हालिया मजदूर उभार

Published
Fri, 05/01/2026 - 15:50
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मौजूदा मजदूर आंदोलन के उभार को पूरे देश ने देखा। कैसे मजदूर अपनी बदहाल होती स्थिति को लेकर सड़कों पर उतर आए और एक के बाद एक कई फैक्टरियों में मजदूरों ने काम बंद कर हड़ताल कर दी। इन हड़तालों में खास बात यह रही कि यह सभी हड़तालें ठेका मजदूरों ने कीं। हालांकि बाद के समय में कुछ जगहों पर इन संघर्षों से ऊर्जा लेकर घरेलू कामगार और गिग वर्कर्स ने भी हड़ताल की तो कुछ जगहों पर पीस रेट पर काम करने वाले मजदूर तक में इन हड़तालों ने विस्तार पाया। 
    
2 अप्रैल को मानेसर (गुड़गांव) के होंडा कंपनी के मजदूरों के द्वारा की गई हड़ताल से शुरू हुए मजदूर आंदोलन की यह चिंगारी देखते ही देखते दावानल बनते हुए हरियाणा के गुड़गांव, मानेसर से होते हुए फरीदाबाद, उत्तर प्रदेश के नोएडा, राजस्थान के भिवाड़ी, नीमराना और उत्तराखंड के रुद्रपुर, हल्द्वानी, पंतनगर तक पहुंच गई जो कि अभी तक जारी है। 
    
बाहर से अलग-अलग जगह पर अलग-अलग दिखने वाला यह मजदूर उभार कुछ मामलों में एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था जिसने पहले फरवरी माह में हुए देश के अलग-अलग हिस्सों बिहार के बरौनी, हरियाणा के पानीपत, गुजरात के सूरत में ठेका मजदूरों की बड़ी हड़तालों में स्वर पाया। 
    
2 फरवरी को बिहार बेगूसराय के बरौनी के इंडियन आयल कारपोरेशन रिफाइनरी में बड़ी संख्या में मजदूरों ने 8 घंटे काम और समय से वेतन भुगतान, डबल ओवर टाइम, वेतन में बढ़ोत्तरी, छुट्टी आदि को लेकर हड़ताल कर दी। 23 फरवरी को हरियाणा के पानीपत रिफाइनरी इंडियन आॅयल काॅरपोरेशन में भी ठेका मजदूरों ने उपरोक्त मांगों को लेकर हड़ताल कर दी। इसके बाद गुजरात के सूरत में और आर्सेलर मित्तल, निप्पोन स्टील प्लांट में भी मजदूर हड़ताल पर चले गए। इन सबमें पानीपत रिफाइनरी में हुई हड़ताल के व्यापक प्रचार ने मजदूरों में ऊर्जा भरने का काम किया। पानीपत रिफाइनरी में हुई हड़ताल एक तरह से अप्रैल में हुए मजदूर संघर्षों की पूर्व पीठिका रही। 
    
अप्रैल माह में 2 अप्रैल को होंडा के ठेका मजदूर वेतन बढ़ोत्तरी, काम के घंटे 8 करने, ओवर टाइम का डबल भुगतान किए जाने को लेकर कंपनी गेट पर बैठ गये। इसके अलावा ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद रसोई गैस के दामों में बढ़ोत्तरी हुई थी जिसके कारण मजदूरों की एक मांग यह भी थी कि उनको कैंटीन में फ्री खाना दिया जाए या कंपनी मालिक उनके लिए खाने की व्यवस्था करें। हड़ताल के दूसरे दिन ही मजदूरों की मांगें मान ली गईं। वेतन में बढ़ोत्तरी, गैस की व्यवस्था होने तक फ्री कैंटीन, नाइट शिफ्ट करने पर 100 रु. का भत्ता, ओवरटाइम का डबल भुगतान आदि पर सहमति बनी, जिसके साथ ही होंडा के मजदूरों की हड़ताल खत्म हो गई।             

