अमेरिका द्वारा 3 भारतीय नाविकों की हत्या
होरमुज के निकट मालवाहक जहाजों पर हमला कर अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने 3 भारतीय नाविकों की हत्या कर दी। आरोप है कि ये जहाज अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन कर आगे बढ़ रहे थे। जहाज में सवार 24 लोगों में 3 भारतीय नाविक इस हमले में मारे गये।
भारतीय नागरिकों की अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा की गयी हत्या पर हर कोई उम्मीद कर रहा था कि 56 इंची सीने वाले प्रधानमंत्री अमेरिका को माकूल जवाब देंगे। पर ऐसा नहीं हुआ। 56 इंची सीने वाले प्रधानमंत्री के मुंह से अमेरिका के विरोध में 5 शब्द भी नहीं निकले। वे पूरी तरह मौन साध गये। इस घटना पर प्रतिक्रिया देने का जिम्मा विदेश मंत्रालय ने संभाला। पहले अमेरिकी राजनयिक व फिर अमेरिकी विदेश मंत्री को फोन कर भारत के विदेश मंत्री ने आपत्ति जतायी। इन्होंने भी अमेरिकी हमले की निन्दा तक नहीं की। खबर यह भी है कि अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो ने उल्टा भारतीय विदेश मंत्री को खरी-खोटी सुना दी कि जहाज अमेरिकी नाकाबंदी को क्यों तोड़ रहा था। इस पर भारतीय विदेश मंत्री कोई आपत्ति भी नहीं जता पाये।
भारत के 3 नाविक किसी युद्धपोत पर सवार नहीं थे वे एक मालवाहक पोत पर सवार थे। एमटी सेटेबेलो नामक पोत जब ओमान सागर से गुजर रहा था तो अमेरिकी विमान ने इसके इंजन को निशाना बनाया। तुरंत आसमान में धुएं का बड़ा गुबार उठा। पलाउ के झंडे वाले इस जहाज पर हुए हमले में 3 भारतीयों के मारे जाने की अमेरिका ने पुष्टि की।
अब न केवल भारत के भीतर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में इस घटना पर भारत की कमजोर प्रतिक्रिया पर बहस छिड़ गयी है। भारत में कुछेक मजदूर संगठनों ने घटना की निन्दा करते हुए भारत सरकार से अमेेरिका को कड़ी भाषा में उत्तर देने की मांग की।
पर भारतीय शासक अमेरिकी साम्राज्यवादियों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को जारी रखने की खातिर किसी कड़े रुख तो दूर कायदे से सवाल पूछने को भी तैयार नहीं हैं। भारत के संघी अमेरिकापरस्त शासक अमेरिका-ईरान युद्ध के मसले पर पाकिस्तान के वार्ताकार बनने व अमेरिका-पाक के गहराते रिश्तों से चिंतित हैं। ऐसे में वे प्रश्न उठा अमेरिका को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहते। आलोचक दावा कर रहे हैं कि अगर यही हरकत पाकिस्तान ने की होती तो भारतीय शासक अब तक आसमान सिर पर उठा चुके होते। पाकिस्तान को ‘घर में घुस कर मारने’ की धमकी दे दी जाती और समूचे देश में पाक के खिलाफ हर जगह प्रदर्शन शुरू हो चुके होते। पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के आगे भारत के संघी शासक भीगी बिल्ली बन जाते हैं। बीते 1 वर्ष में अमेरिकी सरगना ने न जाने कितनी बार भारत के लिए दिक्कततलब दावे किये पर भारतीय शासक उनके आगे सिर झुकाये रहे।
यह सब दिखाता है कि 56 इंची सीने का -संघी ताकतों का राष्ट्रवाद का सारा ढिंढोरा फर्जी है। ये पाकिस्तान के खिलाफ ही सारा राष्ट्रवाद दिखाते हैं और कहीं बड़े अत्याचारी अमेरिका के आगे भीगी बिल्ली बन जाते हैं। 56 इंच का सीना पाक पर ही बरस सकता है। ट्रम्प के आगे तो वह सिकुड़ कर 5 इंच का रह जाता है।
देश के भीतर हर किसी को देशभक्ति का सर्टिफिकेट बांटने वाले संघी अपने नागरिकों की अमेरिका द्वारा हत्या पर मौन साध कर देश से गद्दारी व अमेरिकी भक्ति का ही प्रदर्शन कर रहे हैं। अमेरिका के निर्देश पर ये रूस से कभी तेल खरीदते हैं तो कभी बंद कर देते हैं। अमेरिका के कहने पर ईरान से तेल खरीद रोक देते हैं।
मोदी और ट्रम्प की दोस्ती को भारत का पूंजीवादी मीडिया खूब प्रचार करता रहा है। बस वह यह बताना भूल जाता रहा है कि यह ‘दोस्ती’ नहीं स्वामी से स्वामिभक्ति निभाने सरीखी बात अधिक है। भारत सरकार ने अमेरिका को अपना ‘स्वामी’ मान लिया है। और वह भला चंद भारतीयों के ‘स्वामी’ द्वारा मार दिये जाने पर स्वामी को कैसे नाराज कर सकती है।
मोदी सरकार वक्त के साथ स्पष्ट करती जा रही है कि उसकी आका उसे गद्दी तक पहुंचाने वाली भारतीय जनता नहीं अमेरिकी हुक्मरान हैं। इसीलिए बात चाहे भारतीय नागरिकों को हथकड़ी लगा भारत भेजने की हो या फिर उनकी हालिया हत्या की हो मोदी सरकार अपने ‘आका’ को नाराज नहीं कर सकती। ऊपर से जब यह सरकार खुद को सबसे बड़ा ‘देशभक्त’ घोषित करती है तो शक होने लगता है कि कहीं इन्होंने अमेरिकापरस्ती में लीन होकर अमेरिका को ही अपना देश तो नहीं मान लिया है।