130वां संविधान संशोधन और हिंदू फासीवाद

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मोदी सरकार ने अचानक 130वां संविधान संशोधन पेश किया। यह संशोधन तब पेश किया गया जबकि मोदी सरकार घरेलू और विदेशी मोर्चे पर अपनी साख गंवा रही थी। अगस्त माह में जब एक तरफ बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण पर हंगामा मचा हुआ था और विपक्ष प्रेस कान्फ्रेंस के जरिए चुनाव में भयानक हेराफेरी को उजागर कर रहा था; सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जिसमें राज्यपाल द्वारा विधान सभा में पारित बिल पर तीन माह के भीतर फैसला लेने पर राष्ट्रपति के सवाल पर कोर्ट में चर्चा चल रही थी तब वहीं दूसरी तरफ यकायक मोदी सरकार ने 130वां संविधान संशोधन पेश कर दिया।
    
इस बिल के हिसाब से अब जेल से सरकार नहीं चलाई जा सकती। भाजपाइयों का इशारा साफ है केजरीवाल, हेमंत सोरेन, सिसोदिया जिन्हें जेल में डाल दिया गया था, उन्होंने कई माह तक हिरासत में रहने के बावजूद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया, सरकार चलाते रहे। अब इस नए बिल के हिसाब से 30 दिन तक लगातार हिरासत में रहने पर 31 वें दिन वे स्वयं पदमुक्त मान लिया जाएंगे, कोई और मुख्यमंत्री बनेगा। वैसे हिंदू फासीवादी संविधान संशोधन में माहिर हो चुके हैं। पिछले 11 सालों में ये तीस संविधान संशोधन कर चुके हैं। यह 31वां संशोधन है। यानी औसतन लगभग 3 संशोधन हर साल कर रहे हैं। 
    
आजाद भारत का जब पहला संविधान संशोधन नेहरू सरकार ने 1951 में किया तब भी उसमें आम नागरिकों के जनवादी संवैधानिक अधिकार को संविधान बनते ही काफी प्रतिबंधित किया गया था। यह आरक्षण के प्रावधान और जमींदारी उन्मूलन की आड़ में हुआ। उसी साल आजाद भारत में संविधान बनते हुए तत्काल अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल हुआ। पंजाब में राजनीतिक अस्थिरता और संकट की आड़ में तब नेहरू सरकार ने राष्ट्रपति शासन पंजाब में थोप दिया। ‘संघवाद’ की असलियत भी तभी सामने आ गई थी।  
    
संविधान संशोधन की यह यात्रा 1951 से निरंतर जारी है। हिन्दू फासीवादी जब से सत्ता पर आए हैं इन्होंने पिछले रिकार्ड तोड़ दिए हैं। 130वां संविधान संशोधन पेश करके, ये अब पूरी तरह सत्ता पर अपना नियंत्रण कायम करने को बेताब हैं। इस बीच मोदी सरकार अभूतपूर्व रूप से घरेलू और विदेशी दोनों ही मोर्चों पर वैधानिकता और नैतिक संकट का शिकार है। इस संशोधन के जरिए यह अपने इस संकट को टालने की भी कोशिश कर रही है। 
    
इस संशोधन को भ्रष्टाचार और अपराध पर नियंत्रण करने के नाम पर पेश किया गया। हिन्दू फासीवादियों ने तमाम संगठित भ्रष्टाचार और अपराध को अंजाम देने के बाद सवाल किया कि भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को सत्ता पर क्यों बने रहना चाहिए। तमाम भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को अपनी पार्टी में शामिल करने के बाद मोदी-शाह सरकार नैतिकता, शुचिता का पाठ पढ़ा रही है। इस संशोधन को लाने की मूल वजह बता रही है। 
    
130वां संविधान संशोधन; प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों व राज्य विधानसभा के मंत्रियों को पांच या पांच साल से अधिक की गंभीर सजा वाले अपराधिक मामलों में, लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहने पर, पद से हटाने का प्रावधान करता है। मंत्रियों के मामले में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति या राज्यपाल से मंत्री को पद से हटाने की सिफारिश करेंगे। जबकि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को स्वयं 31वें दिन त्यागपत्र दे देना होगा अन्यथा अगले दिन उनको पद मुक्त माना जाएगा। आरोप से न्यायिक प्रक्रिया में मुक्त होने के बाद ही वे दोबारा पद ग्रहण कर पाएंगे। 
    
चूंकि संविधान में ऐसा पहले कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए यह संशोधन दिखने में बहुत छोटा होने के बावजूद व्यापक होगा। इसमें संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 293 ।। में भी संशोधन करना होगा। इस संशोधन को साधारण बहुमत से पास कराना संभव नहीं है। यानी हिन्दू फासीवादी अपने गठबंधन के बावजूद इसे पास नहीं करा सकते। इस बिल को पास कराने के लिए एन डी ए सरकार को दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। लोकसभा में 361 तो राज्यसभा में 162 सदस्यों का समर्थन। जबकि मोदी-शाह वाली एन डी ए सरकार के पास लोकसभा में 293 सदस्य तो राज्यसभा में 130 सदस्य हैं। इसके साथ ही आधे राज्यों का अनुमोदन भी इसके लिए जरूरी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में इसकी संवैधानिकता का परीक्षण होगा। 
    