होंडा के मजदूरों की जीत ने मजदूरों में एक नई ऊर्जा का संचार किया। 4 अप्रैल को मुंजाल शोवा के मजदूरों ने भी हड़ताल कर दी। जिसके बाद सत्यम आटो, रूप पाॅलीमर, रिचा ग्लोबल, माडेलम, सरिता हांडा आदि आदि कंपनियों में भी मजदूर वेतन बढ़ोत्तरी की मांग को लेकर संघर्ष में उतर गए। 9 अप्रैल तक गुड़गांव, मानेसर में हड़तालों का सिलसिला जारी रहा। 8 अप्रैल तक इन तीन-चार दिनों में मानेसर तहसील एक तरह से अलग-अलग फैक्टरी मजदूरों का धरना स्थल बन गया।
    
आंदोलन से घबरायी हरियाणा सरकार को आनन-फानन में 8 अप्रैल को न्यूनतम वेतन बढ़ाने की घोषणा करनी पड़ी। इसके बाद ही 8 अप्रैल की शाम प्रशासन द्वारा मजदूरों को मानेसर तहसील से यह बात कहकर हटाया गया कि हरियाणा का वेतन सरकार ने बढ़ा दिया है। 9 अप्रैल को जब रिचा ग्लोबल, माडलेमा कंपनी के मजदूर कंपनी पहुंचकर कंपनी प्रबंधन से बढ़े हुए वेतन का नोटिफिकेशन गेट पर लगाने की मांग करने लगे तो कंपनी मालिक ने यह कहकर इनकार कर दिया कि अभी तो सरकार ने ही नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है तो वह पहले ही कैसे नोटिफिकेशन चस्पा कर दें। जब मजदूर गेट पर डटे रहे तो कंपनी मालिकों के गुंड़ों व प्रशासन ने मिलकर मजदूरों पर हमला बोल दिया। मजदूर जिसमें कि महिला मजदूर भी बड़ी संख्या में शामिल थीं, पर मानेसर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया। आगजनी कर मजदूरों पर ही इसका दोष मढ़ दिया। कई मजदूरों को गिरफ्तार कर लिया गया जिनमें 20 महिला मजदूर भी शामिल थीं। इन मजदूर संघर्षों के दौरान भी मानेसर पुलिस द्वारा मजदूर नेताओं को डिटेन किया जाता रहा। यह सब मजदूर संघर्षों को कुचलने के लिए मानेसर प्रशासन व सरकार द्वारा किया जा रहा था।
    
हालांकि इन सब के बाद भी मजदूरों का संघर्ष नहीं रुका। मजदूर आंदोलन की धमक तब तक आगे पहुंच चुकी थी। फरीदाबाद में 9 अप्रैल को भारत गेयर कंपनी में ठेका मजदूरों ने काम बंद कर दिया। इन सब संघर्षों का यह नतीजा निकलता है कि, हरियाणा सरकार को 9 अप्रैल की शाम को बड़े हुए न्यूनतम वेतन का नोटिफिकेशन जारी करना पड़ता है।
    
वेतन बढ़ाने का नोटिफिकेशन जारी करने के बाद जहां सरकार को यह लग रहा होता है कि अब आंदोलन शांत हो जाएगा लेकिन अब आंदोलन दूसरी गति में ही आगे बढ़ने लगा। अलग-अलग फैक्टरी के मजदूर जब कंपनी प्रबंधन से बढे़ हुए वेतन का नोटिफिकेशन चस्पा करने की मांग करने लगे तो कंपनी मालिकों द्वारा इनकार किए जाने पर अलग-अलग फैक्टी में मजदूरों के संघर्ष फूट पड़े। फरीदाबाद के भारत गेयर से लेकर पृथला के सांई आटो, मदरसन, शिवालिक, पूनम इंडस्ट्रीज, एमडी आदि कंपनियों में मजदूर हड़तालों पर चले गए और कंपनी से बढ़े हुए वेतन का नोटिफिकेशन जारी करने की मांग करने लगे।
    
