जापान के हड़तालों के बारे में गढ़े गये मिथक

Published
Sun, 03/01/2026 - 07:04
/japan-ke-strike-ke-baare-mein-gadhe-gaye-mithak

पूरी दुनिया में जापान के मजदूरों के अत्यन्त परिश्रमी होने की बातें कही सुनी जाती है। भारत में तो इससे आगे यह भी कहानी सुनने को मिल जाती है कि जापान के मजदूर अपनी मांगें मनवाने के लिए काम बंद नहीं करते बल्कि और तेजी से काम करने लगते हैं। और इससे जो अतिरिक्त उत्पादन होता है वह नियोक्ता पर दबाव बनाता है कि वह असंतुष्ट मजदूरों की बात माने। कोई कोई यह भी कहता है कि जापान के जूता मजदूर अपनी मांगें मनवाने के लिए एक ही पैर का जूता बनाने लगते हैं। 
    
इन किस्सों-कहानियों का प्रचार मजदूरों के संघर्ष को कुंद करने के लिए किया जाता है। यह कुछ इसी तरह की बात है कि थप्पड़ पड़ने पर दूसरा गाल आगे बढ़ा देना चाहिए। इन किस्सों कहानियों से अलग जापान के मजदूरों के संघर्षों का अपना इतिहास है। पूरी दुनिया की तरह जापान में भी ट्रेड यूनियन आंदोलन में उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। 1945-47 का समय जापान में जुझारू ट्रेड यूनियन संघर्ष का रहा है। 
    
1960-90 का दौर जापान की ऊंची विकास दर का काल रहा है। इस तेज विकास के काल में जापान के एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग ने जापान के ट्रेड यूनियन आंदोलन को काबू में रखने के लिए काफी प्रयास किये। इसके लिए जापान के परंपरागत आज्ञाकारिता के मूल्यों को शासक वर्ग ने अपने हित में इस्तेमाल किया। मजदूरों एवं कर्मचारियों की सेवा शर्तें इस प्रकार रखी गयीं कि वे एक संस्थान में अधिकाधिक लंबी अवधि तक काम कर सकें। कोई कामगार किसी संस्थान में जितनी लंबी अवधि तक काम करता था उसका वेतन उतना ही बढ़ता जाता था। एक तरह से नया कामगार कम वेतन को इसलिए स्वीकार कर लेता था ताकि इसकी भरपाई वह पुराना होने पर कर सके। 2010 के एक आंकड़े के अनुसार किसी संस्थान में 20-29 वर्ष तक काम कर चुके मजदूर को किसी नए मजदूर से 72 प्रतिशत अधिक वेतन मिलता था। यह आंकड़ा जर्मनी के लिए 41 प्रतिशत और फ्रांस तथा यू.के. के लिए 29 प्रतिशत है। संस्थान लगातार अपने कामगार की क्षमता बढ़ाने के लिए भी अलग-अलग कदम उठाता रहता था। इसके लिए कामगार को लगातार नए-नए कामों का अनुभव और नए स्थानों का अनुभव भी हासिल करना होता था। इस पूरे दौर में जापान का ट्रेड यूनियन आंदोलन संस्थान तक सीमित रहने वाली ट्रेड यूनियनों का हो गया था। 
    
इस दौर में अमेरिकी जीवन स्तर को हासिल करना ‘जापानी स्वप्न’ माना जाता था। जापानी मजदूरों के लिए घर संभालने वाली पत्नी, दो-तीन बच्चे, कार और अन्य उपभोक्ता वस्तुएं हासिल करने के ध्येय को स्थापित किया जाता था। महिलाओं की श्रम शक्ति में हिस्सेदारी अन्य विकसित देशों की तुलना में कम थी। 
    
