मरी हुई बहन का कंकाल और जीतू मुंडा -प्रभुराज गड़कर

Published
Fri, 05/01/2026 - 15:50
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ओडिशा के किसी दूर-दराज के गांव में 
कहीं, कुछ छोटे नोट, 
शायद
इधर-उधर से काम करके 
बैंक में जमा हो गए होंगे
शायद किसी छळव् के सेविंग्स ग्रुप
के किसी ने उसे बैंक की अहमियत बताई होगी,
इसलिए उसने अकाउंट खुलवाया होगा
और शायद एक दिन कुपोषण, बीमारी,
समय पर दवा न मिलने की वजह से
उसकी मौत हो गई हो
उसे आदिवासी रीति-रिवाजों के हिसाब से
दफनाया गया था। 
उसके पीछे कोई नहीं था,
सिर्फ उसका भाई जीतू मुंडा था। 
उसे उसके बैंक अकाउंट के बारे में पता होगा,
इसलिए वह बैंक गया और हाथ जोड़कर विनती की
कि उसकी बहन के नाम पर जो पैसे थे, 
वे उसे दे दिए जाएं! 
बैंक और वहां के अधिकारियों ने उसके 
आधे नंगे कपड़े देखकर और उसकी भाषा सुनकर 
अपनी मंज़ूरी दे दी होगी।
इसलिए भाई बार-बार जाने लगा। 
अधिकारी सबूत मांगने लगे,
असली अकाउंट होल्डर को पेश करो या सबूत लाओ!
वह कहते-कहते थक गया कि वह मर चुकी है।
और आखिर में सबूत के तौर पर
उसने अपनी बहन की लाश, जिसे दफनाया गया था,
खोदकर निकाली और तीन मील चलकर,
बैंक के दरवाजे पर खड़ा हो गया।
तभी बैंक अधिकारियों को राहत मिली।
तब अधिकारियों को दया आई और 
उन्होंने उसकी बहन के उन्नीस हजार तीन सौ रुपये
उसके हाथ में रख दिए।
हां,
यह पैसा उसके हाथ में रखते हुए,
अधिकारी सबूत के तौर पर 
सोशल मीडिया के लिए फोटो लेना नहीं भूले।
और यहां, गरीबों की चिंता करने वाला मुख्य सेवक
डोंगी में बैठकर फोटो सेशन कर रहा था।
और वहां, एक आदिवासी राजभवन में 
आराम कर रहा था, ।ब् की ठंडी हवा ले रहा था।
और जिस राज्य के नागरिक जीतू मुंडा हैं,
वहां कहा जाता है कि मुख्यमंत्री आदिवासी है!

जीतू मुंडा, क्या तुम यह सब जानते हो?

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