दिल्ली के अस्पतालों में अव्यवस्था को झेलने को अभिशप्त मरीज

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पिछले दिनों मेरी महिला साथी की तबियत खराब होने के कारण उसके साथ दिल्ली के सरकारी अस्पताल डा.बी.आर.अंबेडकर अस्पताल जाना हुआ। यह अस्पताल दिल्ली के बड़े अस्पतालों में गिना जाता है। वहां जाकर समझ आया कि क्यों बेहद खराब आर्थिक स्थिति होने के बावजूद मरीज निजी अस्पतालों और प्राइवेट डॉक्टरों के पास जाना ज्यादा बेहतर समझता है। जब तक कि कोई बड़ी बीमारी न हो। बड़ी बीमारी होने पर तो निजी अस्पताल वाले घर-मकान, दुकान सब बिकवा देते हैं।       
    
खैर! हम बात कर रहे थे दिल्ली के सरकारी अस्पताल की जो वहां देखा। हम सुबह 9 बजे के आस-पास डा.बी.आर. अंबेड़कर अस्पताल पहुंचे। अस्पताल में जहां नये और पुराने मरीजों की पर्ची बनती है, वहां नये-पुराने, स्त्री-पुरुष, बुजुर्ग सब मिलाकर लगभग 450-500 मरीज पर्ची बनवाने की लाइनों में खड़े थे। इसके अलावा आंख-कान-नाक वाले डॉक्टर को दिखाने वाले अलग लाइन में, हड्डी (ऑर्थो) वाले अलग लाइन में, स्त्री रोग वाली महिलायें अलग लाइन में। बाल रोग वाले डॉक्टर को दिखाने वाले अलग लाइन में, चर्म रोग वाले अलग लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। इस तरह 9 बजे के आस-पास लगभग 800-900 से अधिक मरीज केवल पर्ची बनाने की लाइनों में घंटे-दो घंटे से खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। इससे पहले भी कुछ मरीज अपनी पर्ची बनवाकर जा चुके होंगे। 
    
इन लगभग 1000-1200 मरीजों को घंटे-दो घंटे तक खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार करना था और वहां इन मरीजों के बैठने के लिये कोई कुर्सी, बेंच कुछ नहीं थी। यह व्यवस्था उनके लिये थी जो बीमार थे और अपने इलाज के लिये अस्पताल में आये थे। इन मरीजों में गर्भवती महिलायें, प्रसूता महिलायें, बच्चे और बुजुर्ग सभी शामिल थे। 
    
हमें महिला विभाग में डॉक्टर को दिखाना था। हम अस्पताल की पहली मंजिल पर गये जहां महिलाओं के लिये अलग से विभाग है। जब वहां लाइन में लगे तब लगभग 70-75 महिलायें हमसे आगे लाइन में लगी थीं। अपनी बारी का इंतजार करते हुए हमें लगभग डेढ़ घंटा हो गया और लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी। इस एक-डेढ़ घंटे में लाइन बहुत मामूली सी ही आगे बढ़ी थी, जो कि लगभग 4 से 5 मरीजों के पर्चे बनने पर बढ़ती है। जब इस संबंध में अन्य महिलाओं से बात की तो उनका कहना था कि यहां ऐसा ही होता है। तब जहां पर्ची बनाने वाला बैठा होता है वहां देखा तो पता चला कि वहां, महिला विभाग में डॉक्टर की पर्ची बनाने के लिये केवल एक कम्प्यूटर और एक ही ऑपरेटर नियुक्त है। लाइन में लड़ाई-झगड़े भी हो रहे थे जब कोई बिना लाइन के पर्ची बनवाने आ जाता था। लेकिन लाइनों को सही कराने वाले गार्ड वहां उपस्थित होने के बाद भी उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर रहे थे। एक-दो गार्ड आकर देख भी गये लेकिन देख कर भी अनदेखा करके वे चले गये। पर्ची बनाने का समय खत्म होने वाला था तब हमें लगा कि अब तो शायद ही हमारा नम्बर आयेगा। उस समय एक सिक्योरिटी गार्ड आया और लाइन को सही कराने में अपनी भूमिका निभाई। और हमें उम्मीद लगी कि अब हमारी पर्ची बन जायेगी। 
    
खैर! लगभग 12 बजे हमारी पर्ची बन गयी। डॉक्टर के यहां पर कोई भीड़ नहीं थी। पर्ची बनते ही लगभग 10 मिनट में हमारा नम्बर आ गया। डॉक्टर ने रिपोर्ट देखकर बताया कि मेडिसिन विभाग में दिखा लें। तब हम मेडिसिन विभाग में पहुंचे तो पता चला कि अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने का समय खत्म हो गया है तब भी हमने मेडिसिन विभाग में ही दूसरे कमरे में डॉक्टर को दिखाया जहां डॉक्टर ने बताया कि सभी रिपोर्ट्स ठीक हैं। अभी किसी तरह की दवा शुरू करने की कोई जरूरत नहीं है।  
    
इसके अलावा यह भी कि महिला विभाग में दिखाने वाली महिलाओं में कोई अपने नवजात बच्चे को लेकर आयी थी, कोई गर्भवती थी, तो कुछ की डिलीवरी डेट बहुत नजदीक थी। इसके अलावा भी बहुत सी महिलायें अलग-अलग प्रकार के स्त्री रोग से पीड़ित थीं और न टाली जा सकने वाली स्थिति में ही अस्पताल में दिखाने के लिये आयी हुईं थीं। लेकिन इन महिलाओं के बैठने का कोई इंतजाम उस जगह पर नहीं था। अन्दर की तरफ जहां डॉक्टरों के कमरे थे वहां बेंच खाली थीं और कोई इक्का-दुक्का मरीज ही डॉक्टर को दिखाने के लिये बैठे थे। वहां बिल्कुल खाली था। और डॉक्टर खुद बाहर देख रहे थे कि बाहर कोई मरीज बैठा है तो उसको देख लें। लेकिन पर्ची नहीं बनने के कारण वहां मरीज न के बराबर थे। जब तक हाथ में पर्ची नहीं थी तो वहां खड़े गार्ड महिलाओं को वहां जाने नहीं दे रहे थे। ऐसी स्थिति में और बहुत गर्मी और उमस के कारण कई महिलाओं की हालत बहुत खराब हो गयी तथा वे वहां लाइनों से निकल कर चली गईं। शायद किसी निजी अस्पताल में दिखाने के लिये या वापस घर की ओर। 
    
हमें समझ आया कि केवल एक या दो और कम्प्यूटर और कम्प्यूटर ऑपरेटर रखकर तथा पर्ची बनाने वाली जगह पर दो-तीन बेंच रखकर बहुत मामूली से खर्च में ही बहुत सी परेशानियों से इन महिलाओं और अन्य मरीजों को बचाया जा सकता था। लेकिन वर्तमान सत्ता और उसके शीर्ष पर बैठे लोग जो लगातार शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक मदों में खर्च होने वाले बजट में लगातार कटौती करते जा रहे हैं। जो मजदूर मेहनतकश आबादी के जिंदा रहने को ही विकास बताने पर उतारू हैं। उनसे जरा भी उम्मीद करना अपने आप को धोखा देने जैसा है।     -हेमा, दिल्ली  

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