पूंजीवादी लोकतंत्र को लात लगाते संघी

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3 नये विधेयक

20 अगस्त को गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में तीन विधेयक पेश किए। ये विधेयक केंद्र, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री जैसे प्रमुख पदों पर रहने वाले लोगों की गिरफ्तारी होने पर पद छोड़ने से संबंधित हैं। इन विधेयकों के जरिए अगर कोई मंत्री, मुख्यमंत्री और यहां तक कि प्रधानमंत्री भी, किसी अपराध में 30 दिन जेल या हिरासत में रहता है तो उसे अपना पद छोड़ना पड़ेगा। इसमें यह शर्त है कि जिस अपराध में गिरफ्तारी या हिरासत में लिया गया है उसमें सजा 5 साल या उससे अधिक होने का प्रावधान हो।
    
इन विधेयकों के अनुसार अगर 30 दिन में राजनेता अपनी जमानत नहीं करवा पाता तो मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री उन्हें अपने पद से हटा देंगे। कानूनी प्रक्रिया के बाद ऐसे राजनेता को यदि जमानत मिलेगी, तब ही वह अपने पद पर वापस आ सकता है।
    
इन विधेयकों को पेश करते समय यह दावा किया जा रहा है कि यह सब राजनीति को ज्यादा नैतिक बनाने के लिए किया जा रहा है। कि किसी गंभीर अपराध के आरोपी को मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। त्रासदी यह है कि राजनीति में नैतिकता का पाठ उस पार्टी के गृहमंत्री पढ़ा रहे हैं जिनके कई नेताओं, मंत्रियों पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न करने से लेकर बलात्कार के गंभीर आरोप लगे, लेकिन भाजपा ने उनसे इस्तीफा नहीं लिया। चहुं ओर विरोध और निंदा होने के बाद भी ये बेशर्मी से अपने पद पर बने रहे। 
    
इन विधेयकों को पेश करते हुए नैतिकता की बात करना लफ्फाजी के अलावा कुछ नहीं है। असल में इन विधेयकों का लक्ष्य विपक्ष की पार्टियों को निशाना बनाना है। 2014 में जब से सत्ता में मोदी सरकार है तब से उसका व्यवहार इसी बात की तस्दीक करता है। ED, CBI, इनकम टैक्स जैसी संस्थाओं के दुरुपयोग की नई इबारत मोदी सरकार के राज में ही लिखी गई। मोदी सरकार ने पिछले 11 सालों में 13 मामलों में विपक्ष की पार्टियों की सरकार के मंत्रियों को CBI और ED द्वारा गिरफ्तार करवाया। इसमें से सिर्फ PMLA एक्ट के तहत 10 नेताओं की गिरफ्तारी हुई। मोदी सरकार के राज में विपक्ष के लिए ED एक आतंक का पर्याय बन गई है।
    
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार हो, TMC सरकार के मंत्री हों, DMK के मंत्री हों, NCP के मंत्री हों सभी को सरकारी संस्थाओं का दुरुपयोग कर जेल में डाला गया। 
    
इनमें से कुछ लोग कई-कई महीनों तक जेल में रहे। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जब जेल में रहते हुए भी अपना इस्तीफा नहीं दिया तो मोदी एंड कंपनी काफी खिसियायी थी। अब इन विधेयकों द्वारा अरविंद केजरीवाल जैसे इस्तीफा न देने वाले विपक्षी नेताओं को साधने का काम किया जाएगा। अब केंद्र की मोदी सरकार पहले ED, CBI, इनकम टैक्स आदि को विपक्षी नेताओं के पीछे लगाएगी, गंभीर धाराओं में मामला दर्ज करेगी और अंत में पद से हटा देगी। इस तरह वह भारत की राजनीति को विपक्ष मुक्त करने का सपना साकार करेगी।
    
हालांकि इन विधेयकों की जद में प्रधानमंत्री भी हैं। लेकिन मोदी सरकार का वह कौन सा विभाग है जो प्रधानमंत्री पर कोई केस दर्ज करे और उन्हें गिरफ्तार करे। इन विधेयकों में प्रधानमंत्री पद बस एक ओट के रूप में प्रयोग किया गया है। जब  भाजपा के छोटे-मोटे मंत्री गंभीर आरोप लगने के बाद भी गिरफ्तार नहीं किए गए तो प्रधानमंत्री पद तो और भी दूर की कौड़ी है। असल निशाना विपक्षी पार्टियों के नेता और मंत्री हैं। 
    
इस संविधान संशोधन के जरिये मोदी सरकार पूंजीवादी लोकतंत्र को एक बड़ी लात लगाने का प्रयास कर रही है। पूंजीवादी लोकतंत्र में एक हद तक जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की संसद को राज्य के बाकी अंगों प्रशासन-पुलिस-सेना के ऊपर वरीयता हासिल होती है। प्रस्तावित नये विधेयक ये वरीयता छीनने का प्रयास हैं। यह केन्द्रीय एजेंसियों को किसी मुख्यमंत्री-मंत्री को हटाने की ताकत दे देगा। मोदी सरकार इसके जरिये सभी राज्यों में मुख्यमंत्रियों को अपना पालतू बनाने या हटा देने की फिराक में है। इस तरह यह संघ-भाजपा के हिन्दू फासीवादी मंसूबों को आगे बढ़ाने का एक और प्रयास है। 

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