अगस्त माह के अंत से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ऐलान के अनुरूप भारत पर 50 प्रतिशत का आयात शुल्क लगा दिया था। इस आयात शुल्क में 25 प्रतिशत का अतिरिक्त कर, टं्रप की घोषणा के अनुसार, रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण लगाया गया था। बकौल ट्रंप रूस को तेल की बिक्री से मिल रहा यह पैसा यूक्रेन के विरुद्ध युद्ध में इस्तेमाल हो रहा है, इसलिए इस युद्ध को रोकने के लिए जरूरी है कि तेल से हो रही इस रूसी आय को रोका जाय, और कि जो देश रूस से तेल खरीद रहे हैं, वे प्रकारान्तर से यूक्रेन-रूस युद्ध में रूस के साथ खडे़ हैं, वगैरह, वगैरह।
हालांकि ट्रम्प की भारत से नाराजगी की मूल वजह रूसी तेल की खरीद मात्र नहीं है। बल्कि ट्रंप के लिए ज्यादा दिक्कततलब भारतीय शासकों के रूसी साम्राज्यवादियों से रणनीतिक-सामरिक संबंध हैं। भारत रूस से मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली एस-400 खरीदने से लेकर, ब्रहमोस मिसाइल उत्पादन में सहयोग, टैंक-राइफल खरीद व रूसी सहयोग से हथियार उत्पादन आदि को अमेरिकी साम्राज्यवादियों की नाराजगी के बावजूद आगे बढ़ाता रहा है। नयी सदी में चीनी-रूसी साम्राज्यवादियों के उभार के साथ बढ़ती अंतर साम्राज्यवादी प्रतिद्वन्द्विता से तीसरी दुनिया के तमाम देशों के शासकों के लिए विदेश नीति में स्वायत्तता की संभावनायें बढ़ गयी थीं। इसी का इस्तेमाल करते हुए भारतीय पूंजीवादी शासक एक ओर अमेरिका से रिश्ते बढ़ा रहे थे वहीं दूसरी ओर रूसी साम्राज्यवादियों से भी पुराने संबंध फिर से मजबूत कर रहे थे। जाहिर है भारतीय शासकों की इस स्थिति को अमेरिकी साम्राज्यवादी लम्बे वक्त तक बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। ट्रंप के दोबारा सत्तासीन होते ही टैरिफ के हमले के जरिये उन्होंने भारतीय शासकों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। अमेरिकी साम्राज्यवादी चाहते हैं कि भारतीय शासक रूस से सभी रणनीतिक-सामरिक संबंध समाप्त कर दें। आयात शुल्क वृद्धि इसी हेतु दबाव डालने का एक जरिया है।
इस आयात शुल्क वृद्धि के बाद प्रधानमंत्री मोदी समेत भाजपा के सभी ‘बयानवीरों’ ने ‘‘पुष्पा, झुकेगा नहीं..’’ सरीखे फिल्मी अंदाज में ‘‘भारत की स्वतंत्र विदेश नीति’’, ‘‘कोई दबाव नहीं है’’, ‘‘विकास दर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा’’, आदि बहुत से जुमले छोड़े। लेकिन दो महीने गुजरते-गुजरते इन सारे ही जुमलों की हवा निकल गई है। अंततः भारत सरकार अमेरिका की मांगों के आगे झुकने लगी है और रूस से अपनी तेल खरीद नीति में बदलाव करने की तरफ बढ़ने लगी है। अंदरखाने इस अनुरूप बातचीत और समझौते आगे बढ़ने लगे हैं, जिनके इस वर्ष नवम्बर के अंत तक पूर्ण हो जाने की संभावना है। कुछ नतीजे सामने भी आने लगे हैं। हाल ही में, सरकारी कम्पनी इंडियन आयल कारपोरेशन ने अमेरिका से 50 लाख बैरल और भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन ने 20 लाख बैरल तेल खरीद का टेण्डर जारी किया है। अम्बानी की कम्पनी रिलायंस इण्डस्ट्रीज ने भी अमेरिकी कम्पनी ‘वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट’ से कच्चे तेल की खरीद का सौदा किया है। साथ ही भारत की सरकारी तेल-गैस कम्पनियों ने 2026 में अमेरिका से एल.