अपनी नाकामी को ढंकने के लिए अंधराष्ट्रवादी-युद्धोन्मादी माहौल

/apani-nakami-ko-dhankane-ke-liye-andharashtravadi-yuddhonmadi-mahaul

पहलगाम आतंकी हमला 

22 अप्रैल को पहलगाम की बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले के बाद से संघी ताकतें-सरकार व मीडिया देश में एक उन्मादी माहौल बनाने में जुटी हैं। कहां तो निर्दोष पर्यटकों की निर्मम हत्या की दुखद घटना के लिए सुरक्षा चूक, कश्मीर नीति की विफलता के लिए मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए था। सरकार से उसकी नाकामी की जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए थी। पर जो माहौल देश भर में कायम कर दिया गया है वहां मोदी-शाह का गुणगान हो रहा है और निशाने पर पाकिस्तान-कश्मीरियों और मुसलमानों को लिया जा रहा है। एक ऐसे युद्ध का आह्वान किया जा रहा है जिसका खामियाजा दोनों देशों के मजदूरों-मेहनतकशों को ही उठाना पड़ेगा। 
    
बीते कुछ वर्षों से मोदी सरकार कश्मीर में शांति कायम होने-हालात सामान्य होने का दावा कर रही थी। इस हमले ने साबित कर दिया कि हालात कहीं से भी सामान्य नहीं हुए हैं। किसी संघर्षरत कौम के संघर्ष को संगीनों से कुचलकर हालात सुधरने के बजाय बिगड़ने की ओर ही जायेंगे। कश्मीर सवाल एक राजनैतिक प्रश्न है जिसका कश्मीरी अवाम की इच्छा-आकांक्षाओं की पूर्ति करने वाला राजनैतिक हल ही स्थायी समाधान हो सकता है। 
     
भारत सरकार पहलगाम हमले में भारी सुरक्षा चूक को स्वीकार चुकी है। एक ऐसी घाटी जहां हजार से ज्यादा पर्यटक-रेहडी ठेले वाले मौजूद हों वहां एक भी सुरक्षा बल का मौजूद न होना, प्राथमिक उपचार की किसी सुविधा का मौजूद न होना, हमले के बाद भी सैन्य बल का काफी देर से पहुंचना आदि बातें सरकारी इंतजामों पर प्रश्न चिह्न खड़ा करती हैं। एक ऐसी जगह पर जहां आये दिन आतंकी हमलों का खतरा हो, जहां भारी सैन्य बल तैनात हो वहां ऐसी सुरक्षा चूक पुलवामा हमले की तरह की सरकारी इंतजामों की विफलता है जिसके कारणों को निश्चय ही सरकार से पूछा जाना चाहिए। 
    
पर मोदी सरकार से प्रश्न पूछने के बजाय मुख्य धारा का भारतीय मीडिया सरकार की वाहवाही में जुटा है। पाकिस्तान को हमले का दोषी करार देकर दोनों देशों के बीच युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है। इस अंधराष्ट्रवादी-युद्धोन्मादी माहौल में कश्मीरियों व मुसलमानों को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। उनके खिलाफ पूरे देश में नफरती माहौल को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस हेतु जानबूझकर इस बात को तूल दिया जा रहा है कि पहलगाम हमले में धर्म पूछ कर हत्यायें की गयीं। और उतना ही जानबूझकर यह हकीकत छुपायी जा रही है कि एक कश्मीरी मुसलमान ने आतंकियों से पर्यटकों को बचाते हुए लड़ते हुए अपनी जान गंवा दी। कि हमले के बाद पर्यटकों को बचाने, राहत पहुंचाने, अस्पताल ले जाने का काम स्थानीय कश्मीरियों ने ही किया। कि कश्मीरी होटलों-दुकानों ने इस दौरान मुफ्त में मदद की जबकि भारत की एयरलाइंस कंपनियों ने मौके का लाभ उठाते हुए अपने किराये 3 गुना तक बढ़ा दिये। हमले के विरोध में पहली प्रतिक्रिया भी कश्मीरियों ने एकजुट होकर दी। पर ये सब बातें पूंजीवादी मीडिया ने प्रचारित नहीं कीं क्योंकि ऐसा करने पर संघी संगठनों व मीडिया द्वारा कश्मीरियों-मुसलमानों के खिलाफ बनाया जा रहा माहौल नहीं बन पाता। 
    
इस घटना के बाद कायम हुए माहौल से संघ-भाजपा को मानो संजीवनी मिल गयी हो। एक तरफ वक्फ बिल पर हो रहे प्रदर्शनों से मुद्दा पाक विरोध की ओर बढ़ गया वहीं दूसरी ओर बिहार चुनाव में जीत की आस भी जग गयी है। इसीलिए सऊदी अरब दौरा बीच में छोड़कर भारत आने वाले प्रधानमंत्री मोदी कश्मीर जाने के बजाय बिहार की जनसभा में पहुंच गये। 
    
इस नफरती माहौल-युद्धोन्माद व सरकार की नाकामी पर प्रश्न उठाने वाले लोगों पर संगीन धाराओं में मुकदमे लिखे जा रहे हैं जबकि संघी प्रचार मशीनरी कश्मीरियों-मुसलमानों के खिलाफ बेरोकटोक अनर्गल बातें बेखौफ होकर कर रही है। बल्कि उन पर हमले भी बोले जा रहे हैं। मुसलमानों के बहिष्कार व कश्मीरियों को शक से देखने-धमकी देने की तमाम घटनायें सामने आयी हैं।
    
किसी जमाने में जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में जर्मन फासीवादियों ने जर्मन संसद में आग लगा कर उसका आरोप कम्युनिस्टों-समाजवादियों पर लगा उनका निर्मम दमन किया था। आज लगता है हिटलर के नक्शे कदमों पर चलते हुए मोदी सरकार अपनी नाकामी पर सवाल उठाने वालों के दमन में जुटी है। ऐसे में प्रश्न यही रह जाता है कि यह नाकामी-चूक जानबूझकर की गयी या अनजाने में। 
    
युद्धोन्मादी माहौल के आगे बढ़कर युद्ध तक न पहुंचने से जिसको सबसे ज्यादा खामियाजा उठाना पड़ेगा वे दोनों देशों के मजदूर-मेहनतकश होंगे। मारे जाने वाले सैनिक व निर्दोष आम जन होंगे। ऐसे में दोनों देशों के शासक युद्ध के बहाने अपनी नाकामी छिपायेंगे व युद्ध का बोझ जनता पर डाल देंगे। रूस-यूक्रेन युद्ध के वक्त दुनिया भर में ‘यह दौर युद्ध का नहीं है’ का अलाप जपने वाले प्रधानमंत्री मोदी लगता है अब ये बात भूल चुके हैं। इसीलिए युद्ध का विरोध किया जाना चाहिए। 
    
पहलगाम हमला सरकारी सुरक्षा चूक, मोदी सरकार की कश्मीर नीति की विफलता का परिणाम है। इसे युद्ध व नफरती माहौल की ओर ले जाती संघी कोशिशों के खिलाफ हर आम जन को खड़ा होना चाहिए। 

आलेख

/capital-dwara-shram-par-kiya-gaya-sabase-bhishan-hamala

मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

/barbad-gulistan-karane-ko-bas-ek-hi-ullu-kaafi-hai

सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

/amerika-izrayal-ka-iran-ke-viruddha-yuddh

अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा।