कॉप-30 : पूंजीवाद में पर्यावरण संरक्षण की बात बस एक जुमला

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पूंजीवादी शासकों से लेकर आम जन तक दुनिया में आज हर कोई पर्यावरण को हो रहे नुकसान के खतरों को जानता है। हर कोई जानता है कि पर्यावरण सुरक्षा एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है। इस सबके बावजूद दुनिया भर में देशों के बीच गहराती पूंजीवादी प्रतियोगिता और पूंजीवादी संकट के मौजूदा माहौल में पर्यावरण संरक्षण की सारी बातें महज रस्म अदायगी और जुमला भर बन कर रह गयी हैं। इससे आगे बढ़कर बहुत से प्रमुख देशों की सरकारों ने तो इस मुद्दे से अपने कदम पीछे भी खींचने शुरू कर दिये हैं।
    
10 से 21 नवम्बर के बीच ब्राजील के शहर बेलेम में कॉप-30 का सम्मेलन आयोजित हुआ। पर्यावरण के मुद्दे पर 1992 से लगभग हर वर्ष होने वाला यह सबसे बड़ा वैश्विक आयोजन है, जिसमें विभिन्न देशों के सरकारी प्रतिनिधियों के अलावा बहुत सी गैर-सरकारी संस्थाओं और वैश्विक संगठनों के प्रतिनिधि भागीदारी करते हैं। इस बार का यह सम्मेलन अच्छे-खासे विवादों का विषय रहा और स्पष्ट असफलता के साथ समाप्त हो गया। पर्यावरण के साथ इससे ज्यादा मजाक और क्या होगा कि पर्यावरण पर होने वाले सम्मेलन की तैयारी के लिए एक लाख से ज्यादा पेड़ काट दिए गये। शुरूआत में इस पर कुछ बातें हुईं किन्तु जल्दी ही यह विषय पृष्ठभूमि में चला गया। 
    
इस बार के कॉप सम्मेलन की सबसे बड़ी बात यह रही कि साम्राज्यवादी दुनिया के नेता संयुक्त राज्य अमेरिका ने खुद को कॉप के इस आयोजन और पर्यावरण के मुद्दे पर पूर्व में किए गए अपने सभी वायदों से स्वयं को अलग कर लिया। ऐसे में, यह पहले ही स्पष्ट हो गया था कि इस बार का यह सम्मेलन पहले से ही असफल होने के लिए अभिशप्त है। पूंजीवादी दुनिया के सबसे बड़े देश और वार्षिक कार्बन उत्सर्जन के लिए दूसरे नम्बर पर जिम्मेदार अमेरिका की गैर-मौजूदगी में किसी भी चर्चा का कोई महत्व नहीं बनता था। गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए बनाए गये ‘वातावरण अनुकूलन कोष’ में अमेरिका का योगदान कुल अनुदान का लगभग 10 प्रतिशत तक रहता था। अमेरिका के पीछे हटने के बाद इस बार इस कोष के लिए महज 6 करोड़ डालर से भी कम अनुदान आया, जो कि अब तक का सबसे न्यूनतम स्तर है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए 2030 तक लगभग 40 अरब डालर की आवश्यकता होगी। जबकि अब तक इस कोष में महज 83 करोड़ डालर ही इकट्ठा हो पाये हैं, जो कि आवश्यकता का लगभग 2 प्रतिशत है।
    
भारत इस सम्मेलन में उस वक्त भागीदारी कर रहा था, जब दिल्ली और आस-पास के क्षेत्र में वायू प्रदूषण का स्तर घातक स्थिति में पहुंचा हुआ है। लेकिन हर जगह फोटो खिंचवाने पहुंच जाने वाले प्रधानमंत्री मोदी पिछली दो बार से इस सम्मेलन में भागीदारी करने ही नहीं गए हैं। इस बार भारत का प्रतिनिधित्व पर्यावरण मंत्री ने किया। इससे पहले वाले सम्मेलन में तो उन्होंने अपने राज्य मंत्री को इस सम्मेलन के लिए भेजा था। स्पष्ट है कि भारत सरकार भी इस अंतर्राष्ट्रीय मंच के लिए गम्भीर नहीं है।
    