पी.जी. के तीन बहुत बड़े गैस कैरियर खरीदने की योजना प्रस्तावित की है। आने वाले समय में अमेरिका के साथ तेल-गैस व्यापार के इस तरह के सौदे और भी देखने को मिलेंगे। बड़बोले ट्रंप ने तो हमेशा की तरह अपनी तरफ से घोषित भी कर दिया है कि भारत इस वर्ष के अंत तक रूसी तेल की खरीद को शून्य तक ले आयेगा, इसके लिए उसके और मोदी के बीच सहमति बन चुकी है, आदि, आदि। भारत सरकार ने इस बयान की कोई विशेष काट नहीं की है। बस अपने चरित्र के अनुरूप मोदी सरकार यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि वह किसी दबाव में नहीं है, और सब कुछ उनकी तथाकथित स्वतंत्र विदेश नीति के अनुरूप किया जा रहा है।
24 अक्टूबर को जर्मनी के अंदर आयोजित ‘बर्लिन संवाद’ में भारत के वाणिज्य मंत्री और मोदी के लाडले पीयूष गोयल ने बयान दिया कि ‘‘जल्दबाजी में या बंदूक की नोंक पर व्यापार समझौते नहीं करता है भारत’’। उनके बयान के विपरीत भारत अमेरिका के साथ ‘द्विपक्षीय व्यापार समझौते’ की तरफ बढ़ रहा है। वाणिज्य मंत्री के बयान से बस इसी बात का खुलासा होता है कि यह समझौते अमेरिका के दबाव में ‘‘जल्दबाजी’’ में भी हो रहे हैं और ‘‘बंदूक की नोंक पर’’ अर्थात् दबाव में भी हो रहे हैं। दबाव को नकारने वाला उनका बयान सरकार की व्यवहारिक कार्रवाईयों की रोशनी में दरअसल दबाव को ही उजागर कर देता है। आइये! थोड़ा करीब से देखते हैं कि आखिर चल क्या रहा है?
23 अक्टूबर को ट्रंप प्रशासन ने रूस की दो प्रमुख तेल उत्पादक कम्पनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल को प्रतिबंधित घोषित कर दिया। इन कंपनियों से जो भी देश या कम्पनियां कच्चे तेल की खरीददारी करेंगी, वे भी स्वतः प्रतिबंध के दायरे में आ जायेंगी। प्रतिबंध के यह प्रावधान आगामी 21 नवम्बर से लागू हो जायेंगे। भारत वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 17 लाख बैरल (1 बैरल लगभग 159 लीटर के बराबर होता है) कच्चा तेल रूस से आयात करता है। इस आयात के अधिकांश हिस्से की आपूर्ति उपरोक्त दो रूसी कम्पनियां सीधे या अपनी सहयोगी कम्पनियों के माध्यम से करती हैं। गौरतलब है कि इस समय भारत के कुल कच्चे तेल आयात का 34 प्रतिशत हिस्सा रूस से ही आता है। जबकि अमेरिका से आयातित तेल कुल आयात का महज 10 प्रतिशत है। अमेरिका की तरफ से भारत सरकार के ऊपर यही दबाव है कि वह रूस से तेल आयात कम करते-करते लगभग शून्य पर ले आये और उसी अनुपात में अमेरिका से तेल आयात को बढ़ाये। यूक्रेन-रूस युद्ध तो महज बहाना है, वास्तव में यह सब अमेरिका द्वारा शुरू किये गए ‘व्यापार-युद्ध’ का हिस्सा है। सवाल है कि इस सब में भारत पर थोपे गए अतिरिक्त आयात शुल्क की क्या भूमिका है?