1990 के बाद से जापान में आर्थिक विकास दर गिरने लगी। इसका सीधा असर मजदूरों की कार्य परिस्थिति और जीवन परिस्थिति पर पड़ा। नए रोजगार के अवसर घटने लगे। अनियमित मजदूरों की संख्या बढ़ने लगी। न तो इनको लंबी अवधि का रोजगार मिलता था और न ही समय के साथ इनके वेतन में इजाफा होता था। अब महिलाएं भी अपेक्षाकृत अधिक संख्या में रोजगार में हिस्सेदारी करने लगीं। यद्यपि अभी भी वे अंशकालिक और अनियमित रोजगार में ही जा रही है ताकि बच्चों की और घर संभालने की जिम्मेदारी उठा सके। 60 साल की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के बाद कामगार उसी संस्थान में हर साल नवीनीकृत होने वाले अनुबंध पर सेवानिवृत्ति के पहले के वेतन के आधे पर काम करते हैं। 
    
1980-90 के बाद से ही जापान में वह दौर शुरू हुआ जब कामगारों में अत्यधिक काम करने से होने वाली बीमारी कारोशी (ांतवेप) से होने वाली मौतें चर्चा का विषय बनीं। जापान में पहले भी काम के घंटे ज्यादा थे। वहां माना जाता था कि जब तक बॉस कंपनी में है तब तक कोई कामगार घर नहीं जा सकता। लेकिन अब काम के घंटों के साथ कम विकास दर की वजह से काम को लेकर होने वाला तनाव भी बढ़ गया। इससे कम उम्र के लोगों की भी हार्ट अटैक, स्ट्रोक जैसी बीमारी से मौतें होने लगीं। कई आत्महत्यायें ऐसी होने लगीं जिसमें मरने वाला काफी दिनों से काम के बोझ की वजह से सो नहीं पा रहा था। यह बीमारी इतना खतरनाक रूप ले रही थी कि सरकार को भी रोकथाम के लिए कदम उठाने पड़े। ओवरटाइम की भी अधिकतम सीमा माह में 60 घंटे कर दी गयी। अभी भी यह ज्यादा है। काम के घंटे ज्यादा होने को यह मानकर अनापत्तिजनक करार दिया जाता रहा कि घर संभालने के लिए कोई महिला मौजूद है। यद्यपि जापान में पति-पत्नी दोनों की कमाई से चलने वाले घरों का प्रतिशत 1980 के 35 प्रतिशत से बढ़कर 2008 में 55 प्रतिशत हो गया। जापान की जनसंख्या अन्य विकसित देशों की तुलना में ज्यादा तेजी से कम हो रही है। इसकी एक वजह यह भी है कि जापान में महिलाओं को नौकरी और मातृत्व में से किसी एक को चुनना पड़ता है। यहां मातृत्व के साथ-साथ नौकरी जारी रखने के लिए सेवा शर्तें अनुकूलित नहीं हैं। 
    
1990 के बाद होने वाले बदलावों का सीधा असर ट्रेड यूनियन सदस्यता पर पड़ा है। अनियमित मजदूर ट्रेड यूनियन के सदस्य नहीं हैं। इसलिए कामगार आबादी के यूनियनीकृत हिस्से का अनुपात गिर गया है। जहां 1950 में 45 प्रतिशत कामगार यूनियनीकृत थे वहीं 2009 में सिर्फ 18 प्रतिशत कामगार यूनियनीकृत हैं। 
    
जापान के पूंजीपति वर्ग का मुनाफा 1990 से पहले भी मजदूरों के शोषण से आता था और 1990 के बाद तो यह खैर किसी से छुपा ही नहीं है। लेकिन, 1990 के पहले के दौर में मजदूरों का किसी हद तक सुरक्षित रोजगार उनके बारे में खुशनुमा कहानियां सुनाने की संभावना छोड़ देता था। लेकिन, अब जापानी मजदूरों के संकट को कारोशी नामक बीमारी ही बेपर्दा कर दे रही है। अब ऐसी कहानियों के और ऐसी कहानियां सुनाने वालों के दिन पूरे हो गये हैं। 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।