ऐसे में इस बात की संभावना काफी कम ही दिखती है कि यह बिल संसद में पास हो और कानून बन जाए। इसमें संशोधन होंगे। मोदी-शाह की जोड़ी जानती है कि इस बिल के कानून बनने की संभावना बेहद कमजोर है। फिर इसे पेश करने के क्या अर्थ या उद्देश्य हो सकते हैं। दरअसल मोदी सरकार घरेलू और विदेशी मोर्चे पर जो साख गंवा चुकी है और जिस नैतिक-वैधानिक संकट में फंस चुकी है इस बिल के जरिए इसे फिर से उलटने की कोशिश कर रही है। ये एक नया नेरेटिव फिर से गढ़ना चाहते हैं कि मोदी, शाह और उनकी पार्टी भ्रष्टाचार और अपराध के मामले के हर तरह से खिलाफ है, कि वे किसी पार्टी विशेष या विपक्ष के खिलाफ नहीं हैं, कि हमने प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों को भी नहीं छोड़ा है यदि प्रधानमंत्री पर आरोप लगते हैं तो वह भी इस कानून के हिसाब से दंडित होंगे। 
    
इस तरह हिन्दू फासीवादी विपक्ष को फंसाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। जो कोई भी इस बिल का विरोध करेगा वह भ्रष्टाचार और अपराध का समर्थक कहलाएगा। इस स्थिति में टी वी से लेकर भाजपा आई टी सेल जमकर विपक्ष के विरोध में मुहिम चलाएंगे। इस तरह यदि बिल का विरोध हो तो भी मोदी सरकार के फायदे में है यदि विरोध नहीं होता और यह बिल कानून की शक्ल में आ जाता है तब भी इन्हीं को फायदा है। यानी इनके दोनों हाथों में लड्डू हैं। इसके अलावा विपक्ष की एकता में भी दरार डालने में एक हद तक संघी सरकार सफल हो सकती है क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियां इसका ज्यादा विरोध करेंगी। 
    
जहां तक इस बिल की संवैधानिकता का सवाल है यह एक ओर केंद्र और राज्य के संबंध में केंद्र को और ज्यादा निरंकुश होने की ओर ले जाता है। यह कथित संघीय राज्य ढांचे के खिलाफ है। दूसरा यह पूंजीवादी जनवाद के उस उसूल के खिलाफ भी है जहां मुख्यमंत्री, मंत्री आदि जो जनता के प्रतिनिधित्व को अभिव्यक्त करते हैं उन्हें संगीन आरोप लगाकर और 30 दिन हिरासत में रखकर पद से हटाना, प्रतिनिधित्व के जनवादी अधिकार और जनवादी प्रक्रिया पर हमला है। तीसरा यह बिना दोष सिद्धि के ही केवल आरोप पर हिरासत में रहने को ‘अपराध’ के समकक्ष रख देता है। न्याय की बुनियादी स्थापित सोच को भी उलटकर आरोपी को पदमुक्त कर देता है। 
    
यह संशोधन हिन्दू फासीवादियों की मंशा को उजागर करता है। जिस तरह से इन्होंने संस्थाओं पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया है उसी तरह केंद्र से लेकर राज्य तक हर विधायिका और संस्था पर ये अपना प्रभुत्व कायम करना चाहते हैं। ये विपक्ष को व्यवहार में प्रभावहीन और पंगु बना देने की कोशिश में हैं। 
    
जनवाद का तकाजा है कि किसी पर भी या जन प्रतिनिधि पर आरोप लगने पर निष्पक्ष और त्वरित जांच प्रक्रिया चले। उक्त जनप्रतिनिधि, जनता यानी अपने मतदाताओं के प्रति जवाबदेह है। मात्र आरोप लगने पर और हिरासत में रहने के आधार पर उसे पद मुक्त कर देना, जनवाद को या विधायिका को नौकरशाही या निरंकुश सत्ता के अधीन कर देना है। यह विधायिका के साथ ही उन मतदाताओं के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही को खारिज कर देता है जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए एक ओर जांच प्रक्रिया द्वारा आरोप को साबित किया जाना चाहिए दूसरी ओर विधायिका में इस पर फैसला होना चाहिए। साथ ही वापस बुलाने के अधिकार (जो कि नहीं है) का प्रावधान करके मतदाताओं के बीच इसका इस्तेमाल होना चाहिए। जांच में आरोप साबित होने पर तय सजा दी जानी चाहिए। 
    
जहां शासकों को केवल फर्जी आरोप लगाकर, बिना सुनवाई के सरकार या सत्ता विरोधी नागरिक को सालों साल जेल में सड़ाने की आदत हो वहां जनवाद, जनवादी न्यायिक प्रक्रिया की क्या स्थिति होगी, समझा जा सकता है। यह कहानी केवल भाजपाइयों के जमाने की ही बात नहीं है। बहुत कुछ तो संघियों ने कांग्रेस से ही सीखा है। 
    