सर्वविदित है कि वर्तमान में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। कोविड-19 और ‘गलवान टकराव’ से पूर्व यह स्थिति चीन को प्राप्त थी। किन्तु चीन के साथ व्यापार की तुलना में अमेरिका के साथ व्यापार में भारत की एकाधिकारी कम्पनियां बहुत ज्यादा लाभ की स्थिति में हैं। इसे समझने के लिए वर्तमान के आंकड़ों पर नजर डालते हैं। हालिया वित्त वर्ष में अभी तक भारत का अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार कुल 132.2 अरब अमेरिकी डालर का रहा है जिसमें भारत ने अमेरिका को 86.51 अरब अमेरिकी डालर का निर्यात किया है, जबकि भारत ने अमेरिका से 45.69 अरब अमेरिकी डालर का आयात किया है। अंतर साफ देखा जा सकता है कि भारत की कम्पनियां अमेरिका के साथ व्यापार में कितना ज्यादा व्यापार लाभ की स्थिति में हैं। और यह स्थिति केवल इसी साल की नहीं है बल्कि पिछले कुछ वर्षां से यही स्थिति रही है। जरा रूस के साथ द्विपक्षीय व्यापार के आंकड़ों से इसकी तुलना की जाय। 2024-25 के वित्तीय वर्ष में रूस-भारत द्विपक्षीय व्यापार कुल 68.7 अरब अमेरिकी डालर का हुआ था। इसमें से रूस द्वारा भारत को 63.84 अरब डालर का निर्यात था और भारत से रूस ने केवल 4.88 अरब अमेरिकी डालर का आयात किया था। देखा जा सकता है कि रूस के साथ भारत बेहद व्यापार घाटे की स्थिति में रहा है। भारत में रूस से इस आयात का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का ही है।
दरअसल 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरूआत के बाद पश्चिमी देशों ने रूस से तेल आयात कम करना शुरू कर दिया था। इसके जवाब में रूस ने अपने तेल की कीमतें वैश्विक बाजार से काफी कम कर दीं। भारत सरीखे कुछ देशों ने इस मौके का फायदा उठाने की फिराक में अपने तेल आयात को रूस की तरफ झुकाना शुरू कर दिया था। आंकड़ों के माध्यम से बात करें तो 2021-22 में भारत को रूस से तेल आयात जहां लगभग 40 लाख टन सालाना था, वहीं यह 2024-25 में बढ़कर 8 करोड़ 70 लाख टन सालाना पहुंच गया है। रूस से मिल रहे इस सस्ते तेल के कारण भारत की कम्पनियां और भारत सरकार हर साल लगभग 5 अरब अमेरिकी डालर की बचत कर रही हैं, जो कि भारत के तेल खरीद के सालाना खर्च का लगभग 3 से 4 प्रतिशत बैठता है। यह बात अलग है कि तेल खर्च की इस बचत का लाभ भारत की आम जनता को नहीं मिला। सारी की सारी बचत सरकार और मोदी की चहेती कम्पनियों ने अपनी जेब के अंदर कर ली।
मोदी सरकार के सामने संकट यही है कि वह रूस से मिल रहे सस्ते तेल को चुने या फिर अमेरिका के साथ प्रति वर्ष होने वाले कुल व्यापार लाभ को। अपनी फितरत के अनुसार तो भारत सरकार और भारतीय पूंजीपति यही चाहते हैं कि उनको दोनों जगह से होने वाला लाभ बदस्तूर जारी रहे। किन्तु डोनाल्ड ट्रंप इस सारे खेल में भाजपाईयों और उनके यारों का गुरू है। उसने वर्तमान और भविष्य के द्विपक्षीय व्यापार में भारत को हो रहे लाभ को अपना हथियार बनाया और अपनी वैश्विक शक्ति संतुलन की राजनीति के मोहरे सैट करके मोदी सरकार को ‘पटरी’ पर ला डाला।
वैश्विक व्यापार में भारतीय पूंजीपतियों के अमेरिकी दबाव का संकट केवल वर्तमान के मुनाफे को लेकर ही नहीं है बल्कि भविष्य के व्यापार मुनाफे को भी लेकर है। ट्रंप के पहले कार्यकाल के समय पर ही भारत और अमेरिका के बीच ‘‘द्विपक्षीय व्यापार समझौते’’ की एक प्रक्रिया प्रारम्भ हुई थी, जो ट्रंप के सत्ता से हट जाने के बाद ठण्डे बस्ते में चली गई थी। ट्रंप के दोबारा सत्ता में वापस आने के बाद से यह प्रक्रिया फिर से प्रारम्भ हो गई थी। ‘‘द्विपक्षीय व्यापार समझौते’’ के पहले चरण को कार्यान्वित करने के लिए इस वर्ष जनवरी से लेकर मई तक पांच चरण की बातचीत हो चुकी थी। परन्तु हालिया ‘टैरिफ युद्ध’, ‘भारत-पाकिस्तान टकराव’ और ‘रूसी तेल खरीद विवाद’ के चलते यह बातचीत रुक गयी थी। अंततः अब मोदी सरकार अमेरिकी दबाव के आगे नरम पड़ती जा रही है इस अनुरूप यह ‘द्विपक्षीय व्यापार समझौता’ फिर से चर्चा में आ गया है। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी.ए. नागेश्वरन् के बयान को सच माने तो इस वर्ष नवम्बर अंत तक पहले चरण को लागू करने का रास्ता साफ हो जायेगा और अमेरिका द्वारा थोपा गया आयात शुल्क भी कम से कम 25 प्रतिशत तक घट जायेगा।
