पूंजीवादी अर्थशास्त्रियों की निगाह में भारतीय अर्थव्यवस्था का संकट

Published
Tue, 06/16/2026 - 06:55
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अब भारतीय अर्थव्यवस्था के संकट को छिपाना झूठ बोलने में माहिर मोदी सरकार के लिए भी असंभव हो गया है। कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर तेल-गैस की कीमत बढ़ाने और डाॅलर के मुकाबले रुपये के रसातल पर चले जाने के बाद प्रधानमंत्री भी अच्छे दिनों के जुमले को छोड़कर कठिनाई के लिए जनता को तैयार रहने की नसीहतें दे रहे हैं। लेकिन अभी भी सरकार में बैठे लोग यह कहने से बाज नहीं आ रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है और समस्या सिर्फ ईरान संकट की वजह से पैद हुयी है। यह एक बार फिर सरकार का सफेद झूठ है। स्वयं शासक वर्ग के भीतर से लंबे समय से देश की अर्थव्यवस्था की समस्याओं पर बात होती रही है और इसके लिए मोदी सरकार को अलग-अलग तरीके से जिम्मेदार ठहराया जा रहा था। पिछले डेढ़-दो साल से तो देश में पूंजी निवेश की गिरावट एक ऐसा तथ्य है, जिसको चटाई के नीचे छिपाने के लिए तो इस सरकार के शातिर तरीके भी नाकाम हो जा रहे हैं। 
    
सुरजीत भल्ला, अरविंद सुब्रमण्यम, सुभाष गर्ग और रघुराम राजन चार ऐसे आर्थिक विशेषज्ञ हैं जिन्होंने पिछले माह भर में अलग-अलग साक्षात्कारों में देश के आर्थिक संकट के बारे में अपनी राय रखी और इसके लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया। ये चारों मोदी सरकार के 12 वर्षों के शासन में सरकार की अलग-अलग जिम्मेदारी को किसी न किसी वक्त निभा चुके हैं। चारों देश की मौजूदा स्थिति को किसी भी तरह विकसित भारत की तरफ बढ़ता हुआ नहीं पाते हैं। चारों देश में निवेश के वातावरण के कमजोर होने की वजह से चिंतित हैं। चारों चाहते हैं कि सरकार जनता पर खर्चों में कटौती करे। इनकी ये सारी समानताएं इन सभी के पूंजीपति वर्ग के सेवक होने की इनकी भूमिका के अनुरूप ही है। तब भी, इनकी बातों में कई फर्क भी है। जहां पर ये आपस में एक-दूसरे से असहमत हैं, वहीं से इनकी बातों में अर्थव्यवस्था की जमीनी स्थिति भी कुछ-कुछ झांकती हुई दिखाई देती है। 
    
सुरजीत भल्ला 2017-18 में प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रह चुके हैं। इस आम बात कि देश में निवेश का वातावरण बिगड़ चुका है, के साथ वे यह कहते हैं कि विकसित भारत का नारा बदल देना चाहिए। इनका कहना है कि भारत न तो दुनिया की सबसे तेज विकसित होती हुई अर्थव्यवस्था है और न ही दुनिया की एक प्रमुख अर्थव्यवस्था। पूंजीपति वर्ग का चाकर होने की वजह से इन्हें विदेशी निवेश हर मर्ज की दवा दिखती है और ये बहुत जोर देकर कहते हैं कि गरीबी हमारी सबसे छोटी समस्या है, हमारी समस्या विकास है। इन्हें मोदी सरकार के चुनावों में आसानी से जीत जाने से इसलिए तकलीफ है क्योंकि इससे सरकार की आर्थिक सुधार के लिए तत्परता कमजोर होती है। 
    
अरविन्द सुब्रमण्यन 2014 से 2018 के बीच भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे हैं। इनका कहना है कि भारतीय रुपया (तुर्की की मुद्रा के साथ) पिछले दो वर्ष में दुनिया की सबसे कमजोर मुद्रा रही है। ये निजी निवेश और निर्यात के पिछले पांच-छः साल में (एक हद तक पिछले दस साल में) कमजोर पड़ने को भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक समस्या के तौर पर देखते हैं। ये सरकार की पीठ थपथपाते हैं कि इसने आर्थिक सुधार किये हैं, लेकिन ये कहते हैं कि इसके बावजूद निवेश के लिए अनुकूल माहौल नहीं बना। इसकी वजह ये यह बताते हैं कि सरकार अपने मनपसंद उद्योगपतियों की तरफदारी करती है और राज्य के विभिन्न अंगों का इस्तेमाल (मसलन ईडी, सीबीआई, कराधान आदि) एक हथियार के रूप में करती है। इस सरकार में शक्तियों का केन्द्रीकरण है और फैसले एकतरफा तरीके से किये जाते हैं। इनका कहना है कि सरकार के लोगों का यह दृष्टिकोण कि कुछ प्रोत्साहनों के जरिये अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाया जा सकता है, यह अर्थव्यवस्था के गंभीर संकट से आंखें चुराना है। 
    
अरविंद सुब्रमण्यन यह तो देख पाते हैं कि सरकार फासीवादी तरीके अपना रही है। पर वे यह नहीं समझ पाते कि फासीवादी तरीके आर्थिक संकट का कारण नहीं बल्कि परिणाम हैं। 
    
डा. रचित राय प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं। यह भी इस बात से दुखी हैं कि भाजपा लोगों को बहका कर चुनाव जीत जाती है। ये भाजपा की हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति से भी दुखी हैं और भाजपा द्वारा भारत की झूठी मजबूत छवि बनाने से भी दुखी हैं। ये तंज कसते हैं कि भारतीय मुद्रा पाकिस्तानी मुद्रा से भी ज्यादा कमजोर साबित हुयी है। 
    
सुभाष गर्ग मोदी सरकार में वित्त सचिव रह चुके हैं। ये कहते हैं कि जैसे ही डालर में हम भारत की आर्थिक वृद्धि की गणना करते हैं वैसे ही इसके तेज विकास की पोल खुल जाती है। इस आधार पर 2025-26 में भारत की वृद्धि दर शून्य है। इनका कहना है कि पिछले 5-6 वर्षों में भारतीय रुपया हर साल 4-5 प्रतिशत से ज्यादा कमजोर हुआ है। यह इसके 3-4 प्रतिशत की सामान्य अवमूल्यन दर की तुलना में ज्यादा है। इनके अनुसार पिछले 10 वर्ष में रुपये का 40 प्रतिशत अवमूल्यन हुआ है। भारत से निर्यात की तुलना में भारत में होने वाला आयात ज्यादा है। इसकी भरपाई पिछले सालों में विदेशी निवेश के जरिये हो जाती थी। लेकिन अब विदेशी निवेश कमजोर होने से समस्या गहरा गयी है। वे यह नहीं बताते या देखते हैं कि भारत में घरेलू निवेश भी कमजोर हुआ है। 

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