कैसा राष्ट्रवाद? किसका राष्ट्रवाद?

Published
Thu, 07/16/2026 - 09:50
/kaisaa-raashtravad-kisaka-rashtravaad

कुछ दिनों बाद हम अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहे होंगे। स्वभाविक तौर पर जिस देश के लोों ने दो सदी तक क्रूर औपनिवेशिक सत्ता के दमन को झेला हो उस देश के लोगों के लिए आजादी का मूल्य व मतलब अतुलनीय है। कई करोड़ लोग औपनिवेशिक सत्ता के दौरान युद्ध, अकाल, महामारी, कुपोषण, साम्प्रदायिक दंगों में मारे गये व कई लाख लोग औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हो गये। हमने धूर्त ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से आजादी अकूत बलिदानों से हासिल की है। ब्रिटिश साम्राज्यवादी भारत में अपने औपनिवेशिक शासन को हर सूरत में बना कर रखना चाहते थे तो हम भारतीय हर सूरत में क्रूर, जल्लाद ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासकों को भारत से खदेड़ना चाहते थे। जीत हमारी हुयी और उनकी हार हुयी। 
    
यह इतिहास का नियम है कि जब कभी शोषक और शोषित, क्रूर शासक व शासित के बीच संघर्ष छिड़ेगा उसमें अंततः जीत शोषित व शासित वर्ग की ही होगी। यह दीगर बात है कि वह संघर्ष लम्बा, बहुत कठिन, बहुत कुर्बानियां से भरा होगा परन्तु आखिर में जीत गुलामों की हुयी है, शोषितों की हुयी है। हमारे देश का इतिहास स्वयं इस बात का गवाह है कि हमने उन अंग्रेजों का सूरज हमेशा के लिए डुबोने के लिए जान की बाजी लगा दी थी। और हमारी आजादी की लड़ाई को क्रांतियों से, समाजवाद से, दूसरे देशों में चल रही साम्राज्यवाद विरोधी लड़ाईयों से बहुत ऊर्जा, समर्थन व सहयोग प्राप्त हुआ था। और अपनी बारी में भारत की आजादी की लड़ाई ने एशिया व अफ्रीका महाद्वीप के कई-कई देशों की आजादी की लड़ाई को प्रेरणा दी थी। 
    
जिन-जिन देशों ने औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीत उन सभी देशों में अपनी आजादी को प्यार करने और उसको अक्षुण्ण रखने के लिए एक के बाद एक नई पीढ़ी तैयार और सामने आती रही है। जाहिर सी बात है हमारे देश में हजारों-लाखों लोग हैं जो भारत की आजादी को बनाये रखने के लिए अपनी जान कुर्बान कर देंगे। किसी भी सूरत में पीछे नहीं हटेंगे। इन अर्थों में स्वंतत्रता दिवस हमारे लिए बहुत मायने रखता है। हमें शहीदों को याद करने और अपनी आजादी यानी साम्राज्यवाद के खिलाफ अनवरत संघर्ष जारी रखने की जरूरत को बार-बार स्मरण कराता है। 
    
दुर्भाग्यवश आजादी, आजादी की लड़ाई, शहीदों की विरासत आदि के बारे में जैसा हम मजदूर-मेहनतकश, किसान, नौजवान यानी आम शोषित-उत्पीड़ित जन सोचते हैं वैसा हमारे देश के शासक यानी शोषक-उत्पीड़ित वर्ग-पूंजीपति वर्ग नहीं सोचते हैं। और जब से सत्ता में हिन्दू फासीवादी (संघ-भाजपा) आये हैं तब से भारत की ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ी गयी लड़ाई के महत्व को खुले-छिपे ढंग से नीचे गिराने की कवायद चल रही है। इनका साहस कितना बढ़ गया है कि इन बेशर्मों में से कुछ तो जब से मोदी सत्ता में विराजे हैं तब से देश को आजादी मानते हैं। हिन्दू फासीवादियों ने भारत की आजादी की लड़ाई को हिन्दू फासीवादी-साम्प्रदायिक चश्मे से देखने का जो चलन शुरू किया वह हमारे शहीदों, हमारी आजादी की लड़ाई का घोर अपमान है। इसका स्वभाविक परिणाम यह निकला व निकलता है कि साम्राज्यवाद (चाहे वह ब्रिटिश, फ्रांसीसी, रूसी, अमेरिकी हो) को आज के भारत का दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त के रूप में पेश किया जाताा है। दुश्मन के रूप में ये धूर्त साम्राज्यवाद को नहीं बल्कि अपने ही देश के नागरिकों-मुसलमानों व ईसाईयों को पेश करते हैं। हिन्दू फासीवादियों का राष्ट्रवाद साम्राज्यवादियों को दोस्त और अपने ही देश के मजदूर-मेहनतकश धार्मिक अल्पसंख्यकों मुसलमान व ईसाईयों को दुश्मन के रूप में पेश करता है।
    