अमेरिका के इस मंच से पीछे हटने का सीधा असर दिखाई पड़ रहा है। कॉप-31 का आयोजन पहले आस्ट्रेलिया में किया जाना था, किन्तु आस्ट्रेलिया ने इस सम्मेलन का आयोजन करने से इंकार कर दिया, अब यह सम्मेलन तुर्किये द्वारा किया जायेगा। आस्ट्रेलिया का कॉप-31 के आयोजन से पीछे हटने को अमेरिका का ही प्रभाव माना जा रहा है। उपरोक्त किस्म की सारी बातों ने ही इस बार के पर्यावरण सम्मेलन को बिल्कुल ही बेमतलब बना दिया। सम्मेलन की शुरूआत में पेड़ों के काटे जाने, उसके बाद होने वाली कुछ दिन की भयंकर बारिश और सम्मेलन के अंत में सम्मेलन स्थल के पंडालों में लगी आग ने भी मानो प्रतीकात्मक तौर पर इस सम्मेलन की पूर्ण असफलता की घोषणा कर दी थी।
    
प्रतियोगिता और मुनाफा पूंजीवादी दुनिया का सार है। प्रतियोगिता में जीतने और आगे बढ़ने के लिए पहले से भी और ज्यादा मुनाफा हासिल करना पूंजीपतियों और उनकी सरकारों का लक्ष्य होता है। इसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था में शोषण की दर को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाना होता है। मानव श्रमशक्ति के शोषण के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का ज्यादा से ज्यादा दोहन मुनाफा बढ़ाने की आवश्यक शर्त है। पूंजीवादी प्रतियोगिता के इस वातावरण में पर्यावरण को नुकसान होना ही होना है। पर्यावरण का नुकसान रोकने का मतलब है, मुनाफे और पूंजीवादी प्रतियोगिता से पीछे हटना, जो कि पूंजीवाद में असंभव है।
    
पर्यावरण संरक्षण के लिए बने मंचों पर भी पूंजीवादी सरकारें दरअसल अपने मुनाफे के हितों के लिए ही खींचतान में लगी रही हैं। विकसित पूंजीवादी देश पर्यावरण नुकसान की बात कर कम विकसित पूंजीवादी देशों में उत्पादित मालों को पीछे धकलने का प्रयास करते रहे हैं। दूसरी तरफ भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका जैसे कम विकसित देश अमेरिका, यूरोप के देशों को पर्यावरण नुकसान के लिए ऐतिहासिक तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए उनसे ज्यादा अनुदान और कार्बन कटौती के कार्यक्रम चलाने की मांग करते रहे हैं। इसके पीछे भी अपने उत्पादन और बाजारों को सुरक्षित करने की ही मंशा रही है। इन्हीं सब खींचतानों का नतीजा है कि सरकारें पर्यावरण की अपनी सारी बातों से पीछे हटने का रुख प्रदर्शित कर रही हैं। जिन परिवर्तनों को सरकारें अपने प्रयासों के बतौर गिनाती भी हैं, मसलन गैर पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल में प्रगति, वह भी पूंजीवादी आवश्यकताओं का नतीजा ज्यादा है, न कि पर्यावरण संरक्षण की चिंता का नतीजा। मसलन भारत समेत दुनिया भर के देशों में इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर ऊर्जा आदि में बढ़ता निवेश देर-सबेर जीवाश्म ईंधनों के समाप्त हो जाने की चिंता की वजह से ही ज्यादा है, न कि पर्यावरण संरक्षण के लिए।
    
तात्कालिक मुनाफे को बढ़ाने की चिंता से गतिशील पूंजीवादी व्यवस्था से पर्यावरण संरक्षण जैसे दीर्घकालिक लक्ष्यों के लिए काम करने की उम्मीद करना खुद को ही भुलावे में रखने के बराबर है। जब तक यह पूंजीवादी व्यवस्था है तब तक पर्यावरण संरक्षण पर पूंजीवादी मंचों पर गप्पबाजी चलती रहेगी और साथ ही साथ पर्यावरण को हो रहा नुकसान भी इनके द्वारा जारी रहेगा।
 

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