मजदूर आंदोलनों की यह चिंगारी देखते ही देखते पूरे दिल्ली-एनसीआर तक फैल गई। यूपी की औद्योगिक बेल्ट नोएडा में भी बड़ी संख्या में पहले मदरसन कंपनी के मजदूर, बाद में पूरे नोएडा शहर के मजदूर आंदोलन में कूद पड़े। ढेरों फैक्टरियों के मजदूर इस आंदोलन में शामिल होकर वेतन बढ़ोत्तरी की मांग करने लगे। नोएडा में प्रशासन और फैक्टरी मालिकों की मिलीभगत से आगजनी कर हिंसा को अंजाम दिया जाता है। मजदूर जिनमें महिला मजदूर भी बड़ी संख्या में शामिल थीं, पर बर्बर लाठीचार्ज किया जाता है, सैकड़ों मजदूरों को जेलों में ठूंस दिया जाता है। 
    
इतने सब पर भी जब सरकार को मजदूर आंदोलन का यह सिलसिला खत्म होते नहीं दिख रहा था, तो सरकार मजदूरों के हौंसले पस्त करने के लिए अपने राज्य की दमन मशीनरी को तेज करती है। गुड़गांव, मानेसर में इन आंदोलनों के दौरान प्रशासन मजदूर आंदोलन में शामिल इंकलाबी मजदूर केंद्र के कार्यकर्ताओं को दो बार डिटेन कर चुकी होती है। पहले 7 अप्रैल को राजू, आकाश, हरीश, विकास को धरना स्थल से तो श्यामवीर, अजीत को उनके कमरे से उठा ले जाती है। फिर 9 अप्रैल को श्यामवीर, हरीश को कमरे से तो अजीत जो ट्रेड यूनियन काउंसिल की बैठक में शामिल होने गए थे, उनको बैठक से कुछ दूर चालाकी से बुलाकर  अपहरणकर्ताओं के जैसे उठा ले जाती है। दोनों ही बार देर रात को मजदूर कार्यकर्ताओं को छोड़ा जाता है।
    
9 अप्रैल को गुड़गांव, मानेसर में पुलिस द्वारा प्रायोजित हिंसा का दोषी मजदूर और मजदूर कार्यकर्ताओं को बना दिया जाता है जो शांतिपूर्ण धरना दे रहे थे। अपने हक की आवाज बुलंद कर रहे थे। माडेलम और रिचा ग्लोबल के एच आर की ओर से पुलिस ने 9 अप्रैल को एफआईआर दर्ज की जिसमें मजदूरों व मजदूर कार्यकर्ताओं पर संगीन धाराएं लगा दी गईं। 12 अप्रैल की देर रात लगभग 11ः00 से 12ः00 के बीच पुलिस इंकलाबी मजदूर केंद्र के छह कार्यकर्ताओं अजीत, श्यामबीर, हरीश, राजू, पिंटू, आकाश और सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन लाल को उठा ले जाती है। निरंजन जी को जहां अगले दिन छोड़ दिया जाता है वहीं इन कार्यकर्ताओं को 9 अप्रैल की घटना का दोषी बता मजदूरों को भड़काने, दंगा करने, हत्या का प्रयास करने, कंपनियों को पेट्रोल बम से उड़ाने की कोशिश का साजिशकर्ता बता गिरफ्तार कर 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता है जो अभी तक जारी है।
    
नोएडा में भी ठीक इसी तरह मजदूर आंदोलन का दमन करने के लिए अपने भाड़े के गुंडे और बाउंसरों को लगाकर यूपी पुलिस और कंपनी मालिकों द्वारा अराजकता फैलाई जाती है। और उसका दोष मजदूरों पर मढ़ बर्बर लाठीचार्ज किया जाता है। महिला मजदूरों के साथ भी अमानवीय व्यवहार किया जाता है। पुरुष पुलिस द्वारा महिला मजदूरों के साथ अभद्रता की जाती है।
    