आजाद भारत के पूंजीवादी शासकों का हाल तो शुरू से ही ऐसा रहा है। धीरे-धीरे यह बढ़ता गया। जिस यू ए पी ए की आजकल खूब चर्चा है वह तो इंदिरा गांधी के दौर का बना हुआ है। जिस सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) के खिलाफ इरोम शर्मिला भूख हड़ताल पर बैठी वह तो नेहरू सरकार के जमाने में ही बना और लागू हुआ। जिसमें केवल शक के आधार पर गोली चलाने, नष्ट कर देने के आदेश हैं। 
    
हिन्दू राष्ट्रवादी इस सबसे भी सीखकर और प्रेरित होकर इसे धड़ल्ले से नग्न होकर लागू कर रहे हैं। आखिर हिटलर और मुसोलिनी तो इनके मार्गदर्शक और आदर्श गुरू जो ठहरे। इसीलिए गृहमंत्री शाह बड़ी आसानी से कांग्रेसियों को सदन में आईना दिखाने में सफल हो जाते हैं। आखिर 2010 में ‘तड़ीपार’ होने से पहले शाह ने इस्तीफा जो दिया था। दोनों के ही अपने-अपने आकाओं की सेवा करने के अपने-अपने तौर-तरीके हैं।
    
मोदी-शाह की सरकार 130वें संशोधन को लागू करने को बेचैन है। इन्होंने दिल्ली में पहले आम आदमी पार्टी की सरकार को काम करने में हर तरह से रुकावट पैदा की। मात्र आरोपों के आधार पर, पूछताछ के नाम पर दो मुख्यमंत्रियों को कई माह तक जेल में रखा गया, इसके अलावा एक-दो मंत्रियों को भी। दिल्ली सरकार के फैसलों को भाजपाई उपराज्यपाल द्वारा बार-बार रोका गया। और अंततः चुनाव में 1 प्रतिशत के अंतर से भाजपाई अपनी सरकार बनाने में सफल रहे। अब दिल्ली शांत है। चुनाव कैसे जीते होंगे? इसका खुलासा अब सबके सामने हो चुका है। यही हश्र झारखंड में किया गया। हेमंत सोरेन को भूमि घोटाले के आरोप में जेल में डाल दिया, बाद में हाईकोर्ट ने इस मामले को अपर्याप्त सबूत, मनमानी गिरफ्तारी बताकर खारिज कर दिया। 
    
विपक्ष के खिलाफ हिन्दू राष्ट्रवादियों के पास सबसे खतरनाक हथियार है पी एम एल ए कानून यानी धन शोधन निवारण कानून। घोटाले या भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर ई डी (प्रवर्तन निदेशालय), सी बी आई और आयकर विभाग जो कि केंद्र सरकार के हथियार हैं विपक्षी मंत्रियों को कथित आरोपों के आधार पर डराती, धमकाती और गिरफ्तार कर लेती हैं। कई समर्पण कर देते हैं भाजपाई भगवा झण्डा थाम कर ‘पवित्र’, ‘आरोपमुक्त’, ‘ईमानदार’ घोषित हो जाते हैं। 
    
इस कानून के तहत 2014 से 2024 के बीच ई डी ने पी एम एल ए कानून के तहत 5297 मामले दर्ज किये। 95 प्रतिशत मामले विपक्षी नेताओं के खिलाफ थे। केवल 20 प्रतिशत मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई। कुल मामलों में से केवल 40 पर आरोप साबित हुए। दोष सिद्धि दर 0.5 प्रतिशत है। इन मामलों से समझा जा सकता है कि यदि 130वां संविधान संशोधन प्रस्तावित बिल ही कानून बन गया तो राज्य सरकारें केवल केंद्र सरकार के रहमो करम पर ही वजूद में रह पायेंगी। विपक्ष के इस तरह कमजोर होने या खत्म होने का साफ मतलब है; केंद्र सरकार का और ज्यादा निरंकुश होना। इस तरह आम जनता पर निरंकुशता व फासीवाद का फंदा और सख्ती से कस जाएगा। इसके बावजूद कि विपक्ष भी जनपक्षधर नहीं है दमनकारी है। मगर विपक्ष का होना और शासक वर्ग के इन अलग-अलग हिस्सों की पार्टियों के बीच अंतर्विरोध जनता के हित में रहे है, यह आम जनता के लिए जनवाद और अधिकारों के संघर्ष में बेहतर गुंजाइश पैदा करता है। 
    
स्पष्ट है कि मोदी-शाह समेत हिन्दू फासीवादी जब इस बिल को कानून के रूप में लाने की सोचते हैं तब वे इससे खुद को मुक्त कर लेते हैं। इसका एकमात्र कारण यही है कि देश के वास्तविक शासक आज इनके साथ खड़े हैं। अंबानी, अदानी, महिंद्रा जैसे लंपट इजारेदार पूंजी के मालिकों को घोर लंपट हिन्दू राष्ट्रवादियों में ही अपनी मुक्ति दिखती है। यह अलग बात है कि इस मुक्ति में भी इनके विनाश के बीज छुपे हैं। 

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