‘भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता’ लक्ष्य करता है कि 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब अमेरिकी डालर तक ले जाया जायेगा। यानी वर्तमान का लगभग 4 गुना। भारतीय पूंजीपति इस प्रयास में हैं कि इस द्विपक्षीय व्यापार की बढ़ोत्तरी से वे लगभग वर्तमान की स्थिति वाला ही आनुपातिक लाभ प्राप्त कर पायें। किन्तु ट्रंप सरकार इस बार इतनी दरियादिली के मूड में नहीं दिख रही है। ट्रंप सरकार का प्रयास है कि अमेरिका से भारत को निर्यात होने वाले उत्पादों के लगभग 90 प्रतिशत उत्पाद ‘‘वरीयता पहुंच’’ (प्रीफेंशियल एक्सेस) श्रेणी में आ जायें। यानी उस उत्पाद के आयात के मामले में भारत अमेरिका के ही उत्पाद को वरीयता देगा। भारत के साथ समस्या यह है कि यूरोपीय यूनियन के देश, आस्ट्रेलिया, आदि भी भारत के साथ इसी तरह के द्विपक्षीय समझौतों के लिए बातचीत चला रहे हैं। ब्रिटेन के साथ भारत अभी हाल में ही ‘द्विपक्षीय व्यापार समझौता’ सम्पन्न भी कर चुका है। जिसमें बहुत से ब्रिटिश उत्पादों की भारत में निर्बाध पहुंच संभव हो गयी है।
निकट भविष्य में ही हम जान जायेंगे कि मोदी सरकार अमेरिकी दबाव में कितना झुकती है, लेकिन उसका झुकना तय है। यहां ध्यान देने की बात यह है कि यह झुकना निरपेक्ष अर्थ में नहीं है बल्कि भारत के एकाधिकारी पूंजीपतियों के मुनाफे के सापेक्ष है और उसी को ही ध्यान में रख कर होगा। रूसी तेल खरीद पर भारत का एक हद तक झुकना तो तय हो चुका है पर यह झुकना क्या रूस से रणनीतिक-सामरिक संबंधों में भी झुकने की हद तक जायेगा यह आने वाले वक्त में पता चलेगा। डोनाल्ड ट्रंप मोदी सरकार और भारतीय पूंजीपतियों की फितरत को अच्छे से समझता है। भारत-पाकिस्तान के बीच मई माह में हुए विवाद के दौरान ‘शांतिदूत’ की अपनी छवि निर्माण के दौरान उसने यूं ही नहीं कहा था व्यापार लाभ का युद्ध विराम करवाने के लिए उसके जैसा इस्तेमाल उससे पहले किसी ने नहीं किया होगा। इशारा साफ था कि भारतीय पूंजीपतियों के मुनाफे के लालच का वह अपने वैश्विक राजनीतिक समीकरणों के लिए इस्तेमाल करना जानता है और करता रहेगा। तेल व्यापार के मामले को ही लें तो अमेरिका ने इससे पहले भी भारत की प्राथमिकताओं को बदलवाया है। 2018-19 से पहले भारत की कम्पनियां अपनी कच्चे तेल की आपूर्ति के एक अच्छे खासे हिस्से के लिए ईरान व वेनेजुएला से आयातित तेल पर निर्भर थी। एक समय तो यह 17 प्रतिशत तक पहुंच गया था। फिर अमेरिकी दबाव में ही मोदी सरकार ने ईरान व वेनेजुएला से तेल आपूर्ति को क्रमशः घटाते हुए ईराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की तरफ स्थानान्तरित कर दिया था। अपनी वैश्विक राजनीति के हित में अमेरिका एक बार फिर भारत के पूंजीपतियों और उनकी प्रतिनिधि मोदी सरकार के साथ रूसी तेल पर यह सौदेबाजी कर रहा है।
अमेरिकी साम्राज्यवादी यूं ही कोई मुफ्त में भारत के साथ व्यापार घाटे को बर्दाश्त नहीं कर रहे हैं। वह भारत को अपने साम्राज्यवादी हितों के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं और कर भी रहे हैं। और अपनी मुनाफे की हवस में भारतीय पूंजीपति और मोदी सरकार अमेरिकी साम्राज्यवादियों की वैश्विक योजना में उनके साथ खड़े भी नजर आ रहे हैं। यह बात अलग है कि यह गठजोड़ अंततः आम भारतीय जनता के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होगा।