आपका नजरिया- पंजाब वि.वि. की स्वायत्तता पर हमला

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केन्द्र सरकार ने पंजाब वि.वि. के सीनेट को भंग करने के इरादे से 28 अक्टूबर को एक ‘नोटिफ़िकेशन’ जारी किया था। इसके तहत सीनेट-सिण्डिकेट में चुनाव की प्रक्रिया को रद्द करके इसे पूरी तरह नामांकित पदों वाली बना दिये जाने का प्रावधान था। यही नहीं इसके सदस्यों की संख्या को 91 से कम करके 31 कर दी थी। केन्द्र सरकार ने इसके बाबत पहले भी कई कोशिशें की थीं लेकिन छात्र समुदाय और जनता के दबाव के चलते फासीवादी भाजपा इसमें सफल नहीं हो पायी। हालिया नोटिफिकेशन को भी भारी जनदबाव के कारण केन्द्र सरकार को वापस लेना पड़ा। सीनेट चुनाव की घोषणा की मांग के साथ छात्र समुदाय ने इस प्रदर्शन को जारी रखा हुआ है। 
    
इस नोटिफिकेशन के खिलाफ छात्र संघर्षरत थे। 10 नवम्बर को एक बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया गया था। इस प्रदर्शन से वि.वि. प्रशासन कितना खौफजदा था यह इसी बात से पता चलता है कि 10 और 11 नवम्बर की वि.वि. प्रशासन ने छुट्टी कर दी। किसी भी बाहरी व्यक्ति के आने की मनाही कर वि.वि. के गेस्ट हाउस में ताला जड़ दिया और हास्टलों में छापेमारी की गई। 
    
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान यूजीसी ने कहा था कि ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ के तहत पंजाब विश्वविद्यालय के संचालन की प्रक्रिया में परिवर्तन किया जायेगा। जिसका अर्थ सीधे यह था कि सीनेट और सिण्डिकेट जैसी संचालक संस्थाओं को समाप्त कर दिया जाये और उनकी जगह चांसलर द्वारा नामित एक बोर्ड आफ गवर्नर्स को स्थापित कर दिया जाये। यह कदम पंजाब विश्वविद्यालय के जनवादी संचालन व संस्थाओं को भंग कर उन पर फासीवादी नियंत्रण स्घ्थापित करने का प्रयास था। यह ठीक वैसा ही प्रयास है जो कि पूरे देश में तमाम विश्वविद्यालयों के साथ किया जा रहा है या किया जा चुका है। चाहे वे विश्वविद्यालय केन्द्रीय विश्वविद्यालय हों या फिर राज्य सरकार के मातहत चल रहे विश्वविद्यालय हों।
    
चण्डीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय में सीनेट ही उच्चतम गवर्निंग बाडी है। सीनेट पूरे पंजाब विश्वविद्यालय में जनवादी प्रक्रिया के तहत प्रबन्धन, संचालन व उसकी सम्पत्ति के सम्बन्ध में निर्णय लेने वाला सर्वोच्च निकाय है। सीनेट के सदस्यों की संख्या 91 होती है। जिसमें पंजाब का मुख्यमंत्री, पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय का चीफ जस्टिस और पंजाब व चण्डीगढ़ के वित्त और शिक्षा विभाग के अधिकारी, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेण्ट प्रोफेसर, कालेजों के प्रिंसिपल और यूनिवर्सिटी के स्नातक शामिल होते हैं। फिलहाल यह एक अंतरराज्यीय विश्वविद्यालय है यानी न यह राज्य विश्वविद्यालय है और न ही केन्द्रीय विश्वविद्यालय। कुछ लोग इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाने की मांग करते रहे हैं। यह केन्द्र सरकार व पंजाब सरकार द्वारा संयुक्त रूप से संचालित होता है और इसके फण्ड्स का 60 प्रतिशत केन्द्र सरकार से और 40 प्रतिशत पंजाब सरकार से आता है।
    
पंजाब विश्वविद्यालय पूरे देश में बचे-खुचे उन विश्वविद्यालयों में से एक है जिसकी जनवादी संस्थाओं व परम्पराओं को तबाह-बर्बाद करने का काम अभी तक मोदी सरकार नहीं कर पायी थी। जैसा कि उसने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आदि के साथ किया है। अब यहां भी अपनी खतरनाक छात्र-विरोधी ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ को लागू करने के नाम पर, मोदी सरकार सीनेट और सिण्डिकेट की जनवादी संस्था को ही समाप्त करने पर आमादा हो गयी।
    
पंजाब विश्वविद्यालय के विषय में निर्णय लेने का अधिकार किसे है? वह केवल और केवल चण्डीगढ़ विश्वविद्यालय के विश्वविद्यालय समुदाय का है। यानी वहां के शिक्षकों, छात्रों व कर्मचारियों का है। इन्हीं शिक्षकों, छात्रों व कर्मचारियों के हितों की नुमाइन्दगी करने का वैध अधिकार यहां की जनवादी संस्थाओं का है। जैसे कि सीनेट और उसके द्वारा चुनी गयी सिण्डिकेट। लेकिन मोदी सरकार इन जनवादी संस्थाओं को समाप्त करके पंजाब विश्वविद्यालय की अकादमिक, प्रबन्धकीय और संचालन-सम्बन्धी स्वायत्तता को समाप्त करने पर आमादा है।
    
इन संस्थाओं को भंग करने के पीछे मोदी सरकार का मंसूबा पूरे देश में ही कैम्पस जनवाद की हत्या करने का है। जिसका निशाना वह पहले ही कई विश्वविद्यालयों को बना चुकी है और अब पंजाब विश्वविद्यालय को बना रही है। -महेश, हल्द्वानी
 

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