मोदी की महामानव की छवि बनाने में करोड़ों रुपये खर्च किये जाते हैं। उन्हें विश्वगुरू, नान बायलॉजिकल, दुनिया में डंका बजाने वाले आदि न जाने किन-किन उपमाओं से सुशोभित करवाया जाता है। वैसे तो यह उपमाएं रोज ही तार-तार हो रही हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से ये उपमाएं हंसी-मजाक का पात्र बन गयी हैं।
बड़ी एकाधिकारी पूंजी द्वारा संचालित कारपोरेट मीडिया तो पहले की भांति मोदी भक्ति में लीन है। हां, इतना जरूर है कि यह भी बड़ी तीन-तिकड़म से ही मोदी की छवि को बचा पा रहा है। लेकिन कारपोरेट मीडिया के इतर सोशल मीडिया में मोदी-भाजपा के हंसी उड़ाते वीडियो की भरमार है। कई वीडियो हल्के-फुल्के अंदाज में गढ़ी गयी उपमाओं का मजाक उड़ाते हैं तो कई वीडियो मोदी की नीतियों को मजाकिया ढंग से गलत साबित करते हैं। तो कई पोस्ट तथ्यों व गंभीर लेखन से मोदी-भाजपा के जन विरोधी फैसलों की पोल खोलती हैं।
दो स्टैंडअप कामेडियन ने मोदी की विदेश यात्राओं में नेताओं के साथ ‘खी खी, हा-हा’ और जबरदस्ती गले पड़ने पर एक वीडियो बनाया जिसे मोदी सरकार ने बैन कर दिया। ‘द वायर’ ने फिल्मी गाने के बोल बदलकर ए आई जनरेट एक वीडियो बनाया जिस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ‘द वायर’ की तो स्पीड भी स्लो कर दी गयी। इसी कड़ी में ‘द कारवां’ के ट्वीट, सतीश आचार्य के दो कार्टून (भारत-ईरान और अमेरिका से सम्बन्धित) को ‘एक्स’ ने ब्लॉक कर दिया। यूजीसी समानता नियमावली से जुड़े कई वीडियो, पोस्ट, कार्टून आदि ब्लाक कर दिये गये। ‘द कारवां’ में नितिन गडकरी और बीफ कारोबार पर छपी एक रिपोर्ट पर वीडियो बनाने पर यूट्यूबर मुकेश मोहन को 50 करोड़ रुपये की मान हानि के नोटिस व मुकदमे का सामना करना पड़ा। सिर्फ पोस्ट ही नहीं बल्कि मार्च 2026 में सरकार विरोधी कहकर मोदी-भाजपा की आलोचना करने वाले कई ‘एक्स’ अकाउंट पूरे भारत में बंद कर दिये गये। गृह मंत्रालय के अनुसार ही पिछले साल (2024-25) में औसतन प्रतिदिन 290 पोस्ट हटाने के नोटिस जारी हुए। कुल 1,11,185 कन्टेन्ट को ब्लाक किया गया।
मोदी-भाजपा, सरकार की आलोचनाओं को ही बड़े पैमाने पर रोका जा रहा है। इस साल ब्लाक किये गये कन्टेन्ट में व्यंग्य, कार्टून, राजनीतिक टिप्पणियां, यू जी सी नियमावली, विदेश नीति की आलोचना, स्वतंत्र पत्रकारिता से जुड़े पोस्ट-कन्टेन्ट को ही ब्लाक किया गया है।
पोस्टों को रोकने में मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट के नियमों का भी पालन करना जरूरी नहीं समझती। सुप्रीम कोर्ट के जज श्रेया सिंघल ने 2015 में आई टी एक्ट पर फैसला देते हुए कहा कि ब्लाकिंग पर प्रभावित व्यक्ति को लिखित में सूचना देना, उचित सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए। लेकिन फासीवादी तौर-तरीकों में रची-बसी मोदी सरकार के आदेश अधिकांशतः गोपनीय रहते हैं, ब्लाकिंग के कारण स्पष्ट रूप से नहीं बताये जाते हैं। न ही उचित सुनवाई का कोई मौका दिया जाता है।
फासीवादी मोदी सरकार अभिव्यक्ति की हर आवाज को कुचल रही है। इसके लिए वह अपने ही कानूनों तक के पालन के लिए भी तैयार नहीं है। कारपोरेट मीडिया तो मोदी भक्ति में ही लगा हुआ है। इसमें वह अपनी साख तक की परवाह नहीं कर रहा है। सोशल मीडिया लोगों की अभिव्यक्ति की एक धीमी आवाज बन रहा है। हालांकि यहां भी मोदी-भाजपा का आई टी सेल ही हावी है जो बहुत संगठित व योजनाबद्ध तरीके से इस प्लेटफार्म का सबसे अधिक इस्तेमाल कर रहा है।
लेकिन तब भी प्रतिरोध की धीमी आवाज यहां से उठ रही है जिसे मोदी-भाजपा बर्दाश्त नहीं कर पा रही है और बड़े पैमाने पर इन आवाजों को शांत कर दे रही है।