(दिल्ली विश्वविद्यालय से चौथे वर्ष की पढ़ाई छोड़ने पर विश्वविद्यालय और NEP पर एक व्यंग्य)
दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने फिर साबित कर दिया कि वे पढ़े-लिखे होने के बावजूद कभी-कभी समझदारी का काम कर बैठते हैं। विश्वविद्यालय ने बड़े प्रेम से उन्हें चौथा साल दिया था। जैसे कोई दुकानदार तीन किलो चीनी खरीदने पर चौथाई किलो मुफ्त दे देता है। मगर छात्रों ने उस मुफ्त की चीनी को लेने से ही मना कर दिया।
सरकार ने कहा था- ‘‘लो बेटा, यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) है। इसमें आजादी ही आजादी है। एक साल पढ़ो तो सर्टिफिकेट लेकर भाग जाओ, दो साल पढ़ो तो डिप्लोमा लेकर निकल लो, तीन साल पढ़ो तो डिग्री लेकर रफूचक्कर हो जाओ और चार साल पढ़ो तो रिसर्चर बन जाओ।’’
छात्रों ने कहा- ‘‘महाराज, भागना ही है तो तीन साल बाद क्यों न भागें?’’
यह सुनकर नीति-निर्माता दुखी हो गए। उन्हें उम्मीद थी कि छात्र चैथे साल पर वैसे ही टूट पड़ेंगे जैसे चुनाव के समय नेता जनता पर टूट पड़ते हैं। मगर छात्र तो बेरहम निकले। उन्होंने पूछा- ‘‘इस चैथे साल से मिलेगा क्या?’’
नीति-निर्माताओं ने जवाब दिया- ‘‘ज्ञान मिलेगा।’’
छात्र बोले- ‘‘ज्ञान तो तीन साल में भी नहीं मिला, चौथे में कहां से आ जाएगा?’’
उन्होंने कहा- ‘‘रिसर्च का अवसर मिलेगा।’’
छात्रों ने पूछा- ‘‘रिसर्च किस पर करें? बेरोजगारी पर या फीस वृद्धि पर?’’
अब विश्वविद्यालय प्रशासन परेशान है। वह छात्रों को समझा रहा है कि चौथा साल बहुत उपयोगी है। मगर यह उपयोगिता ठीक उसी तरह है जैसे सरकार जनता को बताती है कि महंगाई वास्तव में विकास का लक्षण है। जनता को भूख लगती रहती है और अर्थशास्त्री उसे समझाते रहते हैं कि वह दरअसल समृद्धि का अनुभव कर रही है। उनकी भूख ही देश की असल समृद्धि है।
विश्वविद्यालय के एक अधिकारी ने कहा कि छात्रों को चौथे साल के लाभ समझ में नहीं आए।
यह बड़ी विचित्र बात है। चार साल तक पढ़ाने के बाद भी अगर छात्र लाभ नहीं समझ पाए तो या तो लाभ बहुत सूक्ष्म हैं या फिर लाभ हैं ही नहीं। यह वैसा ही है जैसे कोई डाॅक्टर मरीज को दवा दे और मरीज पूछे कि इससे फायदा क्या होगा? डाक्टर जवाब दे- ‘‘फायदा तो बहुत है, लेकिन आपको दिखाई नहीं देगा।’’
दरअसल चौथा साल भाजपा सरकार में भारतीय शिक्षा व्यवस्था का वह कमरा है जिसे मकान बन जाने के बाद जोड़ दिया गया है। पहले मकान बना, फिर किसी को याद आया कि एक कमरा और होना चाहिए। अब उस कमरे का दरवाजा कहीं खुलता नहीं, खिड़की कहीं जाती नहीं, मगर मकान मालिक कह रहा है कि यही सबसे महत्वपूर्ण कमरा है।
छात्रों की भी मजबूरी है। उनके घरों में पिता जी चैथे साल की फीस सुनते हैं तो उनकी आंखों के सामने पूरा शोध प्रबंध घूम जाता है।
माँ पूछती है- ‘‘बेटा, चौथे साल में नौकरी मिल जाएगी?’’
बेटा कहता है- ‘‘नहीं।’’
‘‘फिर क्या मिलेगा?’’
‘‘आनर्स विद रिसर्च।’’
मां सोचती है कि यह कोई नई बीमारी होगी।
देश में लाखों युवा नौकरी के लिए भटक रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के फार्म भरते-भरते उनकी उम्र निकल रही है। NEET, CUET जैसे हाई प्रोफाइल एग्जाम लीक हो जा रहे हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय कह रहा है- ‘‘एक साल और रुक जाओ।’’
यह वैसा ही है जैसे कोई आदमी नदी में डूब रहा हो और किनारे से कोई विद्वान चिल्लाए- ‘‘तैरने की समस्या का दीर्घकालिक समाधान खोजो! और लगे रहो!’’
राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने छात्रों को अनेक विकल्प दिए हैं। अब छात्र के पास डिग्री कम और विकल्प अधिक हैं। वह एक साल बाद निकल सकता है, दो साल बाद निकल सकता है, तीन साल बाद निकल सकता है, चार साल बाद भी निकल सकता है। बस नौकरी कहीं से नहीं निकलती। निकलती भी है तो पेपर लीक हो जाता है या कुछ पहुंचे हुए लोग परीक्षा से पहले ही पेपर खरीद लेते हैं।
नीति-निर्माताओं को यह समझना चाहिए कि छात्र मूर्ख नहीं है। वह जानता है कि डिग्री के बाद उसका सामना किस दुनिया से होने वाला है। वह देख रहा है कि विश्वविद्यालयों में शिक्षक कम हैं, हाॅस्टल कम हैं, छात्रवृत्तियां कम हैं और रोजगार तो उससे भी कम हैं। ऐसे में चैथा साल उसे किसी जादुई दरवाजे जैसा नहीं लगता।
फिर भी विश्वविद्यालय को निराश नहीं होना चाहिए। अगले साल वह पांचवां साल भी शुरू कर सकता है। उसका नाम रख सकता है- ‘‘आनर्स विद सुपर रिसर्च’’। फिर छठा साल- ‘‘आनर्स विद अल्ट्रा रिसर्च’।
और जब छात्र पूछे कि इससे होगा क्या, तो जवाब दिया जाए- ‘‘बेटा, लाभ बहुत है। बस अभी तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा।’’
यही हमारे समय की सबसे बड़ी शैक्षिक उपलब्धि है- लाभ अदृश्य है, रोजगार अदृश्य है, भविष्य अदृश्य है, पर नीति अत्यंत सफल है। छात्रों की गलती सिर्फ इतनी है कि वे इन अदृश्य चीजों पर विश्वास करने के बजाय डिग्री लेकर घर जाना चाहते हैं।