आज यह स्थापित बात है कि भारत के हिन्दू फासीवादियों ने आजादी की लड़ाई में क्रूर, धूर्त व अत्याचारी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का खुले व छिपे ढंग से समर्थन किया था। ये आजादी की लड़ाई से दूर-दूर रहे। और उन सामंती, राजाओं की गोद में बैठकर ऊंघते-सोते रहे जो अंग्रेजों के पिट्ठू, दलाल व लठैत थे। हेडगेवार, गोलवलकर आदि को अपने घृणित हिन्दू साम्प्रदायिक एजेण्डे को आगे बढ़ाने के लिए पैसा व अन्य संसाधन राजा-महाराजाओं, जमींदारों, सूदखोरों व अंग्रेजों के चाकर व्यापारियों से ही आता था। इसीलिए इनका इतिहास हमें बताता है कि इन्होंने कभी भी अंग्रेजों व सामंती राजा-महाराजाओं व जमींदारों के खिलाफ कोई लड़ाई नहीं लड़ी। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है कि ये साम्राज्यवाद के, सामंतवाद के, जातिवाद के, मनुवाद के, मर्दवाद के समर्थक हमेशा से रहे हैं और आज भी बने हुए हैं। इनका राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद व सामंतवाद के आगे पूर्ण समर्पण व उसको पालने-पोषण करने व उससे अपनी खुराक हासिल करने का है। मोदी व भागवत को अमेरिकी साम्राज्यवादी दुश्मन नजर नहीं आते यद्यपि वे आये दिन हम भारतीयों का अपमान, उत्पीड़न व यहां तक हत्या तक कर देते हैं। ‘नमस्ते ट्रम्प’ ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ नारे लगाने वाले मोदी जितनी आग भारत के गरीब मुसलमानों के खिलाफ उगलते हैं उनकी जुबान पर तब ताला लग जाता है जब ट्रम्प भारतीयों को जंजीरों से बांधकर भूखा-प्यासा भारत वापस भेजता है या फिर जब अमेरिकी सेना तीन निहत्थे भारतीयों की निर्मम हत्या कर देती है। 
    
मोदी एण्ड कम्पनी जब से सत्ता में आयी है तब से एक के बाद एक साम्राज्यवादी देश को भारत को लूटने, शोषण-दोहन करने की एक से बढ़कर एक छूट दिये जा रही है। अभी धूर्त ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से मुक्त व्यापार समझौता हो रहा है फिर यूरोपीय और फिर अमेरिकी साम्राज्यवादियों से समझौता होने जा रहा है। पूरे भारत को अमेरिकी, जापानी, ब्रिटिश, फ्रांसीसी, चीनी कम्पनियां जोंक की तरह चूस रही हैं और हम मजदूर-मेहनतकशों को पाठ पढ़ाया जाता है कि ‘राष्ट्र आगे बढ़ रहा है’, ‘देश का विकास हो रहा है’, ‘भारत विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है’। यह सब भारत के मजदूर-मेहनतकशों के लिए नहीं बल्कि भारत के पूंजीपतियों खासकर अम्बानी-अडाणी-टाटा-मित्तल जैसे बड़े, बहुत बड़े पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। इन्हीं के मुनाफे को बढ़ाने की खातिर साम्राज्यवादियों को देश में लूट की दावत दी जा रही है। इसीलिए भारत के पूंजीपतियों को निशाने पर लेकर ही साम्राज्यवाद से भी लड़ा जा सकता है। 
    
हम मजदूर-मेहनतकशों के सामने इस बात के अलावा क्या रास्ता है कि हम यदि अपने देश को प्यार करते हैं तो देश के खुले-छिपे दुश्मनों के खिलाफ अपनी आजादी की लड़ाई से प्रेरणा लेकर एक बार फिर संघर्ष के मैदान में कूदें। 

आलेख

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।