उत्तर प्रदेश पुलिस और सरकार द्वारा अपनी नाकामियों और अपने दमन को छुपाने के लिए झूठी और मसालेदार खबर बना मजदूर कार्यकर्ताओं पर मुकदमे दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया जाता है व मजदूरों को भड़काने का दोष मढ़ दिया जाता है। इस दमन के बाद भी मजदूरों का यह संघर्ष रोज किसी न किसी नये फैक्टरी संस्थान व नए इलाके में फूट रहा है जिसे हम राजस्थान और उत्तराखंड में देख सकते हैं। उत्तराखंड के रुद्रपुर-पंतनगर सिडकुल में यह संघर्ष शानदार तरीके से जारी है।
    
3-4 दशकों के बाद मजदूर संघर्षों का यह उभार कोई अचानक हुई घटना नहीं बल्कि लगातार उनकी बदहाल होती परिस्थितियों का नतीजा है जो मजदूरों के आक्रोश के रूप में अभिव्यक्त हुआ। बेतहाशा शोषण-उत्पीड़न झेलते मजदूरों का यह उभार पूंजीवाद की गतिकी को दिखाता है। उसकी मरणासन्न व्यवस्था को अभिव्यक्त करता है। पिछले सालों से लगातार बढ़ती महंगाई ने मजदूरों की कमर तोड़कर रख दी थी। जिसमें अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर युद्ध थोपने और फलस्वरूप रसोई गैस के दामों में अप्रत्याशित उछाल ने मजदूरों के सामने भुखमरी जैसे हालात पैदा कर दिये हैं। 1 किलो एलपीजी 500 रुपये व 4500 रुपये के सिलेंडर के दामों ने मजदूरों को गुस्से से भर दिया। कोरोना लाॅकडाउन जैसी यादों के ताजा होने से मजदूर सिहर उठे। बड़े-बड़े शहरों से पलायन की तस्वीरों ने, गैस लेने की लंबी लाइनों ने, इस डर को सच में बदल दिया। लेकिन इस बार मजदूर खामोश नहीं रहे बल्कि अपनी वेतन वृद्धि को लेकर संघर्ष के मैदान में उतर गए और मालिकों, प्रशासन, सरकार को नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया। 
    
हालिया मजदूर उभार अंतर्वस्तु में एक होते हुए भी रूप में अलग-अलग जगह पर अलग-अलग शक्ल अख्तियार कर रहा है। गुड़गांव, मानेसर में जहां एक जगह इकट्ठे विभिन्न फैक्टरी के मजदूर आपस में कोई साझा संघर्ष या मंच नहीं बना पाए वहीं नोएडा में इसने एक खास शक्ल अख्तियार की। खासकर अलग-अलग फैक्टरी मजदूरों का एक साथ आना, पूरे नोएडा शहर को जाम कर देना अभूतपूर्व था। तो फरीदाबाद में अलग-अलग फैक्टरी में अलग-अलग संघर्ष। हालांकि इन सभी संघर्षों को आंतरिक बल एक-दूसरे से ही मिल रहा था जिसे वर्तमान में महसूस किया जा सकता है। जो मजदूर संघर्ष में शामिल रहे या आगे बढ़कर लड़ रहे हैं वह तो ऊर्जा से भरे हुए हैं लेकिन देखने वालों को भी ऊर्जा देने का काम कर रहे हैं। मजदूरों के इस संघर्ष में पिछले चार दशक से मजदूर वर्ग में जो पस्तहिम्मती, निराश छाई हुई थी और शासक वर्ग द्वारा लगातार पीछे धकेले जाने के क्रम को बहुत शानदार तरीके से तोड़ा है।
    
इन संघर्षों की खास बात जो इन्हें और महत्वपूर्ण बना देती है वह यह कि यह संघर्ष ठेका मजदूरों का संघर्ष बना जिनका शोषण सबसे ज्यादा है। इसके अलावा युवा मजदूरों का बड़ी संख्या में शामिल होना इस आंदोलन की मुख्य ताकत होना, इस आंदोलन को नेतृत्व देना इसको और खास बना देता है। नई पीढ़ी का मजदूर पुरानी पीढ़ी की सभी जड़ता को तोड़ते हुए आगे बढ़ा है। और अपनी बातों को आम जनता तक पहुंचाने में सफल भी हुआ है जिसके लिए सोशल मीडिया का भी नई पीढ़ी के मजदूरों ने भरपूर इस्तेमाल किया है, जो कि एक सकारात्मक चीज बनती है।
    
