अमेरिकी साम्राज्यवाद के हमले व आतंक के साये में ‘मई दिवस’

Published
Thu, 04/16/2026 - 15:50
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इस वक्त पूरी दुनिया में ‘मई दिवस’ मनाने की तैयारियां चल रही हैं। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें, छोटी-बड़ी यूनियनें, संघर्ष के मैदान में उतरे मजदूर और मजदूर वर्ग के साथ खड़े लोग तैयारियां कर रहे हैं कि इस साल ‘मई दिवस’ कैसे मनाया जाए। दुनिया भर की असली-नकली कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट, लेबर आदि, आदि पार्टियां भी ‘मई दिवस’ को मनाने की तैयारियां कर रही हैं। इतना ही नहीं दुनिया भर में पूंजीवादी सरकारें भी 1 मई दिवस के दिन कुछ न कुछ शुभकामनाएं, संदेश और घोषणाएं करती रहती हैं। यानी ‘मई दिवस’ ऐसा दिन होता है जिस दिन क्रांतिकारी लोगों से लेकर क्रांति की राह छोड़ चुके लोग ही नहीं बल्कि मजदूर क्रांति के दुश्मन भी अपनी ओर से कुछ न कुछ करते हैं। मजदूरों के दुश्मन भी मजदूरों के सबसे बड़े हितैषी के रूप में अपने को पेश करते हैं। ‘मई दिवस’ को जो कुछ भी हो, कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता है। ‘मई दिवस’ की यह ताकत और यह महत्व है। 
    
इस वर्ष हम ‘मई दिवस’ अमेरिकी साम्राज्यवाद व इजरायली जियनवादी शासकों द्वारा ईरान पर किये गये हमले और उसके बाद उपजे संकट और नई ढंग से गहराती पुरानी समस्याओं की पृष्ठभूमि में मना रहे होंगे। ईरान पर बोले गये हमले के फलस्वरूप दुनिया भर में महंगाई, बेरोजगारी के साथ आपूर्ति श्रृंखला के बाधित होने से समाज के अलग-अलग वर्ग व तबकों के लिए अलग-अलग तरह का संकट पैदा हो गया है। दुनिया भर में हाहाकार मचा हुआ है। 
    
हमारे देश के उन मजदूरों को जो देश के भीतर हैं, उन्हें रोजगार छीने जाने, महंगी गैस जैसी खास तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा तो जो मजदूर देश के बाहर हैं उन्हें युद्ध के आतंक के साये में हर पल गुजरना पड़ा है। इन मजदूर-कर्मचारियों पर निर्भर भारतीय परिवारों को अलग ही तरह के संकट व भय-आशंका का सामना करना पड़ा है। कुल मिलाकर, देखें तो इस वर्ष हम, ‘मई दिवस’ साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के असमाधेय संकट के बीच मना रहे हैं। साम्राज्यवाद व पूंजीवाद जब तक रहेंगे, तब तक मानवजाति का भविष्य हमेशा खतरे में ही रहेगा। ऐसा इनके चरित्र में है। और ऐसा अतीत व वर्तमान में इन्होंने बार-बार साबित किया है। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा ईरान पर किये गये हमले में हजारों लोग मारे व घायल हो गये। और विस्थापित लोगों की संख्या तो कई लाख हैं। ईरान ने भी इस हमले का जोरदार जवाब दिया। ईरान को यद्यपि इस हमले में बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ा परन्तु ईरान ने अमेरिका व इजरायल को भी अच्छा खासा जान-माल का नुकसान पहुंचाया। ईरानी शासकों व वहां की जनता के शासकों के साथ खड़े होने से अमेरिकी साम्राज्यवादी व इजरायली जियनवादी (यहूदी फासीवादी) शासकों के सारे मंसूबे धरे रह गये। अंत में झख मार कर अमेरिकी साम्राज्यवादियों को ईरान के साथ पहले युद्ध विराम और फिर समझौता वार्ता के लिए मजबूर होना पड़ा। 
    
अमेरिकी व इजरायली शासक कितने बड़े छली-कपटी हैं यह हर कोई जानता है। और ईरान भी अपने अनुभव से (खासकर ठीक अभी बोले गये हमले के ठीक पहले चल रही वार्ता और उसके साथ किये हमले में) ढंग से जानता है कि उसका सामना धूर्त, मक्कार शैतानों से पड़ा है। ये दोनों जब युद्ध विराम करते हैं तो उसका सीधा मतलब होता है कि ये, और बड़ी तैयारी करके और बड़ा हमला बोलेंगे। और यह अगर ऐसा तत्काल न भी कर पायें तो निकट भविष्य में फिर करेंगे। पिछले वर्ष ‘12 दिन युद्ध’ के बाद ईरान के साथ यही किया गया था। ठीक ऐसा ही इजरायल ने पहले लेबनान में हिजबुल्ला व गाजा पट्टी में हमास के साथ किया। पहले हमला किया, फिर अच्छा जवाब मिलने के बाद युद्ध विराम किया, और युद्ध विराम (सीज फायर) के बाद छोटे-बड़े हमले, समय-समय पर दोनों ही जगहों पर जारी रखे। और यह सब इसलिए किया ताकि ‘युद्ध विराम’ या ‘‘समझौते’’ का कोई मतलब न रह जाए। जब ये दोनों पिटते हैं तो तुरंत पीछे हटकर पलटवार करने का तरीका अपनाते हैं। 
    
