इजरायल द्वारा गाजा में किये जा रहे नरसंहार का विरोध

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बलिया-देवरिया/ इजरायल द्वारा गाजा में फिलिस्तीनी जनता का कत्लेआम लम्बे वक्त से जारी है। इस कत्लेआम के खिलाफ जहां दुनिया भर की जनता का आक्रोश बढ़ रहा है वहीं दुनिया भर के शासक बयानबाजी से आगे बढ़कर इस कत्लेआम को रोकने के लिए कुछ करने को तैयार नहीं हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादियों की शह पर इजरायली शासक बेखौफ हो बहादुर फिलिस्तीनी जनता का कत्लेआम जारी रखे है। उनका इरादा समूचे फिलिस्तीन को ही हड़प जाने का है। 
    
बलिया में क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के बैनर तले इजरायली नरसंहार के विरोध में प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शन में भारत सरकार से इजरायल से नाता तोड़ने व इजरायली शासकों पर कत्लेआम बंद करने की मांग की गयी। 
    
इसी तरह देवरिया में भी क्रालोस के बैनर तले इजरायली नरसंहार के विरोध में प्रदर्शन किया गया।         -बलिया संवाददाता

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।