ऐसे ही इन संघर्षों में महिला मजदूरों की भी शानदार भूमिका रही है। वह न सिर्फ आंदोलन में मौजूद है बल्कि आगे बढ़कर संघर्ष कर रही हैं। दमन का भी डटकर सामना कर रही है। सबसे कम वेतन, असुरक्षित कार्य परिस्थितियों में काम, अंतहीन कार्य दिवस और गैर बराबरी झेलती महिला मजदूर इस आंदोलन को एक खास महत्व प्रदान कर रही हैं। वह अपने साथ होने वाले दुव्र्यवहार, गैर बराबरी व शोषण को खुलकर सामने ला रही हैं। अपने हक-अधिकारों की आवाज को ऊंचा उठा रही हैं और आंदोलन की बड़ी ताकत बनी हुई हैं। 
    
मजदूर संघर्ष की खास बात यह भी रही है कि हरियाणा में जब सरकार ने न्यूनतम वेतन की बढ़ोत्तरी की तो कई फैक्टरियों में आंदोलन इस बात को लेकर उठ खड़ा हुआ कि बढ़े हुये वेतन को कंपनी मालिक लागू करें लेकिन जब आंदोलन आगे बढ़ा तो मजदूरों ने सरकार द्वारा बढ़ाये इस भुखमरी वेतन को भी ठुकराया और एक नई मांग पेश की कि 15,200 रुपये कम हैं और आज के महंगाई के दौर में 20 से 25,000 रुपये वेतन होना चाहिए और सरकार के द्वारा बढ़ाये वेतन को मजदूरों ने एक तरह से नामंजूर किया। इन सब घटनाओं के बाद हरियाणा के कई इलाकों में प्रशासन-सरकार सकते में आई है, और कुछ जगहों पर विशेषकर फरीदाबाद में तो प्रशासन द्वारा अलग-अलग कंपनियों में जाकर बढ़े हुए वेतन का नोटिस चस्पा करने की कार्यवाही कंपनी मालिकों से कराई जा रही है। वह भी इस बात को लेकर कि अगर यह 15,000 रुपये नहीं दिया तो मजदूर अगर सड़क पर आ गए तो वह इससे ज्यादा की मांग करेंगे। यह कहीं न कहीं मजदूरों के संघर्ष की धमक को ही दिखाता है। 

पिछले लंबे समय से शासक वर्ग ने मजदूरों को लगातार पीछे धकेला और धीरे-धीरे सरकार इतनी आश्वस्त हो चुकी थी कि उन्होंने मजदूरों को नख-दंत विहीन कर दिया है। इसकी एक अभिव्यक्ति चारों लेबर कोड को पास करना दिखाता है तो दूसरा हरियाणा में 11 सालों से वेतन रिवाइज न करना।
    
इस रूप में इस मौजूदा उभार ने शासक वर्ग के भी कान खड़े कर दिये हैं, उसको एक चेतावनी देने का काम किया है। यह यूं ही नहीं कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जो अपने जन विरोधी फैसले और गुंडई के लिए जानी जाती है, को भी तीन-चार दिन में फैसला लेना पड़ा और मजदूरों के वेतन बढ़ोत्तरी की घोषणा कर नोटिफिकेशन जारी करना पड़ा। यह सब मजदूर आंदोलन की एक जीत ही है।
    
