाषा पहले बिगड़ी या समाज?
किसने सिखाया
कि अपमान को संस्कार कहा जाए
और विरोध को असभ्यता?

युवाओं की जुबान पर उन्हें ऐतराज है
पर अपनी सदियों पुरानी गालियों पर नहीं
जो कभी जाति बनकर निकलीं
कभी लिंग बनकर
कभी धर्म बनकर
कभी सत्ता बनकर।

वे शब्दों को कटघरे में
खड़ा करते हैं
और इतिहास चुपचाप
उनकी ओर देखकर मुसकुरा देता है।

क्योंकि हर पीढ़ी जानती है
गाली हमेशा मुंह से नहीं निकलती
कभी-कभी पूरा समाज ही
एक गाली की तरह जीया जाता है।

 

2. लड़ाई

लड़ती हुई लड़कियां
सिर्फ सड़कों पर नहीं होतींladai
वे घरों की चैखटों पर भी
हर रोज लड़ती हैं।

वे लड़ती हैं
अपनी आवाज बचाने के लिए
अपने सपनों के रंग
फीके पड़ जाने से पहले।

वे लड़ती हैं
किताबों के पन्नों में जगह के लिए
विद्यालयों, विश्वविद्यालयों
कारखानों और दफ्तरों में
बराबरी की एक कुर्सी के लिए।

वे लड़ती हैं
उन नजरों से
जो उन्हें इंसान नहीं
एक वस्तु समझती हैं।

वे लड़ती हैं
अपने शरीर पर
अपने अधिकार के लिए
अपने निर्णयों पर
अपने हस्ताक्षर के लिए।

उनकी लड़ाई
हमेशा नारों में नहीं होती
कभी वह मां की चुप्पी में होती है
कभी बेटी के इनकार में
कभी एक छात्रा के प्रश्न में
कभी किसी मजदूर स्त्री की
थकी हुई हथेलियों में।

वे जानती हैं
कि हर जीत के बाद
एक नई लड़ाई इंतजार करती है
फिर भी वे रुकती नहीं।

क्योंकि उन्हें मालूम है
यदि वे हार गईं
तो आने वाली पीढ़ियों की
बहुत-सी लड़कियां
जन्म लेने से पहले ही
हार जाएंगी।

इसलिए
लड़ती हुई लड़कियां
दरअसल
सिर्फ अपना भविष्य नहीं बचातीं
वे बचाती हैं
समाज का विवेक
लोकतंत्र की सांस
और मनुष्यता की सबसे सुंदर संभावना।

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