ईरान पर बोले गये हमले व इसी तरह लेबनान-फिलिस्तीन में इजरायली काली करतूतों का पूरी दुनिया में जबरदस्त विरोध हुआ है। खुद स.रा.अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ ‘नो किंग्स मूवमेंट’ शहर-शहर चल रहा है। ट्रम्प के युद्ध-अभियान के खिलाफ हर शहर में, हजारों-हजार लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। ईरान पर किये गये हमले का विरोध, पांचों महाद्वीपों में हो रहा है। जनता के उग्र तेवर के कारण ही अमेरिका के घनिष्ठ सहयोगी रहे यूरोपीय साम्राज्यवादी, ईरान पर किये गये हमले में अमेरिका के साथ नहीं खड़े हुए। न यू.के., न फ्रांस, न इटली और न जर्मनी इस युद्ध में शामिल हुआ। जो लोग सड़कों में उतरे, वे लोग कौन थे। उन लोगों में सबसे अधिक संख्या स्वभावतः मजदूर-मेहनतकशों और उनके बेटे-बेटियों की ही थी। ईरान का प्रतिरोध अपनी जगह पर है परन्तु अमेरिका को पीछे हटाने में, दुनिया भर की जनता की भूमिका अति महत्वपूर्ण है। 
    
दुनिया भर के मजदूरों को इस वर्ष ‘मई दिवस’ को अमेरिकी साम्राज्यवाद और जियनवादी इजरायली शासकों के खिलाफ आक्रोश और उनके खात्मे के लिए जन संघर्षों को तीव्र करने के संकल्प दिवस के रूप में मनाना चाहिए। निःसंदेह पूरी दुनिया में इस वर्ष ‘मई दिवस’ के दिन अवश्य ही ऐसा ही होगा। 
    
डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी साम्राज्यवाद के सबसे वीभत्स चेहरों में से एक है। यह न केवल अमेरिकी साम्राज्यवाद के बल्कि अपने निजी हितों के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। पूरी दुनिया में ही नहीं बल्कि खुद अपने देश में मजदूर-मेहनतकशों, शोषित-उत्पीड़ितों के खिलाफ सबसे घृणित, प्रतिक्रियावादी, फासीवादी, सर्वसत्तावादी तत्वों को यह पालता है, उनकी रक्षा करता है। इजरायल में नेतन्याहू, हंगरी में विक्टर ओर्बान, भारत में मोदी इसके पसंदीदा शासक हैं। इनमें से किसी की भी टोपी वह कभी भी उछाल सकता है। 
    
ट्रंप ने जितने बुरे ढंग से पहली दफा राष्ट्रपति बनने पर शासन किया था, इस बार वह उससे कहीं आगे निकल चुका है। उसने वेनेजुएला पर फिर ईरान पर हमला किया और आगे के हमलों के लिए वह एक के बाद देशों का नाम लेता है। पूरी दुनिया में उसने मनमाफिक, टैरिफ टैक्स लगाकर विश्व अर्थव्यवस्था को अमेरिका के मार्फत व मनमुताबिक लाने व चलाने की कोशिश की। अमेरिका में रहने वाले अप्रवासियों के खिलाफ आतंकी अभियान चलाया और सैकड़ों की संख्या में उन्हें गिरफ्तार कर, जंजीरों में बांधकर उनके देशों में जबरन पहुंचा दिया। ट्रंप और उसके समर्थक आये दिन अपने विरोधियों को, औरतों को, मुसलमान को, एलजीबीटीक्यू को, अप्रवासियों को, अश्वेत लोगों को, बुद्धिजीवी-पत्रकारों को, वामपंथियों को, कम्युनिस्टों को गाली देते रहते हैं। यानी जो कोई इनका विरोधी है ये उसका अपमान, उसकी हत्या की धमकी देते हैं। जाहिर सी बात है अमेरिकी साम्राज्यवाद खुद अमेरिका के लिए ही नहीं पूरी मानव जाति के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। जो बात अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए लागू होती है वही बात चीनी, रूसी, फ्रांसीसी, ब्रिटिश या जापानी साम्राज्यवाद के लिए भी बदले रूप में लागू होती है। ये साम्राज्यवादी देश कम विकसित, अल्प विकसित तीसरी दुनिया के देशों के शोषण-उत्पीड़न के लिए उन पर हरदम निशाना साधते हैं। और इनमें सबसे घृणित अमेरिकी साम्राज्यवाद, किसी भी देश पर जब मर्जी आये तब हमला बोल देता है। 
    
यह एक सच्चाई है कि जितने लोग दूसरे विश्वयुद्ध में मारे गये थे उससे कहीं अधिक लोग दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों के हमले, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष युद्ध में मारे जो चुके हैं। और यह भी सच है कि जब तक साम्राज्यवाद, पूंजीवाद जिन्दा रहेगा तब तक मानव जाति का यूं ही कत्लेआम होता रहेगा। 
    
ऐसे में पूरी मानव जाति का भविष्य तब ही सुरक्षित हो सकता है जब मजदूर वर्ग आगे आये और अपने को एक वर्ग के रूप में संगठित करे। अपने क्रांतिकारी संगठन का निर्माण करे। पूरी दुनिया में शोषित-उत्पीड़ित जनों को जगाये और उन्हें अपने साथ साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के खिलाफ साझा लड़ाई के लिए संगठित करे। मजदूरों का नारा हमेशा से ‘दुनिया के मजदूरो एक हो’ रहा हें यह नारा जितनी जल्दी हकीकत बनता है उतनी ही जल्दी मानव जाति साम्राज्यवाद व पूंजीवाद के जुए से मुक्त हो सकती है। 

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