ऐसे में इस हालिया मजदूर उभार के प्रभाव को कम करके आंकना एक भारी गलती होगी। यह मजदूर उभार न तो कोई मौसमी बारिश का बुलबुला है जो उठा और फूट गया, न ही कोई प्रायोजित साजिश जैसा आज सरकार व मीडिया इसे साबित करना चाहते हैं। जिसके लिए वह कभी मजदूर कार्यकर्ताओं व संगठनों, कभी व्हाट्सएप्प ग्रुप, कभी अर्बन नक्सल तो कभी पाकिस्तान का हाथ होने की बात कहकर उस सच्चाई से मुंह मोड़ लेना चाहते हैं जो मजदूरों ने वास्तव में सड़कों पर आकर बताई। आज मजदूरों ने जीवन के प्रश्न को आगे लाकर रख दिया है जिसे पीछे धकेलना अब सरकार, पूंजीपति और मीडिया के लिए भी संभव नहीं है। 
    
पिछले लंबे समय से मजदूरों को जिन अमानवीय परिस्थितियों में धकेलने का काम सरकारों ने किया है, 12 से 16 घंटे काम, भुखमरी वेतन, रोजगार की गारंटी नहीं, असुरक्षा, अंतहीन शोषण, बढ़ती महंगाई, घटती क्रय शक्ति उस पर कभी नोटबंदी, कभी लाॅकडाउन तो कभी युद्ध, इन सब ने मजदूरों को उस अंतिम बिंदु तक पहुंचाया जहां अब पीछे हटने की कोई जमीन नहीं बची थी। ऐसे में मजदूर लड़े और अपने लिए फिर से न सिर्फ नयी जमीन बनाई बल्कि पूरे मजदूर वर्ग को एक नई जमीन तैयार करके दी। इस संघर्ष ने अचेत रूप में ही सही मजदूरों को उनकी संगठित ताकत से परिचित करा दिया है जो कि इस आंदोलन की एक बड़ी उपलब्धि है। 
    
इस स्वतः स्फूर्त मजदूर उभार ने देश में मौजूद केंद्रीय ट्रेड यूनियंस की भी कलई खोल कर रख दी है। जहां प्रतिक्रियावादी बीएमएस बड़ी बेशर्मी से हरियाणा के मुख्यमंत्री को धन्यवाद देने के लिए सम्मानित करने का कार्यक्रम आयोजित तक कर डालती है व दमन पर चूं भी नहीं करती (हालांकि उससे उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि यह सरकार के खिलाफ जुबान खोले) बाकी ट्रेड यूनियंस भी पूरे संघर्ष के दौरान किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में रहती हैं या मजदूर आंदोलन में दर्शक दीर्घा में ही रहीं। कुछ हद तक सीटू इन आंदोलनों में शामिल हो अपनी पुरानी जगह तलाशती हुई नजर आई।  
    
इस दौरान विपक्ष की तमाम राजनीतिक पार्टियों ने भी इस मजदूर आंदोलन पर चुप्पी साधे रखी। कुछ विशेष घटनाओं पर विपक्ष के कुछ नेताओं ने इक्का-दुक्का बयानबाजियां कीं। मेहनत की लूट में पूंजीपति वर्ग की एकता को इन सबसे समझा जा सकता है। पूंजीवादी उदारवादी मीडिया ने भी इन घटनाओं से एक निश्चित दूरी बनाई हुई है। 
    
ऐसे में इस मजदूर उभार ने मजदूरों को उनकी संगठित एकता से रूबरू कराया है। अब जरूरत बन जाती है कि मजदूर आर्थिक संघर्ष से बढ़कर राजनीतिक संघर्ष तक इस संघर्ष को विस्तारित करें। इसके अलावा आज के दौर में जो एक जरूरत बन जाती है कि मजदूर फैक्टरी के अंदर अपनी यूनियन बनाएं, यूनियनों के नीचे संगठित हों। अपनी वर्गीय एकता को पहचानें। इसके अलावा इस पूरे मौजूदा मजदूर उभार में जिस तरह से फासीवादी सरकार ने मजदूर संघर्ष का दमन किया है, मजदूर आंदोलन को कुचलने की कोशिश की है, मजदूर व मजदूर कार्यकर्ताओं को जिस तरह से जेलों में डाला है, उनका अपराधीकरण किया है, उसके खिलाफ हर न्यायपसंद जनता को आवाज उठाने की जरूरत बनती है। दमन के खिलाफ उठ खड़े होने की जरूरत बनती है।

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