घृणा यूं कोई बहुत अच्छी चीज नहीं है
बहुत खून पी जाती है और खा जाती है
फेफड़ों की बहुत सारी शक्ति
बहुत सारे सपने, भोलापन और नींद कई रातों की
महापुरुषों और ग्रंथों ने अक्सर उसका विरोध किया है
दिलो-दिमाग में अक्सर घर करती रही हैं उनकी बातें
हालंकि समाज में अक्सर बहुत स्थाई नहीं रहा है
उनके ऐसे उपदेशों का असर
और यह एक अच्छी बात है
मोहल्ले के गुंडों के बारे में पहले लोग बात करने से बचते हैं
फिर धीरे-धीरे होते जाते हैं उदासीन और एक दिन
बन जाता है यह हमारा राष्ट्रीय चरित्र
विरोध करने वालों में से हत्यारे किसी एक को चुनते हैं
और मार डालते हैं उसे सरेआम,
सोचते हैं हत्यारे, इस तरह घृणा को बदला जा सकता है
भय में, हमेशा के लिए
पेशेवर अपराधी और शोषक अक्सर महापुरुषों की सूक्तियों का
प्रचार करते हैं बहुत जोर शोर से
इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है यह कि कई बार
जो सहते हैं सबसे ज्यादा अत्याचार और
बसते हैं जीवन की तलछट में
वे ही सबसे ऊंची आवाज में करने लगते हैं
अत्याचारी का गुणगान
घृणा यूं कोई बहुत अच्छी चीज नहीं है
लेकिन इतनी बुरी भी नहीं कि जहां जरूरी हो
वहां भी न की जा सके
क्या ज्यादा बुरा नहीं है उदासीन हो जाना?